~ हुनर…

~ हुनर

इस बलखा के चलती कलम का हुनर तो देखो,

जहाँ कोई ना जाये, ये हर हाल गयी उधर तो देखो,

लोग रहते हैं लगें अख़बार की सुर्ख़ियाँ चाटने,

और ये ख़ुद बन गयी ताज़ा ख़बर तो देखो

हंगामा है चारों ओर ग़ज़ब का शोर है,

जैसे जंगल मस्त होके नाचा कोई मोर है,

ये काग़ज़ पे मचल के ग़ज़ल हो गयी,

भरी महफ़िल में इसका असर तो देखो

आज खुल के कुछ भी खाना दुश्वार है,

हवा में है ज़हर है, घर से निकलना बेकार है,

आदमी को आदमी से आज ईंटपत्थर का प्यार है,

लगी ये फिर से उगलने ज़हर तो देखो

अब ये सोचसोच के कितना कम लिखता हूँ,

सच सहना तो दूर अब कहने की भी मनाही है,

खबरे सब बिकीबिकाई, ये मुफ्त का अख़बार है,

ज़िद्दी है ये, फिर बरपा दिया इसने क़हर तो देखो

चुप चाप चलो और किसी पुल पर ना चढ़ना,

पुराना भूल जाओ नया इतिहास पड़ेगा पड़ना,

बादशाहसलामत आने को है सब सर झुका लो ,

ये फिर चल पड़ी उठा सर उधर तो देखो

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~ दोस्त…कहीं खो गए हैं…

मेरे कुछ दोस्त कहीं खो गए हैं,

कुछ हिन्दू तो कुछ मुसलमान हो गए हैं,

बुलाते थे जिन्हें ओये, अबे, साले, गोरे, काले,

कुछ भगवे तो कुछ हरे हो गए हैं,

मेरे कुछ दोस्त कहीं खो गए हैं

 

बड़े प्यारे थे, दो चार नहीं बहुत सारे थे,

दिखाई देते थे सुबह शाम यूँ ही बकबकाते,

किसी काम के नहीं थे आवारा फिरते थे,

कुछ पुजारी तो कुछ मौलवी हो गए हैं,

मेरे कुछ दोस्त कहीं खो गए हैं

 

गली में जम के हुड़दंग मचाते थे,

होली में नहाते, ईद में मीठा खाते थे,

हाथ कंधे पे रख शहर भर घूम आते थे,

कुछ हवनसामग्री तो कुछ हाजी हो गए हैं,

मेरे कुछ दोस्त कहीं खो गए हैं

 

छत पर सब एक साथ सोते थे,

लड़ाईझगडे में पिट एक साथ रोते थे,

मेरे दादादादी, नानानानी उनके भी होते थे,

छोटे थे जो कभी वो सब बड़े हो गए हैं,

मेरे कुछ दोस्त कहीं खो गए हैं

 

मम्मीअम्मी के पूरीपराठें खाते थे,

पापाअब्बू से सब घबराते थे,

रोज़ मिलते हस्ते खिलखिलाते थे,

कुछ जल गए, कुछ दफ़्न हो गए हैं,

मेरे कुछ दोस्त कहीं खो गए हैं

~ दिल्ली…

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Google Images “no copyright infringement is intended”

 
पुरानी दिल्ली की नयी सड़क,
शोख़ियाँ, अन्दाज़, ख़ूब तेरी तड़क भड़क,
दिल्ली पुरानी की नयी सड़क…
 
बल्लीमारा, फ़तहपुरी, क़ुचा-ए-नील,
लहंगें, ज़री, ज़रदोज़ी ये गाइड-कुंजियाँ,
नल्ली नहारी, पराँठे, कुलचे तेरे जामुन-ए-गुलाब,
गोल जलेबी सी तेरी गलियाँ लाजवाब…
 
ताँगे, रिक्शे, गाड़ियाँ, स्टेशन की भीड़,
कोठे, जिस्म, भूख और के लाचारी ग्राहक,
कभी आयें चखने मद-मय-हुस्न खाने,
बस क़ीमत चुकायें यहाँ रिश्ते नहीं निभाने…
 
