~ जिस्म-फरोशी…

 

दुश्मनों को भी दोस्त बना देती है,

राजनीती है ये कुछ भी करा देती है,

भाई को भाई से दरकार नहीं होती,

ये आम आदमी की सरकार नहीं होती

 

यहाँ गरीब ही आना, गरीब रहना पड़ता है,

बदनसीबों का बन के नसीब रहना पड़ता है,

और जिन के भरोसें इनकी गाडी चलती है,

छुपछुप के उनके करीब रहना पड़ता है

 

नयेनवेलों को परवाज़ की हिदायत नहीं होती,

आचरण में दाग ना हो तो कोई इनायत नहीं होती,

पर्दा है, परहेज़ है, सफ़ेद कुर्ता शराफत का दस्तावेज़ है,

काले को सफ़ेद बनाती है, राजनीती सब को कहाँ आती है

 

खाने के खिलाने के पुख्ता इंतज़ामात होते है,

शराफत सड़क पर नंगी सोती रौनक महलों में होती है,

यहाँ ना भाई भाई का हुआ बाप को बेटे से खतरा होता है,

राजनीती जिस्मफरोशी है कोई किसी के साथ भी सोता है

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~ 3 Pounds…

Of-course you have to use one,

It isn’t safe my dear, otherwise,

I wouldn’t have bothered if you had none,

Since I know, you have to use one…

 

Hey, don’t be a lazy bum,

What’s the matter with you, catch a breath,

Count until ten, fine, only until three,

It isn’t going to cost you anything, it’s free…

 

Don’t rush, no, you won’t do without, use it,

It’s right up there, don’t mess with your hair,

Will you please stop, please, hold it right there,

Let me help you, come here, bare…

 

You know what’s the problem, we avoid an effort,

It may seem brave in haste, it’s nasty,

Why to later regret, make choices that are sane,

You have one, use it, I’m talking about your…brain…

~ शमशान…

 

मेरे घर के रास्ते में शमशान है, 

बेदर्द रोज़ लेता किसी की जान है,

आदमी को मिट्टी में मिला देता है,

सबको उनकी औक़ात दिखा देता है…

 

कभी भीड़ तमाम कभी दो चार आदमी,

बता देता है किसकी कितनी जान-पहचान है,

लौट जाते हैं फिर किसी रोज़ लौट आने को,

भूलना ही पड़ता है सच साँस चलाने को…

 

लटका चेहरा, दर्द गहरा, वक़्त ठहरा सा,

दो चार दिन, कुछ और ग़म, हर कोहरा छट जाता है,

आज किसी अपने को, कल किसी के अपने को,

छोड़ना वहाँ आता है, फिर काम में लग जाता है…

 

शमशान की इस बात पर मगर हँसी आती है,

उसके ठीक सामने एक हस्पताल भी हैं,

वहाँ से जान आती है यहाँ से चली जाती है,

ज़माने भर की फ़िक्र, बीच का का सफ़र, गोल सिफ़र…

 

शमशान के बग़ल में मुर्दाघर भी हैं,

दोनों की आपस में अच्छी बनती हैं,

जो एक में जलती है दूसरे में दफ़नायी जाती है,

राख मिट्टी की फिर मिट्टी में मिलायी जाती है…

 

हस्पताल और दोनों के बीच मैं एक सड़क है,

और एक चाय की दुकान, एक स्कूल, एक मयखाना हैं,

तीनों में एक चीज़ बड़ी अच्छी हैं,

देख लगता हैं वहाँ, दुनियाँ में सिर्फ़ ये तीनों सच्ची हैं…

 

सड़क के दूसरी ओर, इबादत और पूजा घर हैं,

आदमी अन्दर कुछ और बाहर कुछ और होता है,

लूटता है किसी को तो कभी खुद लूट जाता है,

फिर सड़क के उस पार जा चैन की साँस सोता है…

 

