~ साये…

 

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साये ये रात के साये,

कहाँ ले आए हमें ये रात के साये,

घनेरे कलेरे डरे डरे से ये घबराये,

ओड़ चादर फटी ये ठुकराये,

ये साये रात के

 

बिना बात कभी पीछे पड़े,

धुआँ उड़ाते, चेहरा छुपाते, लड़खड़ाते,

गिरते गिरते से, सम्भलते से, डगमगाते,

दूर से झाँकते, क़रीब आ सो जाते,

हाय ये राते के साये

 

एक सच को छिपाए हुए,

बिन बुलाये ये आये हुए,

एक मरियल लकीर से, फ़क़ीर से,

भूख से लिपटे, कालिख से चिपटे,

ये काले काले साये

 

आमने, सामने, घूमते गोल गोल,

कभी बैठे, कभी खड़े, मुँह खोल,

जैसे अभी ये जाएँगें निगल,

वो पहली किरण, इनका आख़िरी शंड़,

और रह जाती ना जाने वाली, काली रात

 

हाय, ये काली के रात के साये

~ इत्तफ़ाक़…

Coincidence

Picture Credit : Google Images

 

पड़ गया मेरे आराम में आज फिर खलल पड़ गयाफिर बैठे बैठे हुआ खड़ा आज फिर मन बदल गया,

चलने ही वाला था पर जैसे ही उठाया पहला कदमपिछले वाला अगले वाले से बेवजह ही लड़ गया

 

नीली पतलून, पिली क़मीज़ अंदर सफ़ेद बनियानजूता पहना भुला जुराब, साली किस्मत है ही ख़राब,

घुमा, मुड़ा और जैसे तैसे चल पड़ा देखा बटुआ पड़ाकिसका है ? मेरा तो हैं नहीं, बटुआ था तस्वीरों भरा

 

कल ली थी रेल की टिकट घूमने जाने को कहींजाने क्यों अब कहीं जाने का बिलकुल मन नहीं,

क्या करूँ, क्या नहीं, फाड़ा टिकट उतारी जैकेट,  उतारा जैसे ही जैकेट गिरा उसमें से एक पैकेट

 

पैकेट में थी नाटक की टिकट, नाटकइत्तफ़ाक़”, डिरेक्टर बेबाक़, ऐक्टर तपाक, क्रू फटफट फ़टाक,

ऑडीयन्स में भी जोश था, बस, दरबान ख़ामोश थापूछा तो बोला, बेटा था ना रहा, तस्वीरें थी अब वो भी नहीं

 

याद है ? बटुआ तस्वीरों से भरा, उठाया था, बताना भुल गयाउसकी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा, होश था अब जोश था,

बेटा, उसका लड़खडाता था, ठीक से चल ना पाता थाशौंक उसे सिर्फ़ तस्वीरों का था, “इत्तफ़ाक़ये तक़दीरों का था

~ फंदा…

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~ फंदा…

आज मैंने ख़ुद से अपनी पहचान ले लीमर गया हूँ मैं, मैंने अपनी जान ले ली,

कैसे बताऊँक्यूँ किया, जो भी कियाकैसे बताऊँक्यूँ जिया, जैसे भी जिया

 

वजह तलाशता रहा ज़िंदगी भर जीने कीमिली एक ख़ूबसूरत, मगर बेवजह निकली,

कल रात भर मकान की छत ताकता रहाज़मीन से कितनी ऊपर है ये नापता रहा

 

देखे मैंने अजीबगरीब मंज़र देखे हैंमखमली हाथों में मैंने खंजर देखे हैं

कुछ मीठे पिए, कुछ कड़वे घूंट पीयेजो बचे थे लम्हे, आज मैंने लूट लिए

 

सारा कसूर वसीयत में अपने नाम कर लियाअपनी सारी यादों को तकसीम कर दिया,

रूह को भी अपनी आज नीलाम कर दियाखाली था खालीपन को कुछ ऐसे भर दिया

 

हवा में हूँ अभी, कुछ देर में रेत हो जाऊंगानिकल रहा हूँ, धीरे धीरे फिसल जाऊंगा,

बस यहाँ से छत की दुरी कम ना पड़ेऔर रस्सी ज़रा सी भी कम ना पड़े

~ One Horse Town…

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Picture : Leonardo da vinci horse drawing

~ One Horse Town…

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~ Can you see that horse?

