~ December-Twenty-Five…

~ December-Twenty-Five…

He swayed left from right and jumped up and down,

He had a mask put on and wore a colourful gown,

He made everyone laugh; it would be always a piece of fun,

He was a short height miniature smaller then than a gun,

He acted like a fool as he had to make his living,

He kept all his pain and smiles, he was always giving,

Sometimes on a horse or on a sleigh he would stand,

Sit he would sit, laugh he would laugh, he followed all the commands,

He was almost fifty two and his birthday was on twenty-fifth-december,

And he had his pretty corner to cry as no one cared to remember,

He was born on a Monday and the day was christmas,

Well, he was a loner all his life and never made no fuss,

His mother left him when he was born, new and alive at Six-Forty Five,

The circus opens in the morning at ten, someone just screamed where the hell is Uncle Ben,

Its morning, the time is six-forty-five; alone in his tent he breathed his final sigh,

And, the banner outside his tent just read; welcome its December-twenty-five…

~ साये…

 

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साये ये रात के साये,

कहाँ ले आए हमें ये रात के साये,

घनेरे कलेरे डरे डरे से ये घबराये,

ओड़ चादर फटी ये ठुकराये,

ये साये रात के

 

बिना बात कभी पीछे पड़े,

धुआँ उड़ाते, चेहरा छुपाते, लड़खड़ाते,

गिरते गिरते से, सम्भलते से, डगमगाते,

दूर से झाँकते, क़रीब आ सो जाते,

हाय ये राते के साये

 

एक सच को छिपाए हुए,

बिन बुलाये ये आये हुए,

एक मरियल लकीर से, फ़क़ीर से,

भूख से लिपटे, कालिख से चिपटे,

ये काले काले साये

 

आमने, सामने, घूमते गोल गोल,

कभी बैठे, कभी खड़े, मुँह खोल,

जैसे अभी ये जाएँगें निगल,

वो पहली किरण, इनका आख़िरी शंड़,

और रह जाती ना जाने वाली, काली रात

 

हाय, ये काली के रात के साये

~ इत्तफ़ाक़…

Coincidence

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पड़ गया मेरे आराम में आज फिर खलल पड़ गयाफिर बैठे बैठे हुआ खड़ा आज फिर मन बदल गया,

चलने ही वाला था पर जैसे ही उठाया पहला कदमपिछले वाला अगले वाले से बेवजह ही लड़ गया

 

नीली पतलून, पिली क़मीज़ अंदर सफ़ेद बनियानजूता पहना भुला जुराब, साली किस्मत है ही ख़राब,

घुमा, मुड़ा और जैसे तैसे चल पड़ा देखा बटुआ पड़ाकिसका है ? मेरा तो हैं नहीं, बटुआ था तस्वीरों भरा

 

कल ली थी रेल की टिकट घूमने जाने को कहींजाने क्यों अब कहीं जाने का बिलकुल मन नहीं,

क्या करूँ, क्या नहीं, फाड़ा टिकट उतारी जैकेट,  उतारा जैसे ही जैकेट गिरा उसमें से एक पैकेट

 

पैकेट में थी नाटक की टिकट, नाटकइत्तफ़ाक़”, डिरेक्टर बेबाक़, ऐक्टर तपाक, क्रू फटफट फ़टाक,

ऑडीयन्स में भी जोश था, बस, दरबान ख़ामोश थापूछा तो बोला, बेटा था ना रहा, तस्वीरें थी अब वो भी नहीं

 

याद है ? बटुआ तस्वीरों से भरा, उठाया था, बताना भुल गयाउसकी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा, होश था अब जोश था,

बेटा, उसका लड़खडाता था, ठीक से चल ना पाता थाशौंक उसे सिर्फ़ तस्वीरों का था, “इत्तफ़ाक़ये तक़दीरों का था