~ एक BAR…

Twinkle twinkle little stars,

I see, when I walk out of the bar,

All in pair, broken beyond repair,

no-one gives a thought, forget care…

भैया, दीदी, भूख लगी है कुछ खिला दो,

हमने किसी का क्या बिगाड़ा है, बता दो

 

…here he comes…

 

Trying , walking straight, swaying but didn’t fall,

Pushes himself in the car, he’s okay not drunk at all,

पीछे से वो आवाज़ लगाते है, बुलाते है,

आपके तो यहाँ रोज़ आते है, हम रोज़ भूखे सो जाते है

 

His morning is fine, a little head spin,

vomit maybe or a little puke in the bin,

और वो रात की आवाज़ फिर आती है,

तुम्हें प्यास और भूख हमें रोज़ सताती है

 

Nothing much comes to mind for rest of the day,

Evening, drives his car back to the bar…

ये एक-Bar की बात नहीं, हर bar की कुछ ऐसी ही कहानी है,

भूख निगलतेनिगलते भूख निगल जाती है जिनको, कुछ बच्चे ऐसे भी पलते हैं

~ बूढ़ा…

 

बूढ़ा जो देखन मैं चला, बूढ़ा ना मिल्या कोय,

फिर जो देखी अपनी लाठड़ी, रे मुझसे बूढ़ा ना कोय,

इब के, उठायी अपनी लाठड़ी, मैं चल पड़ो

 

बूढ़ा जो देखन मैं चला, बूढ़ा ना मिल्या कोई,

दो क़दम भी ना चला गयो, रे मुझसे बूढ़ा ना कोई,

लाठड़ी ने किया किनारे, मैं बैठ गयो,

इब के, मँगायी पहियों वाली कुर्सी, मैं रिडक पड़ो

 

बूढ़ा जो देखन मैं चला, बूढ़ा ना मिल्या कोई,

रे पहियों मुझसे ना हिलो, रे मुझसे बूढ़ा ना कोई,

चकराया, सब छोड़ के इब मैं चिल्लाया,

इब के, चारपायी ने मँगवाया, मैं लेट गया

 

चारों बेटन नू किया जमा, लेटे लेटे आँखंन ने मूँद लिया,

ना हाथा मैं ना टांगा में मेरे जान, रे ठीक ठाक सै माहरे कान,

यो ना कहना था, यो कह दिया, बुड़े कानन ने यो सुन लियो,

बूढ़े तू मरता काहे नी, तू मरे ज़मीना बाँटेंगे

 

इब के, चारों लौंडन नू किया जमा, गिरते पड़ते मैं खड़ा हुआ

रे सालों तुमको बड़ा किया, अपने पैरन पे खड़ा किया,

इब बूढ़ा हूँ तो के हुआ, समसान ते लेके जाओं इब,

इस बूढ़े ने तुम जलाओ इब

फिर बैठ ज़मीना लेना बाँट, और मेरी राख ने लेना चाट

~ मरकज़-ए-जाँ…

 

किताबें चारों ओर और बीच में हूँ मैं,

जैसे लहलहाते खेतों में इकलौता पेड़,

जैसे तैरती पतंग तारों के बीचों बीच,

गोल सब, किस तारें से हूँ दूर किसके करीब,

दुनियाँ अजीबो-गरीब और बीच में हूँ मैं…

 

हर पन्ना फड़फड़ा रहा बहती हवा के साथ

मैं किताबों से और किताबें मुझसे करती बात,

हर हर्फ़ उछल उछल बना रहा अपनी ही तान,

कभी किस्सा कभी कहानी सुनते मेरे कान, 

कितने सारे हिस्से मेरे और बीच में हूँ मैं…

 

इधर उधर सीधे खड़े कुछ लेटे, भरे हुए पेन,

कुछ सच्ची कहानियाँ, बाकी कुछ तो हैं वहम,

कुछ आप बीती हैं कुछ जैसे सुनी सुनायीं हैं,

कुछ किताबें पड़ ली हैं कुछ यूँ ही सजायी हैं,

बनावट की सजावट और बीच में हूँ मैं…

 