चौक चाँदनी पाँचवाँ चाँद, बावली खारी,
क़िला-लाल, बाज़ार उर्दू, नीम-हकीम, और
गली क़ासिम जान, ग़ालिब की हवेली जहाँ,
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरिजा साथ रहते यहाँ…
 
पुरानी दिल्ली की नयी सड़क,
शोख़ियाँ, अन्दाज़, ख़ूब तेरी तड़क भड़क,
तू – दिल्ली पुरानी की नयी सड़क…
 

~ धर्म…

दो ही धर्म है

अमीर होना या ग़रीब होना,

होना बदनसीब या ख़ुशनसीब होना

उनसे दूर होना या उनके करीब होना,

सब जैसा होना या अजीबो गरीब होना

होना आबाद या निस्तोनाबाद होना,

किसी के बस में या बिलकुल आज़ाद होना

टहनी से लटका या गिरा हुआ फल होना,

ताज़ा आज या गुज़रा हुआ कल होना

सड़क का कंकर या मील का पत्थर होना,

भला चंगा होना या बद से बदत्तर होना

भोलाभाला होना या तेज़तर्रार होना,

काम का होना या बिलकुल बेकार होना

गोराचिट्टा होना या अँधेरी रात सा,

या इस जात का उस जात का

दो ही धर्म है

बाकी सब पहनावे हैं,

बहकाने के छलावे हैं…

~ ख़त…

~ ख़त…

हवाओं में आज इक मीठी सी महक है,

देखुँ ख़त आया होगा…

वो दूर कुछ नज़र आ भी रहा है,

धूल भी उड़ रही है,

धड़कने अब मेरी बड़ने लगी,

मैं भागी भागी इस सोच में थी,

बताया नहीं इस बार की आने को हैं,

फिर सोचा ये तो ऐसे ही हैं, पगले कहीं के…

बता देते….

तो कुछ अच्छा सा बना लेती,

और ख़ुद को थोड़ा सज़ा लेती,

बता देते….

तो रात भर ना सोती मैं,

और मीठे सपनो में खोती मैं,

बता देते….

तो टिका तिलक मँगा लेती,

और फूलों से सेज सज़ा लेती,

बता देते….

तो सारे ख़त में पड़ लेती,

और सपनो में तुमसे लड़ लेती,

ये सोच सोच अब धड़कने मेरी तेज़ हुई,

वो धूल उड़ाती, गाड़ी, आ रुकी…

दो जवान, गर्दन झुकी और सीना तान,

आगे बड़े, आ कर पास,

दे गए, तिरेंगे में लिपटा…एक ख़त…

~ मैं हूँ – मंटो पसंद…

अक्सर बेहतरीन क़िस्से चालीस पार करते ही ख़त्म हो जाते हैं, तो अगर आप चालीस पार कर पचास को छूने वाले हैं तो अपने आपको ख़ुशनसीब समझें, खुदा का करम है आपपर अभी आपने बहुत कुछ देखना है…

लेकिन हाँ ख़ुशनसीब ही समझें, आप बेहतरीन नहीं हैं और ना ही कभी होंगें, बेहतरीन होना और ख़ुशनसीब होना दोनो मुख़्तलिफ़ बातें हैं, बेहतरीन होना है तो ये तय कर लें जो भी आपका हुनर है उसे चालीस तक तराश कर उस मुक़ाम तक ले जाएँ, की खुदा का पैगाम आये…बंदे तेरा काम हो गया है, अब “तू आजा”…

वापसी के माने, दूर, ज़मीन से दूर, पानीयों से दूर, पहाड़ों से दूर, काले सफ़ेद बादलों को चीरता, कभी मिट्टी तो कभी आग के ज़रिए सबकी आँखों में धूल या धुआँ झोंकता हुआ, “तू आजा”…

तेरा वजूद उस स्कूल टीचर जैसा हैं, जो पहले समझने के लिए पड़ता है और फिर ताउम्र समझाने के लिए पड़ता है, और ऐसे शकसियतें बहुत ही कम होती है जो समझ और समझा दोनों सकें…

अक्सर पाला ऐसे समझदारों से ही पड़ता है जिन्होंने “समझने के वक़्त” को एक ऐसी दौड़ समझा की जिसमें अव्वल आना ही इकलौता मक़सद रहा, और हक़ीक़त का इस दौड़ से दूर दूर तक कोई तरजुमा नहीं है – जनाब आप मुझे ही ले लें… 