~ सहेली…

~ सहेली

~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~

मोहे इश्क़ हुआ ज़रा धीरे से,

धीरे धीरे से तेरे वीरे से,

इक काम करा दे मेरा,

ले चल कल उसे तू मेले में,

मिलवा दे मुझे तू अकेले में,

तू है ना मेरी पक्की वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

मेरा दिल अब ना मेरे क़ाबू में,

नैन मेरे, रस्ते पे अड़े,

थक गयी अब मैं खड़े खड़े,

इक बार मुझे मिलवा दे ना,

नाल उसदे मुझे बिठा दे ना,

ओ मेरी पक्की वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

मैं रात से बुझी बुझी सी हूँ,

ना भूख मुझे ना प्यास लगे,

कभी दिल अटके कभी साँस रुके,

अंकल को ससुर बनवा दे ना,

मम्मी को सास बनवा दे ना,

ओ तू मेरी पक्की वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

मैं बावरी हो के नचड़ा

मैं हुँड नहीयो है बचना,

जग झूठा लगे वो सच-ना,

तेरा वीरे विच दिखे मुझे सजना,

मैं बस उस वास्ते है सजना,

हायों मेरी पक्की वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

तू मेरी पक्की वाली सहेली है,

बचपन से साथ तू खेली है,

मेरी डोली घर बुलवा दे ना,

अपड़े वीरे से अन्ख लड़वा दे,

अपने घर मेरा घर वसावा दे,

ओ मेरी सच्ची वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

~ फंदा…

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~ फंदा…

आज मैंने ख़ुद से अपनी पहचान ले लीमर गया हूँ मैं, मैंने अपनी जान ले ली,

कैसे बताऊँक्यूँ किया, जो भी कियाकैसे बताऊँक्यूँ जिया, जैसे भी जिया

 

वजह तलाशता रहा ज़िंदगी भर जीने कीमिली एक ख़ूबसूरत, मगर बेवजह निकली,

कल रात भर मकान की छत ताकता रहाज़मीन से कितनी ऊपर है ये नापता रहा

 

देखे मैंने अजीबगरीब मंज़र देखे हैंमखमली हाथों में मैंने खंजर देखे हैं

कुछ मीठे पिए, कुछ कड़वे घूंट पीयेजो बचे थे लम्हे, आज मैंने लूट लिए

 

सारा कसूर वसीयत में अपने नाम कर लियाअपनी सारी यादों को तकसीम कर दिया,

रूह को भी अपनी आज नीलाम कर दियाखाली था खालीपन को कुछ ऐसे भर दिया

 

हवा में हूँ अभी, कुछ देर में रेत हो जाऊंगानिकल रहा हूँ, धीरे धीरे फिसल जाऊंगा,

बस यहाँ से छत की दुरी कम ना पड़ेऔर रस्सी ज़रा सी भी कम ना पड़े

~ आलोचना…

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~ आलोचना

जब करो तुम कोई वजह से किसी की भी आलोचना,

रोक लेना जिह्वा को अपनी और दिल से इतना सोचना

 

की तुम में कितनी खूबियां है तुम में कितने दोष हैं,

लेना पकड़ कोना कोई और आँखों को अपनी मूँद कर,

अपनी सिमटी समझ की खिड़कियों को देना खोल तुम,

और सोचना, उठा भी पाओगे क्या अपनी कमीयों का तोल तुम

 

कितना आसान चीनीनुक्ता और अपनी कथनी को कहना पुख्ता,

है बड़ा कठिन सुनना लगा कान और अपनी गलती को लेना मान,

इक धक्का सा लग जाता है जब दोष कोई गिनवाता है,

अपने दोषों की गठरी छुपाने को अफवाहें फिर फैलाता हैं

 

ये अफवाहेंसुखी, तीखी, लाल मिर्च सी होती है,

और हवा का रुख जब पलटता अपनी ही आँखें रोती हैं,

तेरा जायेगा तेरे संग और तू अपने करम की ही खायेगा,

कर के दूजों की बुरीभली तू किसी की आँख ना भायेगा

 

वो जो इधर उधर की खाता है और अफवाहें फैलाता है,

वो किसी का कैसे हो सकता हैं जो बातों की आग लगाता हैं,

ये जिव्हा, गुड़मिश्री की ढेली हैं ये तेज़तीखी तलवार भी है,

ये कड़वा ज़हर का घूँट कभी और करोड़ों का व्यापार भी हैं

 

