~ आकाशवाणी…

fullsizeoutput_1238

Advertisements

~ दिल्ली…

delhi..png

Google Images “no copyright infringement is intended”

 
पुरानी दिल्ली की नयी सड़क,
शोख़ियाँ, अन्दाज़, ख़ूब तेरी तड़क भड़क,
दिल्ली पुरानी की नयी सड़क…
 
बल्लीमारा, फ़तहपुरी, क़ुचा-ए-नील,
लहंगें, ज़री, ज़रदोज़ी ये गाइड-कुंजियाँ,
नल्ली नहारी, पराँठे, कुलचे तेरे जामुन-ए-गुलाब,
गोल जलेबी सी तेरी गलियाँ लाजवाब…
 
ताँगे, रिक्शे, गाड़ियाँ, स्टेशन की भीड़,
कोठे, जिस्म, भूख और के लाचारी ग्राहक,
कभी आयें चखने मद-मय-हुस्न खाने,
बस क़ीमत चुकायें यहाँ रिश्ते नहीं निभाने…
 
चौक चाँदनी पाँचवाँ चाँद, बावली खारी,
क़िला-लाल, बाज़ार उर्दू, नीम-हकीम, और
गली क़ासिम जान, ग़ालिब की हवेली जहाँ,
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरिजा साथ रहते यहाँ…
 
पुरानी दिल्ली की नयी सड़क,
शोख़ियाँ, अन्दाज़, ख़ूब तेरी तड़क भड़क,
तू – दिल्ली पुरानी की नयी सड़क…
 

~ December-Twenty-Five…

~ December-Twenty-Five…

He swayed left from right and jumped up and down,

He had a mask put on and wore a colourful gown,

He made everyone laugh; it would be always a piece of fun,

He was a short height miniature smaller then than a gun,

He acted like a fool as he had to make his living,

He kept all his pain and smiles, he was always giving,

Sometimes on a horse or on a sleigh he would stand,

Sit he would sit, laugh he would laugh, he followed all the commands,

He was almost fifty two and his birthday was on twenty-fifth-december,

And he had his pretty corner to cry as no one cared to remember,

He was born on a Monday and the day was christmas,

Well, he was a loner all his life and never made no fuss,

His mother left him when he was born, new and alive at Six-Forty Five,

The circus opens in the morning at ten, someone just screamed where the hell is Uncle Ben,

Its morning, the time is six-forty-five; alone in his tent he breathed his final sigh,

And, the banner outside his tent just read; welcome its December-twenty-five…

~ साये…

 

fullsizeoutput_e30

 

साये ये रात के साये,

कहाँ ले आए हमें ये रात के साये,

घनेरे कलेरे डरे डरे से ये घबराये,

ओड़ चादर फटी ये ठुकराये,

ये साये रात के

 

बिना बात कभी पीछे पड़े,

धुआँ उड़ाते, चेहरा छुपाते, लड़खड़ाते,

गिरते गिरते से, सम्भलते से, डगमगाते,

दूर से झाँकते, क़रीब आ सो जाते,

हाय ये राते के साये

 

एक सच को छिपाए हुए,

बिन बुलाये ये आये हुए,

एक मरियल लकीर से, फ़क़ीर से,

भूख से लिपटे, कालिख से चिपटे,

ये काले काले साये

 

आमने, सामने, घूमते गोल गोल,

कभी बैठे, कभी खड़े, मुँह खोल,

जैसे अभी ये जाएँगें निगल,

वो पहली किरण, इनका आख़िरी शंड़,

और रह जाती ना जाने वाली, काली रात

 

हाय, ये काली के रात के साये

~ इत्तफ़ाक़…

Coincidence

Picture Credit : Google Images

 

पड़ गया मेरे आराम में आज फिर खलल पड़ गयाफिर बैठे बैठे हुआ खड़ा आज फिर मन बदल गया,

चलने ही वाला था पर जैसे ही उठाया पहला कदमपिछले वाला अगले वाले से बेवजह ही लड़ गया

 