Yes

~ but why can’t I see it?

What? It’s right there. In-fact, you only pointed me towards it. What kind of a joke is it? Ohh, wait, are you blind? But if you were, how would  have you known there is a horse, is it your horse? You tied him up there? Hey, forget that horse, why did you want me to look at it? Only to tell me you can’t see it?

~ Can you see the horse now?

Yes, I said I can, wait where has the horse gone? Hey, is this a joke, hey where are you, hello…hello…somebody there?

Was there a horse? Who was this man? Where have they both gone? Huh…from now on, I will never stop to talk to a stranger.

 

~ Hello Gray…how are you doing this morning? What Can I get you?

Morning Roan…can I get scrambled eggs and toast please…

~ Sure, something to drink?

Yeah, orange juice.

~ Okay, be with you shortly.

Yeah, thanks.

 

~ Hey Gray, how are you? Is the horse parked outside, yours? Must be, theres no-one in here this early… from where did you get it?

What horse Buckskin…when did you see me riding a horses man, come here let me smell if you are you drunk…

~ Woah, stay away from my mouth, I smell good, Gray!. It’s the Horse what I’m talking about, the one that is parked outside, look through the glass, there he is or she is or whatever it is…is it not yours?

It’s not mine and i don’t even want to look at it…

(I sneaked and I could see some shadow as if it was a horse…I ran outside to see but it again vanished…)

There is no horse parked outside, what was it, a game you wanted to play with me…

~ There was but now it’s gone may be, it wasn’t anyways yours so the owner must have taken him along.

 

~ Your scrambled eggs, toast and arrange juice, Gray. Enjoy !

Thanks Roan…

All this morning the stupid horse has been hounding me and he is not even there, why can’t I see what everyone else can? Is there really a horse, is he following me or its just everyone is trying to fool me…

 

~ Morning Gray!

Morning Brindle, any calls or messages for me?

~ Yes, Mr. White is waiting for you in his chamber and your dad called saying that you have a horse parked in your driveway. You have a horse Mr. Gray?

I’ll go and check with Mr. White in 5 minutes, let him know that and can you get my Dad on the phone for me, and I don’t have a horse Brindle.

~ Sure Gray! And your Dad is on line 2.

 

Hey Dad, you called about some horse, what horse? who’s horse is in our driveway? How did he get in there?

~ I don’t know, that’s what I’m supposed to be asking you. So you are saying you don’t know anything about it, okay, let me call the cops and get done with it.

Okay, hey wait…hang on…hey Dad…let me call you shortly and will tell you what to do. Okay?

~ Okay, as you say, bye.

Bye…

Not again, I will go see Mr. White and go home…

 

Morning Mr. White you wanted to see me.

~ Morning Gray Yes I did, can you get me a story on Friday for our Sunday supplement? I know its not really your job but I’m kinda stuck, Skewbald was supposed to write this piece but last I heard from him was almost 4 days back and he says that he is suffering from a block, writers block, I can’t pull him out of it but I’m sure you can pull. something up on your sleeve! Can you?

Sure, I can give it a shot.

~ Great, I knew you are a dark horse, Gray. 

What? Really? 

~ What really Gray! all okay?

Yes Yes, nothing I will do it. I’ll give it to you by Friday afternoon. Ummm…can I ask you for a day off today, I can work from home. I’ve just learnt there is a horse parked in my driveway and I’ve got to see whats it all about…

~ Sure, thing.

Thanks, see you tomorrow…

As if I’ve had not enough of horses since morning only to learn that I’m a dark horse, wow…

And to top all of that, I need to write…what should I write about…Blindspot…Yes, Blindspot…that is going to be the title…

 

Hey Dad…where is the horse? I didn’t see anything in the driveway…

~ What horse?

The horse in our driveway, didn’t you call  my office to tell me that dad? 

~ I did call your office but you never returned my call and what horse are you talking about?

Then what did you call me for?