रोक लेना जिह्वा को अपनी बस दिल से इतना सोचना,

करने लगो आलोचना, अब जो करने लगो आलोचना…

 

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~ आँच…

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सुनो आँच ज़रा धीमी कर दो, चावल देर से पकेंगे,

और हम कुछ और देर तलक साथ लिपट लेंगे

कुछ कहना नहीं, आज तुमने फिर पाज़ेब को पहना नहीं,

चावलों को धीरेधीरे पकने दो, कुछ और देर सर रखने दो

थोड़ा सा होंठों में फाँसला करो, जो जगह मिलेगी,

आज कच्चे चावल खिला देना, मेरे होठों को चबा देना

बीचबीच में आँखें मुँदना, आज चावलों का पानी पिला देना,

तुम कूदना और मुझे फाँदने की वजह देना

आज ख़्वाब सज़ा लेते है, रहने दो चावल, रात भर पका लेते है,

पकने दो उन्हें भी, जगने दो हमें भीसहर तक, दोपहर तक

 

~ घुसपैठिया…

~ घुसपैठिया…

मेरे दिल को वो अपना है घर कर बैठा,
सामान मेरा सब इधर उधर कर बैठा,
ना चाबी लगायी ना तोड़ा उसने ताला ,
ना जाने कैसे है वो बसर कर बैठा…
घुसपैठिया…

ना उठाया मुझे ना मुझको जगाया मुझे,
ना चीख़ा पुकारा, ना आवाज़ लगायी,
ना जाने कैसे तय वो ये सफ़र कर बैठा,
वो रुख़ कैसे अपना इधर कर बैठा है…
घुसपैठिया…

मेरे तकिए पे वो अपना सर कर बैठा,
अलमारी में मेरी अपनी बुशर्रत टाँग के,
पतलून को मेरे कुर्ते की नज़र कर बैठा,
कैसे वो इस घर को अपना घर कर बैठा…
घुसपैठिया…

मेरे पसीने को अपना इत्र बनाके, उसको लगाके,
वो ख़ुशबू को मेरी है अपनी ईत्र कर बैठा है,
बरामदे में मेरे उसने अपनी चारपायी बिछायी,
मेरी रातों की नींद में अपनी वो सहर कर बैठा…
घुसपैठिया…

मेरी माँ को वो अम्मी है कह कर बुलाता,
मेरे डैडी को अपना फ़ॉदर कर बैठा है,
ख़ुद मेरी जान मुझको जानेजिगर कर बैठा,
मेरी कश्ती में तैर वो सारा सफ़र कर बैठा…
घुसपैठिया…

वो बारिश में अपनी मुझे तर-बतर कर बैठा,
वो आलू और मुझको है मटर कर बैठा ,
मैं बिखरी हुई थी वो मुझको बाहों में लेके,
गुम थी कहीं मैं, मुझको वो ताज़ा ख़बर कर बैठा…
घुसपैठिया…

~ तबरेज़…

 

नज़र हम रख लेते है, नज़रिया तुम रख लो,
हमें बस बूँद से मतलब, ये दरिया तुम रख लो,
जो दरिया भी लगे थोड़ा, सारा जहाँ तुम्हारा…

हमें दिल का कोई कोना किनारा बहुत है,
वहाँ चुप चाप, ख़ामोशी से रह लूंगा,
तुम रख लेना ख़ुशी, मैं ग़म रखूँगा, किसी से कुछ ना कहूँगा…

अभी बह रहा हूँ, मुझे चुप-चाप बहने दो,
उतरना मत, रात भर, पहन कर सोया तुम्हें,
खिसको ज़रा मेरी ओर, सर्दी सी है, ज़रा आग जला दो…

और हाँ, एक उम्मीद है, अगर कर सको जो तुम पूरी,
अपना वादा निभाना…वो वादा याद हैं ना,
हमेशा प्यार करने का, तुम्हारा मुझसे ही…