नीली पतलून, पिली क़मीज़ अंदर सफ़ेद बनियानजूता पहना भुला जुराब, साली किस्मत है ही ख़राब,

घुमा, मुड़ा और जैसे तैसे चल पड़ा देखा बटुआ पड़ाकिसका है ? मेरा तो हैं नहीं, बटुआ था तस्वीरों भरा

 

कल ली थी रेल की टिकट घूमने जाने को कहींजाने क्यों अब कहीं जाने का बिलकुल मन नहीं,

क्या करूँ, क्या नहीं, फाड़ा टिकट उतारी जैकेट,  उतारा जैसे ही जैकेट गिरा उसमें से एक पैकेट

 

पैकेट में थी नाटक की टिकट, नाटकइत्तफ़ाक़”, डिरेक्टर बेबाक़, ऐक्टर तपाक, क्रू फटफट फ़टाक,

ऑडीयन्स में भी जोश था, बस, दरबान ख़ामोश थापूछा तो बोला, बेटा था ना रहा, तस्वीरें थी अब वो भी नहीं

 

याद है ? बटुआ तस्वीरों से भरा, उठाया था, बताना भुल गयाउसकी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा, होश था अब जोश था,

बेटा, उसका लड़खडाता था, ठीक से चल ना पाता थाशौंक उसे सिर्फ़ तस्वीरों का था, “इत्तफ़ाक़ये तक़दीरों का था

~ सहेली…

~ सहेली

~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~

मोहे इश्क़ हुआ ज़रा धीरे से,

धीरे धीरे से तेरे वीरे से,

इक काम करा दे मेरा,

ले चल कल उसे तू मेले में,

मिलवा दे मुझे तू अकेले में,

तू है ना मेरी पक्की वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

मेरा दिल अब ना मेरे क़ाबू में,

नैन मेरे, रस्ते पे अड़े,

थक गयी अब मैं खड़े खड़े,

इक बार मुझे मिलवा दे ना,

नाल उसदे मुझे बिठा दे ना,

ओ मेरी पक्की वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

मैं रात से बुझी बुझी सी हूँ,

ना भूख मुझे ना प्यास लगे,

कभी दिल अटके कभी साँस रुके,

अंकल को ससुर बनवा दे ना,

मम्मी को सास बनवा दे ना,

ओ तू मेरी पक्की वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

मैं बावरी हो के नचड़ा

मैं हुँड नहीयो है बचना,

जग झूठा लगे वो सच-ना,

तेरा वीरे विच दिखे मुझे सजना,

मैं बस उस वास्ते है सजना,

हायों मेरी पक्की वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

तू मेरी पक्की वाली सहेली है,

बचपन से साथ तू खेली है,

मेरी डोली घर बुलवा दे ना,

अपड़े वीरे से अन्ख लड़वा दे,

अपने घर मेरा घर वसावा दे,

ओ मेरी सच्ची वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

~ दिलचस्पियाँ…

IMG_1372

 

मेरी तुम में तुम्हारी मुझ में, ये दिलचस्पियाँ,
ना कम ना ज्यादा ना आधी ना अधूरी,
सारी की सारी, मेरी तुम्हारी, पूरी की पूरी,
ये हमारी…दिलचस्पियाँ…

ना ढूंढे जगह ये ना कोई वजह ये,
ना आने ना जाने का रस्ता तलाशें,
इक दूसरे की क़ैद में होने की,
ये खोने की…दिलचस्पियाँ…

ये चाय में डूबे बिस्कुट के जैसी,
बचपने की वो “तेरी ऐसी की तैसी”
लड़-भीड़, पिट-पीटा फिर गले से लगा,
ये अल्हड़ कहानियाँ…दिलचस्पियाँ…

ये बेकार तो वहम सी, चिपकी हुई,
तलुए जलाती ये चाय गर्म सी, जलाती हुई,
दिलों का धड़कना इक नज़र को तड़पना,
ये आग सुलगती…दिलचस्पियाँ…

