~ बंदा…

~ बंदा

कुछ लोग कभी तन्हा नहीं होते,

जिस गाह होते है, उस गाह नहीं होते

घुटनोंघुटनों दर्द में घसे होते हैं,

घुटते हैं मगर फना नहीं होते

हारजीत के हंगामों से दूर रहते,

बेकार मुद्दों के वो दरमियाँ नहीं होते

दिलग़मआशना बखूबी छुपा लेते हैं,

कभी भी, कहीं भी, यूँ ही बरहना नहीं होते

शक्सियत से लापरवाह ज़रूर होते है,

मगर वो बेपरवाह नहीं होते

इल्मअदब,इल्मकलम के बादशाह,

किसी तख्तोताज के शहंशाह नहीं होते

मंदिर मस्जिद की जानिब से गुज़रते ज़रूर,

मगर जनाब ये हिन्दूमुस्लमान नहीं होते

करीबकरीब ख़ामोश से होते हैं,

मगर बेज़ुबान नहीं होते

सवाल का जैसे दुरुस्त जवाब हों,

वो कोई अंदाज़ा नहीं होते

खैर मनायें के ऐसे लोग चन्द होते हैं,

मलाल भी रखें कि बेइन्तिहाँ नहीं होते

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~ दिल्ली…

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पुरानी दिल्ली की नयी सड़क,
शोख़ियाँ, अन्दाज़, ख़ूब तेरी तड़क भड़क,
दिल्ली पुरानी की नयी सड़क…
 
बल्लीमारा, फ़तहपुरी, क़ुचा-ए-नील,
लहंगें, ज़री, ज़रदोज़ी ये गाइड-कुंजियाँ,
नल्ली नहारी, पराँठे, कुलचे तेरे जामुन-ए-गुलाब,
गोल जलेबी सी तेरी गलियाँ लाजवाब…
 
ताँगे, रिक्शे, गाड़ियाँ, स्टेशन की भीड़,
कोठे, जिस्म, भूख और के लाचारी ग्राहक,
कभी आयें चखने मद-मय-हुस्न खाने,
बस क़ीमत चुकायें यहाँ रिश्ते नहीं निभाने…
 
चौक चाँदनी पाँचवाँ चाँद, बावली खारी,
क़िला-लाल, बाज़ार उर्दू, नीम-हकीम, और
गली क़ासिम जान, ग़ालिब की हवेली जहाँ,
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरिजा साथ रहते यहाँ…
 
पुरानी दिल्ली की नयी सड़क,
शोख़ियाँ, अन्दाज़, ख़ूब तेरी तड़क भड़क,
तू – दिल्ली पुरानी की नयी सड़क…
 

~ दिलचस्पियाँ…

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मेरी तुम में तुम्हारी मुझ में, ये दिलचस्पियाँ,
ना कम ना ज्यादा ना आधी ना अधूरी,
सारी की सारी, मेरी तुम्हारी, पूरी की पूरी,
ये हमारी…दिलचस्पियाँ…

ना ढूंढे जगह ये ना कोई वजह ये,
ना आने ना जाने का रस्ता तलाशें,
इक दूसरे की क़ैद में होने की,
ये खोने की…दिलचस्पियाँ…

ये चाय में डूबे बिस्कुट के जैसी,
बचपने की वो “तेरी ऐसी की तैसी”
लड़-भीड़, पिट-पीटा फिर गले से लगा,
ये अल्हड़ कहानियाँ…दिलचस्पियाँ…

ये बेकार तो वहम सी, चिपकी हुई,
तलुए जलाती ये चाय गर्म सी, जलाती हुई,
दिलों का धड़कना इक नज़र को तड़पना,
ये आग सुलगती…दिलचस्पियाँ…

ये बस ज़िद है और ज़िद पे ही है अड़ी,
रूठ कोठे से झांकती कभी दरवाज़े पे खड़ी,
ये पतंगों का हुजूम, मेरी तुझ से जा लड़ी,
ये हमारा जूनून…तेरी मेरी दिलचस्पियाँ…

~ शायद, यक़ीनन…

 

एक ज़मीन का टुकड़ा कुछ उखड़ा, था, शायद

दो गज़ लम्बाई, दो हाथ भर चौड़ाई, यक़ीनन

 

बदमस्त हो वहां ज़िन्दगी सो रही थी, शायद

मौत चेहरों पे सिरहाने उसके रो रही थी, यक़ीनन

 

दूर से लगा, कुछ ऐसा वो मंज़र था, शायद

मिटटी में जा मिला मिटटी से वो बना था, यक़ीनन

 

भीड़ थी और कुछ चेहरों पे गीली लकीर थी, शायद,

बाकी रौनक आजा रही, रस्म निभा रही थी, यक़ीनन   

 

ताबूत में अब बस होने को वो बंद था, शायद

आज़ाद छंद था अब वो आज़ाद छंद था, यक़ीनन