हर वो ऐब जो मौजूद है या सोचा भी जा सकता है, उन सभी ऐबों की वजह से मैं हूँ, मेरा वजूद बरक़रार है और मेरे ऐब भी…ऐब भी ऐसे जो मेरे अकेले के वफ़ादार नहीं, हर शक्स कोई ना कोई ऐब ले के घूमता है लेकिन मेरा वजूद ख़तरे में तब होता जब हर शक्स ऐब के साथ कोई हुनर भी पाल लेता, हुनर झूठे नहीं होते…लोग मुझे पड़ते हैं, कोई मेरे अफ़सानों से इखलाक रखता है तो कोई ख़िलाफ़त, मगर पड़ते हैं…

और मेरा मक़सद? 

मेरा तो शायद कोई मक़सद था ही नहीं, मैं पड़ता रहा, लेकिन मैंने कभी पड़ाया नहीं, हाँ मैंने लिखा ज़रूर है, और मेरा लिखा वो आयिना है जिसे लोग देखते हैं, मुझे पड़ कर पढ़ाते हैं…

मैंने अपना लिखा अफ़साना या कहानी आप उसे जो भी समझें या ना भी समझें, काग़ज़ पर उतार देने के बाद उसे फिर नहीं पड़ा…शायद पसन्द नहीं…

मैं…

“ना मैं तरक़्क़ी पसन्द हूँ, ना जिद्दत पसन्द, ना रजत पसन्द और ना ही तज़रीबियत पसन्द…मैं तो बस मंटो पसन्द हूँ”…

~ तुम ज़रा दर्द दो ना…

सोच बंद, शब्द फरार, कलम सुखी, पन्ने खाली फड़फड़ा रहें हैं,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

जिस्म ढीला, आँखें नम, ज़बान पे ताला, हर काम मैंने टाला,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

होश हो के भी नहीं, ढूँढने लगता हूँ जो गुमा ही नहीं,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

बत्तियाँ सारी गुल, उजाले से कोफ़्त अँधेरे से प्यार,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

शोर चुभता, ख़ामोशी खलती, वो आज बात नहीं जो कल थी,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

भूख नदारद, प्यास भी रूठी, झूठ लगे सच्चा, सच्ची बातें झूठी,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

इतना सा अफसाना है,

सच कहता हूँ सच के सिवा कुछ नहीं,

दर्द जब तक निगाह में नहीं होता,

लिखना चाहूँ लिखा नहीं जाता,

अब और गिड़गिड़ा भी नहीं पा रहा हूँ,

बिन रेत घंस रहा बिन पानी डूब रहाँ हूँ,

बचा लो, निकालो भँवर से,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

रख के काग़ज़ पे क़लम, इस उम्मीद से हूँ,

अभी उठेगा एक दर्द और सब मीठा हो जाएगा,

सोच, शब्द, क़लम, पन्ने, खिल उठेंगें,

और एक क़िस्सा नज़र होगा,

आज़मा के देख लो,

कितना हंसी वो मंज़र होगा…

जैसे…कुछ ऐसा सा…

ये सर्दियों की सुनहरी धुप और तुम्हारी गर्मियाँ,

ख़ूबियाँ तेरी हज़ार, अनगिनत मेरी कमियाँ…

~ December-Twenty-Five…

~ December-Twenty-Five…

He swayed left from right and jumped up and down,

He had a mask put on and wore a colourful gown,

He made everyone laugh; it would be always a piece of fun,

He was a short height miniature smaller then than a gun,

He acted like a fool as he had to make his living,

He kept all his pain and smiles, he was always giving,

Sometimes on a horse or on a sleigh he would stand,

Sit he would sit, laugh he would laugh, he followed all the commands,

He was almost fifty two and his birthday was on twenty-fifth-december,

And he had his pretty corner to cry as no one cared to remember,

He was born on a Monday and the day was christmas,

Well, he was a loner all his life and never made no fuss,

His mother left him when he was born, new and alive at Six-Forty Five,

The circus opens in the morning at ten, someone just screamed where the hell is Uncle Ben,

Its morning, the time is six-forty-five; alone in his tent he breathed his final sigh,

And, the banner outside his tent just read; welcome its December-twenty-five…