ये बस ज़िद है और ज़िद पे ही है अड़ी,
रूठ कोठे से झांकती कभी दरवाज़े पे खड़ी,
ये पतंगों का हुजूम, मेरी तुझ से जा लड़ी,
ये हमारा जूनून…तेरी मेरी दिलचस्पियाँ…

~ घुसपैठिया…

~ घुसपैठिया…

मेरे दिल को वो अपना है घर कर बैठा,
सामान मेरा सब इधर उधर कर बैठा,
ना चाबी लगायी ना तोड़ा उसने ताला ,
ना जाने कैसे है वो बसर कर बैठा…
घुसपैठिया…

ना उठाया मुझे ना मुझको जगाया मुझे,
ना चीख़ा पुकारा, ना आवाज़ लगायी,
ना जाने कैसे तय वो ये सफ़र कर बैठा,
वो रुख़ कैसे अपना इधर कर बैठा है…
घुसपैठिया…

मेरे तकिए पे वो अपना सर कर बैठा,
अलमारी में मेरी अपनी बुशर्रत टाँग के,
पतलून को मेरे कुर्ते की नज़र कर बैठा,
कैसे वो इस घर को अपना घर कर बैठा…
घुसपैठिया…

मेरे पसीने को अपना इत्र बनाके, उसको लगाके,
वो ख़ुशबू को मेरी है अपनी ईत्र कर बैठा है,
बरामदे में मेरे उसने अपनी चारपायी बिछायी,
मेरी रातों की नींद में अपनी वो सहर कर बैठा…
घुसपैठिया…

मेरी माँ को वो अम्मी है कह कर बुलाता,
मेरे डैडी को अपना फ़ॉदर कर बैठा है,
ख़ुद मेरी जान मुझको जानेजिगर कर बैठा,
मेरी कश्ती में तैर वो सारा सफ़र कर बैठा…
घुसपैठिया…

वो बारिश में अपनी मुझे तर-बतर कर बैठा,
वो आलू और मुझको है मटर कर बैठा ,
मैं बिखरी हुई थी वो मुझको बाहों में लेके,
गुम थी कहीं मैं, मुझको वो ताज़ा ख़बर कर बैठा…
घुसपैठिया…

~ चश्मा…

सारा आसमान सर पर उठा रखा है,

ना मालूम मैंने चश्मा कहाँ रखा है,

दो आँखों से ज़माना बहुत देख लिया,

दो और लगा ताज़ा नज़र को रखा है…

 

काश दिल भी दूसरा लगा सकता मैं,

पहले वाला तो टूट के बिखर रखा है,

एक तकिया इधर एक उधर लगाया है,

तुम नहीं हो तुम्हारी याद पे सर रखा है…

 

तुमने जाते जाते जो बात कही थी मुझसे,

अब तलक उसी बात को पकड़ रखा है,

तुम्हें याद है तुमने जो बीज बोए थे,

फूलों ने उनकी की सारा शहर महका रखा है…

 

रात अंधेरी में कोई भटक ना जाए कहीं,

इसलिए चाँद को दिया बना रखा है,

और तो ओर तुम्हें सुन के हैरानी होगी,

तुमको चाँद, ख़ुद को दाग़ बना रखा है…

 

कहने वाले तो यहाँ तक कहते है,

मैंने ये ख़ुद को क्या बना रखा है,

अब उन्हें कैसे बताऊँ, समझाऊँ क्या,

मैंने तुममें ख़ुद को सजा रखा है…

 

मिल गया चश्मा सर पे लगा रखा था,

यूँ ही सारा आसमान सिर पे उठा रखा था,

नज़रें ज़मीन पर, चश्मा तुम्हें तारों में धूँड रहा था,

मैंने तुममें अपना सारा जहाँ रखा था…

~Besotted…

Feeling free like a kite, swaying left and then right,

He was a man so drunk, never ate no chunk,

Quite he kept, all alone he wept, stood like a tree,

His body was drowned, burnt and buried, soul he exhumed,

Wandering through the labyrinth of steep and dirty streets,

On stairs he stayed, in parts he lived, stripper, the girl he missed,

Love he had, love he gave, all of it, every bit

She left him, naked, all stripped, of love, all bit…