~ I wanted to ask you if you had seen my Classic Champagne. I somehow don’t remember where I have kept it?

Classic Champagne, what is that dad? Last I remember you stopped drinking since mom left us…

~ Yes, but I had kept one to drink with you someday, I had thought tonight we would drink, just felt like.

Anything special today? 

~ Not really, but if your mom would have been alive she would have wished me on my 90th birthday. 

~ Remember, she always said “you old piece of junk, no one would remember you, if you exist old enough” and laughed…

~ घुसपैठिया…

~ घुसपैठिया…

मेरे दिल को वो अपना है घर कर बैठा,
सामान मेरा सब इधर उधर कर बैठा,
ना चाबी लगायी ना तोड़ा उसने ताला ,
ना जाने कैसे है वो बसर कर बैठा…
घुसपैठिया…

ना उठाया मुझे ना मुझको जगाया मुझे,
ना चीख़ा पुकारा, ना आवाज़ लगायी,
ना जाने कैसे तय वो ये सफ़र कर बैठा,
वो रुख़ कैसे अपना इधर कर बैठा है…
घुसपैठिया…

मेरे तकिए पे वो अपना सर कर बैठा,
अलमारी में मेरी अपनी बुशर्रत टाँग के,
पतलून को मेरे कुर्ते की नज़र कर बैठा,
कैसे वो इस घर को अपना घर कर बैठा…
घुसपैठिया…

मेरे पसीने को अपना इत्र बनाके, उसको लगाके,
वो ख़ुशबू को मेरी है अपनी ईत्र कर बैठा है,
बरामदे में मेरे उसने अपनी चारपायी बिछायी,
मेरी रातों की नींद में अपनी वो सहर कर बैठा…
घुसपैठिया…

मेरी माँ को वो अम्मी है कह कर बुलाता,
मेरे डैडी को अपना फ़ॉदर कर बैठा है,
ख़ुद मेरी जान मुझको जानेजिगर कर बैठा,
मेरी कश्ती में तैर वो सारा सफ़र कर बैठा…
घुसपैठिया…

वो बारिश में अपनी मुझे तर-बतर कर बैठा,
वो आलू और मुझको है मटर कर बैठा ,
मैं बिखरी हुई थी वो मुझको बाहों में लेके,
गुम थी कहीं मैं, मुझको वो ताज़ा ख़बर कर बैठा…
घुसपैठिया…

~ जिस्म-फरोशी…

 

दुश्मनों को भी दोस्त बना देती है,

राजनीती है ये कुछ भी करा देती है,

भाई को भाई से दरकार नहीं होती,

ये आम आदमी की सरकार नहीं होती

 

यहाँ गरीब ही आना, गरीब रहना पड़ता है,

बदनसीबों का बन के नसीब रहना पड़ता है,

और जिन के भरोसें इनकी गाडी चलती है,

छुपछुप के उनके करीब रहना पड़ता है

 

नयेनवेलों को परवाज़ की हिदायत नहीं होती,

आचरण में दाग ना हो तो कोई इनायत नहीं होती,

पर्दा है, परहेज़ है, सफ़ेद कुर्ता शराफत का दस्तावेज़ है,

काले को सफ़ेद बनाती है, राजनीती सब को कहाँ आती है

 

खाने के खिलाने के पुख्ता इंतज़ामात होते है,

शराफत सड़क पर नंगी सोती रौनक महलों में होती है,

यहाँ ना भाई भाई का हुआ बाप को बेटे से खतरा होता है,

राजनीती जिस्मफरोशी है कोई किसी के साथ भी सोता है

~ कबूतर…

आज अपनी छत के मैंने सारे कबूतर भगा दिए,

दो चार नहीं थे पुरे साठसत्तर भगा दिये,

उनके घोंसले को भी दूर नदी में बहा आया,

कहीं लौट ना आयें इसलिए फासले बड़ा दिये

 

जगह खाली है अब तो सोच रहा हूँ,

देखभाल के किरायेदार मैं रख लूँ,

किराया कम हो या ना भी दे तो गम नहीं,

नोच के खाने लगे थे जो रिश्तेदार भगा दिये

 