कुछ किस्से कहानियाँ लिखनी बाक़ी हैं अभी,

दर्द और अभी झेलने होंगे कह पाएंगे तभी,

कुछ टूटे कुछ बिखरे अल्फ़ाज़ समेटने भी हैं, 

कुछ बातें किस्से-कहानी की माला में पिरोनी हैं,

वो एक आखिरी क़िस्सा जिसके बीच में हूँ मैं…

 

~Besotted…

Feeling free like a kite, swaying left and then right,

He was a man so drunk, never ate no chunk,

Quite he kept, all alone he wept, stood like a tree,

His body was drowned, burnt and buried, soul he exhumed,

Wandering through the labyrinth of steep and dirty streets,

On stairs he stayed, in parts he lived, stripper, the girl he missed,

Love he had, love he gave, all of it, every bit

She left him, naked, all stripped, of love, all bit…

~ अख़बार…

 

सुबह की गरम चाय ने आज जैसे ही तलूये को छूआ, इक हलकी सी जलन का एहसास हुआ…

ठीक उतना ही…

जितना दिल का टुकड़ा बचा है, बाक़ी तो सब जला दिया था तुमने…
उतनी जितनी आस बाक़ी छोड़ी थी तुमने, सब उम्मीदें मिटा देने के बाद…

ठीक उतना ही…
जितनी ख़ुशी रह गयी थी यादों में लिपटी, बाक़ी सब तुम्हारे साथ लपेट भेजी थी…
जितना तल्ख़ पर रह गया था स्वाद तुम्हारे होंठों का, बाक़ी सुखी छोड़ दी थी तुमने ज़मीन…

ठीक उतना ही…
जितना सपनों में तुम्हें देखना बाक़ी रहा, तस्वीर तक तो कोई नहीं छोड़ी तुमने…
जितनी फ़िक्र रही तुम्हें मेरी, अपनी सारी फ़िक्र तुम छोड़ गए थे मेरे पास…

बस एक ख़लिश ही मेरी पूरी रही, बाक़ी की ठंडी चाय की तरह, जिसे बड़े ही आराम से सुबह के अख़बार के साथ रोज़ पीती हूँ…

 

~ Ohh life…

 

Ohh life…

I remember meeting you once, just across the street;

You looked as lively as a squirrel

Little to your knowledge I saw you walking;

Jumping, hopping long miles with criss crosses along your side

Your tiny little feet and petite hands;

two rubber bands and that mischievous smile

Bought back the meaning to my life;

Rejoiced, for my soul was alive

Times passed by and for once, I met you again;

Your were withered in despair

You found a knife and it didn’t miss you;

And Alas! You were gone

You cut the vein; as you couldn’t endeavour the pain

There was flood, a flood of blood, You were red,

DROP by drop, you ceased and came to a full STOP…

 

 

~ शायद, यक़ीनन…

 

एक ज़मीन का टुकड़ा कुछ उखड़ा, था, शायद

दो गज़ लम्बाई, दो हाथ भर चौड़ाई, यक़ीनन

 

बदमस्त हो वहां ज़िन्दगी सो रही थी, शायद

मौत चेहरों पे सिरहाने उसके रो रही थी, यक़ीनन

 

दूर से लगा, कुछ ऐसा वो मंज़र था, शायद

मिटटी में जा मिला मिटटी से वो बना था, यक़ीनन

 

भीड़ थी और कुछ चेहरों पे गीली लकीर थी, शायद,

बाकी रौनक आजा रही, रस्म निभा रही थी, यक़ीनन   

 

ताबूत में अब बस होने को वो बंद था, शायद

आज़ाद छंद था अब वो आज़ाद छंद था, यक़ीनन