~ किताबें…

~ किताबें…

किताबों की चादर किताबों का सिरहाना, किताबें ही ओड़ के सो जाती हूँ,
किताबों की सी दिखती हूँ, किताबों का हुआ जो ज़िक्र फिर उनमें खो जाती हूँ…

कल सुबह एक, दोपहर में दो और रात को देड़ ख़िताब खायी थी,
बीच में जो कहीं लगे भूख तो आधी किताब जेब में भी छुपायी थी…

कुछ किताबें मोटी हैं, कुछ पतली, कुछ लम्बी कुछ छोटी, ना एक खरी ना खोटी,
सब की सब बातूनी हैं, बहुत बोलती है, सब की सब कोई न कोई राज़ खोलती है…

किताबें ये सच में सिर्फ़ काग़ज़ के टुकड़े ही हैं ना, कहीं इनमें सच में तो जान नहीं,
कैसे मुमकिन है की ये सब कुछ जानती हैं, कहीं ये भी तो इंसान नहीं…

मैं भी तो एक किताब ही हूँ, चलता फिरता क़िस्सा हूँ जीती जागती एक कहानी हूँ,
ख़ुद को लिखती हूँ, ख़ुद सहफ़ा पलट ख़ुद को पड़ती, ख़ुद हर कहानी में ख़ुद से लड़ती हूँ…

अपनी इस किताब के चालीस सहफ़े चुकी हूँ पलट, कुछ पलटे आहिस्ता कुछ सरपट,
कुछ पलटते पलटते मुड़ गए, कुछ उधड़े कुछ सीए, चन्द इत्मीनान से जिये…

मैं और मेरी ये खुली किताब, और मेरी किताब में आखिरी हर्फ़ होगा इश्क़, तेरे नाम के साथ,
और जब लिखूंगी आखिरी सहफ़ा होगी आँखों में तस्वीर तेरी, हाथों में जाम के साथ…

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~ मरकज़-ए-जाँ…

 

किताबें चारों ओर और बीच में हूँ मैं,

जैसे लहलहाते खेतों में इकलौता पेड़,

जैसे तैरती पतंग तारों के बीचों बीच,

गोल सब, किस तारें से हूँ दूर किसके करीब,

दुनियाँ अजीबो-गरीब और बीच में हूँ मैं…

 

हर पन्ना फड़फड़ा रहा बहती हवा के साथ

मैं किताबों से और किताबें मुझसे करती बात,

हर हर्फ़ उछल उछल बना रहा अपनी ही तान,

कभी किस्सा कभी कहानी सुनते मेरे कान, 

कितने सारे हिस्से मेरे और बीच में हूँ मैं…

 

इधर उधर सीधे खड़े कुछ लेटे, भरे हुए पेन,

कुछ सच्ची कहानियाँ, बाकी कुछ तो हैं वहम,

कुछ आप बीती हैं कुछ जैसे सुनी सुनायीं हैं,

कुछ किताबें पड़ ली हैं कुछ यूँ ही सजायी हैं,

बनावट की सजावट और बीच में हूँ मैं…

 

कुछ किस्से कहानियाँ लिखनी बाक़ी हैं अभी,

दर्द और अभी झेलने होंगे कह पाएंगे तभी,

कुछ टूटे कुछ बिखरे अल्फ़ाज़ समेटने भी हैं, 

कुछ बातें किस्से-कहानी की माला में पिरोनी हैं,

वो एक आखिरी क़िस्सा जिसके बीच में हूँ मैं…