जो नहीं मुमकिन, तो मुश्किल आसान कर देता हूँ,
मिटा कर मिट्टी में भर दो, तुम ज़िंदा रहो मैं मरूँगा,
फिर, दफ़ना या जला देना, लगे तुम्हें जो भी सही…

हाथ में आ जाऊँगा, हथेली में समा जाऊँगा,
बहा देना, मिटा देना, भूलना मत, मैं चैन से सो ना पाऊँगा,
ज़रा आओ क़रीब, पास खिसको , सवाल रहने दो…

समाँ जाओ, ना मैं रहूँ ना तुम रहो,
छुपा लो मुझ को ख़ुद में, फिर हम-तुम बहें,
देखो, सवाल बिखेरे पड़े हैं यहाँ वहाँ,
तुम्हारे बालों की तरह, हर जगह…

~ Hakuna Matata…

 

पानी को आईना बना चाँद को रोटी समझ खा गया, शहर में जानवरों की तादाद देख शेर जंगल की ओर भागा गया…

पूरा जंगल उत्सुकता का मारा, आते ही लगा दी सवालों की झड़ी और मिनटों में लम्बी लाइन लग पड़ी…

पहला सवाल कुत्ते ने पूछा – शहर तो बड़ा साफ़ होगा?
~ जवाब मिला – साफ़ सिर्फ काले चश्में वाले लोग थे, बाकी तो नर्क रहे भोग थे…

दूसरा, लोमड़ी – सुना है वहां भी मेरे चर्चे हैं “लोमड़ी की सी चालाकी?
~ शेर हँसा – तुम से कहीं बढ़कर, तुम्हारी खाल से पता तो चलता है…

बिच्छू आया, डंक घुमाया, बैठा, आदमी काटता है क्या?
~ शेर – हाँ ऐसा इकलौता जानवर जो अपने ही जैसों को काटता है, और किसी को नहीं बांटता है, खाया जाये ना जाये,
सड़ा देगा मगर किसी और को नहीं देगा…

बिल्ली, मुझे शहर पसंद है, सुना है वहाँ बिल्ली को दूध आराम से मिलता है, ऐसा है?
~ शेर – बिल्ली को तो मिलता है, मगर सड़को पर आदमी के बच्चे सूखे पड़े रहते है, शायद बिल्लियों को ही मिलता है…

उड़ती उड़ती चिड़िया आयी और चिल्लाई, आदमी उड़ते हैं क्या?
~ मैं भी हैरान हूँ – सुना तो बहुत हैं – बहुत उड़ने लगा हैं पर निकल आये हैं…

हाथी आया – घुमा फिरा के सूंड को पूछा – ये शहर में हाथी के दांतो का क्या करते हैं?
~ शेर ने सुना था – जड़ दिया … भाई हाथी वहां खाने और दिखने के दांत अलग होते हैं, इसलिए तुम्हारे ले जाते हैं…

बारी आयी सांप की – ऐसे कौन सी चीज़ हैं जो शहर में आराम से मिल जाती हैं?
~ शेर पहले तो थोड़ा परेशान हुआ, सब कुछ तो हैं…हाँ शायद ज़हर…सब कहते हैं इसने-उसने ज़िन्दगी में ज़हर घोल रखा हैं…

बारी अब थी गिरगिट की, और उसे रंग बदलने से कहाँ फ़ुर्सत, रंग को किया उसने लाल और चिपकाया अपना सवाल…क्या आदमी रंग बदलता है?
~ सवाल तो अच्छा है; मगर बवाल वहाँ रंग बदलने का कम है, आपका रंग कितना गोरा या काला है ये बहुत बड़ा मसला है… गोरा होना जैसे लाजवाब है और ना होना कोई पाप…स्किन का वाइट कलर इम्पोर्टेन्ट फैक्टर है और ना होना डार्क चैप्टर…
जवाब तुम्हारे सवाल का…इतने वहाँ मौसम नहीं जितने आदमी के रंग हैं…चार पैसे में रंग बदल जाता हैं, कुछ हज़ार में बालों का कलर, लाखों में फ्यूचर का कलर ब्राइट होते देखा हैं…और इश्क़ ऐसी बला जिसमें सब टेक्नीकलर…