अब छत भी मेरी और पूरा घर भी मेरा है,

अब तो आने वाला हर खत भी मेरा है,

इत्मीनान से बड़ी ही फुरसत में रहता हूँ,

बेवजह मसरूफियत वाले कल मिटा दिए

 

सुबह से शाम फिर रात से अगले सहर तलक,

ना शोर होता है ना घनी ख़ामोशी होती है,

चिकचिक किलकिल मरना तिलतिल,

ज़िन्दगी से मैंने ऐसे सारे पल हटा दिये

 

अब कभी भी बिज़ी कभी भी फ्री हो जाता हूँ,

अपने मन की करता हूँ जो जी में आये खाता हूँ,

घर अब महल सा लगता है खुद को राजा बताता हूँ,

अब खुद गलती करता हूँ और खुद को सज़ा सुनाता हूँ

 

अकेलापन मुझे चाहने लगा है अब खुद से ही बतियाता हूँ,

जो भरी भीड़ हूँ कभी, तो भी अकेला खुद को पाता हूँ,

बैठा सोच रहा हूँ खिड़कियां बंद कर दूँ दरवाज़े भी चूनवा दूँ,

दिन को रात में बदल लूँ कुछ ऐसी अपनी दुनिया बना दूँ

~ Cham Cham Chew…

I chew, chew; Cham Cham chew,

Sometime Cham then squeak, rumble and whomp; yes I chew…

 

I Chewed the nails; while in my deep thoughts,

The  end of a pencil; to solve a puzzle…

 

I Chewed few books ; om nom nom some I tasted,

some swallowed and some I digested…

 

I chewed Tobacco and a pipe;when my world was wild and ripe,

Once I met a whore; chewed her brains as I chewed her soul…

 

I even chewed my thoughts,

Wondered, pondered  till my body soared with adrenaline rush…

 

Next time you find me chewing, remember!

do not chastise me; after all, it is my body at work…

 

Knowing that chewing helps thinking,when the thinking gets hard;

I chew, chew; Cham Cham chew…

I chew my brain…

~ Shhh…

Yellow light, passing through pellucid crystal glass,

the serenity and sound of silence, hallelujah!..the Shhh…

 

Flimsy air, a delicate fondle, touched her hair,

the morning herd, Sunday prayer, mass…the Shhh…

 

Magically orchestrated, brick by brick, her body,

two awning windows, bordered red, lips…the Shhh…

 

An elbow prod, the tingle the prickle, a silent moan,

latched eyes, stripped we canoodled, drip…the Shhh…

 

Hazelnut eyes, fiery touch, cuddled sheets,

light shimmered on her, we screamed, more…and the Shhh…

~ तहखाना…

जो हमसे मिलना है तो कभी तहखाने में आओ, आओ कभी मेरे मयखाने में आओ,

वहाँ सूरज की रोशनी नहीं हैं, तीन चराग हैं, आओ एक और चराग जलाओ,

शब्रात में चार चाँद लगाओ, तुम आओ तो सही, चले आओ

 

और हाँशर्म, हया का कुर्ता बाहर ही टाँग आना, हम ख़ुशी से ढक देंगे,

ना झिकको आजाओ, तहखाने की हालत यूँ तो ख़राब रहती है,

और न बिगड़े इसिलए वहाँ शराब रहती है, लड़खड़ाते चले आओ

 

घना, घुप्प अँधेरा रौशनी खा जाता है, बस भूख वहाँ बेहिसाब रहती है

इधर उधर बिखरे है कईं किस्से, लिपटे हुए कागज़ के टुकड़ो में,

एक संदूक, एक रजाई, एक कम्बल, दो सिरहाने हैं, चारपाई वहाँ अकेली सोती है

 

न ज्यादा सर्दी होती है, न गर्मी वहाँ और ना ही बाहर की हवा आतीजाती है,

ना शोर है ना ख़ामोशी, एक अनोखी सी जगह है वो दो गज़ ज़मीन तले,

गिरते पड़ते, चार कंधो पे हो के सवार, कब्र में मेरी लुढ़क जाओ, चले आओ

 

जो हमसे मिलना है तो कभी तहखाने में आओ, आओ कभी मेरे मयखाने में आओ