~ तो क्या बात थी…

तुम ईद का चाँद होती – तो क्या बात थी,
जो ना कह पाया तुम वो बात होती – तो क्या बात थी,
तुम आते जाते नज़र आती फिर ठहर जाती – तो क्या बात थी,
तुम मेरी पहचान मेरी जात होती – तो क्या बात थी,
तुम यहीं कहीं होती – तो क्या बात थी,
तुम आसमान तुम ज़मीन होती – तो क्या बात थी,
जो हम पहले मिले होते – तो क्या बात थी,
जो हम सिलसिले होते – तो क्या बात थी,
जो तुम होती कोई क़िस्सा – तो क्या बात थी,
जो तुम होती मेरा हिस्सा – तो क्या बात थी,
तुम कहानी मैं किरदार – तो क्या बात थी,
मैं कबीला तुम सरदार – तो क्या बात थी,
मैं तारा तुम चाँदनी होती – तो क्या बात थी,
जिसे देखूँ तुम होती हर वो नज़ारा – तो क्या बात थी,
तुम होती समन्दर और किनारा भी – तो क्या बात थी,
तुम होती जो हवा और मुझको उड़ाती – तो क्या बात थी,
तुम अमावस भी चाँदनी रात भी होती – तो क्या बात थी,

और तुम, तुम क्या निकली मेरी पहली मुहब्बत निकली,
मुहब्बत जो मुझे इस जहाँ से रूखसत होते-होते मिली…

तुम मुझे पहले क्यूँ नहीं मिली?
जो तुम मुझे पहले मिल जाती,

कोई तो होता जो कहता, काश…
ये जो जल रही है, ये लवारिश नहीं है लाश…

~ साये…

 

fullsizeoutput_e30

 

साये ये रात के साये,

कहाँ ले आए हमें ये रात के साये,

घनेरे कलेरे डरे डरे से ये घबराये,

ओड़ चादर फटी ये ठुकराये,

ये साये रात के

 

बिना बात कभी पीछे पड़े,

धुआँ उड़ाते, चेहरा छुपाते, लड़खड़ाते,

गिरते गिरते से, सम्भलते से, डगमगाते,

दूर से झाँकते, क़रीब आ सो जाते,

हाय ये राते के साये

 

एक सच को छिपाए हुए,

बिन बुलाये ये आये हुए,

एक मरियल लकीर से, फ़क़ीर से,

भूख से लिपटे, कालिख से चिपटे,

ये काले काले साये

 

आमने, सामने, घूमते गोल गोल,

कभी बैठे, कभी खड़े, मुँह खोल,

जैसे अभी ये जाएँगें निगल,

वो पहली किरण, इनका आख़िरी शंड़,

और रह जाती ना जाने वाली, काली रात

 

हाय, ये काली के रात के साये

~ मरकज़-ए-जाँ…

 

किताबें चारों ओर और बीच में हूँ मैं,

जैसे लहलहाते खेतों में इकलौता पेड़,

जैसे तैरती पतंग तारों के बीचों बीच,

गोल सब, किस तारें से हूँ दूर किसके करीब,

दुनियाँ अजीबो-गरीब और बीच में हूँ मैं…

 

हर पन्ना फड़फड़ा रहा बहती हवा के साथ

मैं किताबों से और किताबें मुझसे करती बात,

हर हर्फ़ उछल उछल बना रहा अपनी ही तान,

कभी किस्सा कभी कहानी सुनते मेरे कान, 

कितने सारे हिस्से मेरे और बीच में हूँ मैं…

 

इधर उधर सीधे खड़े कुछ लेटे, भरे हुए पेन,

कुछ सच्ची कहानियाँ, बाकी कुछ तो हैं वहम,

कुछ आप बीती हैं कुछ जैसे सुनी सुनायीं हैं,

कुछ किताबें पड़ ली हैं कुछ यूँ ही सजायी हैं,

बनावट की सजावट और बीच में हूँ मैं…

 

कुछ किस्से कहानियाँ लिखनी बाक़ी हैं अभी,

दर्द और अभी झेलने होंगे कह पाएंगे तभी,

कुछ टूटे कुछ बिखरे अल्फ़ाज़ समेटने भी हैं, 

कुछ बातें किस्से-कहानी की माला में पिरोनी हैं,

वो एक आखिरी क़िस्सा जिसके बीच में हूँ मैं…