मोर क्वेश्चन प्लीज…मेरा मतलब मोर तुम्हारा सवाल?
मोर जी ने पंख फैलाये और याद आया सवाल तो घर ही भूल आये…पंख फैलाया तो सवाल याद आया…शेर जी, आदमी ख़ुशी में नाचता है या गम में…
~ जितना मुझे समझ आता है ख़ुशी में वो खुल के सामने नाचता है, और ऐसे नाच में सब शरीक होते हैं…गम एक ऐसी हलचल है जो उसे अंदर ही अंदर नचाती है…

अब आया भैंस का नंबर…
शेर जी ये बताओ – भैंस को वहाँ चारा बैठे बैठे मिलता हैं वहाँ तो जंगल हैं नहीं?
~ वहाँ भैंस और आदमी दोनों चारा खाते हैं पगली…कमी नहीं हैं…

भालू आया और वो भी शरमाया और पूछ ही बैठा, वहाँ भी लोग काले होते हैं?
~ इस बात पर शेर थोड़ा गंभीर हुआ और नम भी…एकदम संजीदा हो कर बोला बस यही तो बात हैं जिसकी वजह से मैं वहाँ टिक नहीं पाया, वहाँ खाने-पिने की कोई कमी थी, अपने आप चले आते थे मरने, लेकिन एक दिन मैंने सुना की वहाँ दिल भी काले होते हैं…
पहले तो मेरी समझ नहीं आया लेकिन जब तहकीकात की तो पता चला के जहाँ मैं छुपा था वो हस्पताल के पीछे की दिवार थी और मैं वहाँ छुपा हूँ ये बात किसी और को भी पता थी…वो रोज़ किसी को बहला-फुसला कर लता और वहाँ छोड़ जाता, मुझे लगा शिकार मैंने किया हैं, लेकिन जब पता चला तो मैं तिलमिला उठा और उसी को खा गया…उसका सीना खोला और क्या देखता हूँ…उसका दिल काला था…

यहाँ कोने में बैठा बन्दर कुछ बड़बड़ा रहा था और केला खा रहा था…शेर खुद ही उससे पूछ बैठा –
~ तुम तो उनके पूर्वज हो और तुम्हे तो वहाँ पूजा भी जाता हैं, तुम जंगल में क्या कर रहे हो?
बन्दर ने इत्मीनान से केला खाते खाते जवाब दिया…कुछ लोग हैं जो मुझे पूजते हैं लेकिन भगवान खुद को ही समझते हैं…

…और अब तो जानवरों की जैसे लाइन ही लग गयी…ये दो किलोमीटर लम्बी लाइन – जो-जो सवाल पूछ कर आते रहे, घर जाते खाने-पिने का इंतज़ाम कर लाइन में बेचने लगे…कुछ इस तरह चंद सवालों के जवाब क्या मिले जानवर भी ओपरट्यूनिटी का बिज़नेस करने लगे…और आदमी की तरह वो भी जेबें भरने लगे…

वहीँ कहीं अचानक एक गधे की नज़र पड़ी और वो भी लाइन में लग गया…तीन दिन बाद उसका जब नंबर आया तो शेर तो शेर सारी महफ़िल का सर चकराया…सवाल था ऐसे जैसे जैसे किसी ने पूछ लिया हो के आसमान में कितने तारे है…
सवाल था…
…”क्या शहर में गधे होते हैं?”…

~ इस पर शेर ने नाक से एक लम्बी सांस अंदर खींची और मुँह से गधे के कान में कुछ फुसफुसाया…और उसके बाद तो गधे की जैसे ख़ुशी का कोई ठिकाना ना रहा, वो नाचने लगा गाने लगा, अपनी धुन बजाने लगा, कहीं से भी आने लगा कहीं भी जाने लगा…

~~ सब परेशान की शेर ने उसके कान में क्या बोला की इसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नहीं…
~~ और थोड़ा शेर भी हैरान…आज आदमी की तरह जानवर भी परेशान लग रहे हैं…