~ गिलास की कहानी…

~ गिलास की कहानी…

छोटा था मैं, बहुत छोटा, बस भूख से रोता था, और बाक़ी सोता था, सोने नहीं देता था किसी को खुद से पहले…कभी कभी तो सबसे पहले उठता भी था…एक ही काम और एक ही खिलोना था मेरा, कुछ खाता नहीं बस पीता था…और मेरा खिलोना था, मेरी बोतल जो जल्द ही गिलासी में बदल गयी…

छोटा सा, मेरे जैसा मेरा गिलासी सा मेरा गिलास, एक वो ही समझता, जानता और सबसे ज़्यादा प्यार करता था मुझे, जितना मर्ज़ी उठा-पटक, फैंकता उसे और वो सब सहता और कुछ ना कहता, और बीच बीच में बुझाता था मेरी भूख, मेरी प्यास, मेरा प्यारा गिलास…

पानी से दूध तक का सफ़र तय किया और छोटा बचपन हम दोनो नें साथ साथ पिया , सुबह मुझ से पहले उठ के भर जाता था, कभी कभी हाथ धुलवाता पर अक्सर दूध ही पिलाता था…दोपहर, शाम, हर रात फिर भर जाता था, मेरा ख़याल रखता था, मेरा छोटा भीम था, मेरा दोस्त…मेरा गिलास…

छोटा बचपन जल्द बड़े बचपन में तब्दील हो गया, गिलास मेरा अब रूह-ए-गुलाब था, सफ़ेद दूध से नाक चिढ़ाता था, पानी बोतल या नल से ही पी जाता था, गिलास बड़ा हो गया था, कभी एक आध बार चाय काफ़ी भी पी लेता था, मेरे बिना अब वो जी लेता था, मेरे भी नए दोस्त बन गए थे, छोटे कप, अक्सर चाय-काफ़ी पिलाते थे, बचपन के दोस्त चुराते थे…

वक़्त बीतने लगा और अब घर के गिलास के ख़िलाफ़ होने लगा, बाहर का गिलास अब रास आने लगा था और वो भी मिलती थी तो अक्सर हम एक ही गिलास में पिते थे, आख़िरी बूँद तक सुड़क जाने लगे, गिलास नहीं हिलता था, ना ही गर्दन भी उठती थी, गिलास वही खड़ा रहता था, हमारे जाने के बाद पड़ा रहता था…

शामें होने लगी गीली साथ जेब ढीली, शुरू शुरू में बोतल को मुँह लगाने लगे, गर्दन ऊँची कर कुछ घूँट लगा चिल्लाने लगे, नाचने गाने लगे, गिलास अकेला रह गया, और बोतल शाम को खुल के नाचने, गिलास करता था इंतज़ार…हम जिसे और जो हमें करता था प्यार, वो छोटा गिलास अब रहता था उदास…

बड़ने लगा वक़्त भी और उम्र भी, दोस्त भी-माहौल भी, गिलास जो कभी पानी और दूध पिलाता था, अब वो शराब में कभी सोडा या पानी मिलाता था, गिलास अब फिर से प्यार था, गिलास मेरा यार था, हम नशे में रहते और गिलास से गिलास टकरा के कहते…

सुबह तक बार बार, लगा मुँह हम गिलास, ना जाने कितनी बार, एक ही बात कहते-कहते लड़खड़ाते बार से घर को जाते थे, और घर जा के और बनाते थे, गिलास अब सफ़ेद कुछ ना पीता था, कड़वाहट थी उसकी नयी मिठास थी, छोटी गिलासी अब थी पटयाला गिलास …

सही लग गयी या ग़लत लग गयी, ए-गिलास मुझे तो तेरी लत लग गयी…शरीर मेरा अब बूढ़ा ढोने लगा, गिलास पकड़ना मुश्किल होने लगा, काँपता था हाथ मेरा और अक्सर छूट जाता था गिलास और दूध मेरा जाता था बिखर…


बचपन में भी पकड़ नहीं पता था, दूध तब भी गिराता था, प्यार और पुचकार से फिर मिल जाता था, 

…वक़्त बदला और बदले हालात, घर में आया एक नया बचपन और साथ में ला-ल-ला-लला…नया “गिलास”…

पोता…ठीक मुझ जैसा था वो रोता, उसकी भी अपनी इक गिलासी थी, जो उसके प्यार की प्यासी थी…

आज आख़िरी शाम है, बुढ़ापा मेरा सजा धजा सोया है लकड़ी के सेज पे, और बूँद-बूँद से भरा गिलास अब इक छोटा सा मटका है, जो एक और बस एक छेद से चटका है, और आग लगी है चारों ओर…

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~ उड़दाँ पंजाब…

~ उड़दाँ पंजाब…

ज़िंदगी दे क़िस्से, आए सारयाँ दे हिस्से,

किसे नू दीस्से, किसे नू नयि दीस्से…

एन्ना जया बोल की बीजी फिर हल्के-फुल्के बानांण लग्ग पयी…     

हैप्पी ओय हैप्पी

उठ वी जा हुन, अद्दी रात्ती बड़ा शोर पाया फेर तू,

हैपी सद्दा, “उड़दा पंजाब”, उड़ सकदा सी उठ नयी…

हैप्पी दा वड्डा भ्ररा सी अपणा काला,

काला नां हैं जी काले दा, ते उसनु हर चीज़ काली पसंद सी…

रोटी दे नाल – काली दाल,

चावलॉ दे नाल – काले चने,

काली पैंट, काली क़मीज़, नाल काला चश्मा,

काली बुलट ते काली पग्ग,

पीनी उस, काली रम नाले ब्लैक पेप्पर चिकन,

फ़ेवरेट पिक्चर “ब्लैक”…

एक्को चीज़ सफ़ेद सी उस दे कोल, चिटा दिल,

हिक़दम साफ़, नियत सुफेद कोई काली हरकत बर्दाश्त ना सिगी उसनु,

ना करदाँ ना सेहँदा…

वेख्या, काले दी तरीफा ख़त्म ही ना होन कदें…

हैप्पी नू बस पीनी शराब ते करना पिंड दा महोल ख़राब

जमया ठीक सी, नौ साल दा सी, जद्दो बाऊजी नू परमवीर चक्र मिलया,

लोकॉ दे लेयी कश्मीर जन्नत है, इस घर दी जन्नत लूट लयी कश्मीर ने…

बस उस तो बाद ते, हर वक़त नशा,

कहंदाँ है, पाकस्तान तो ज़िन्दा बच के आए हिंदुस्तान, मरण वास्ते…

डरदाँ है होर मरदा है ते बस काले ते, काला है ही सोना, पिंड दी जान…

“बीजी, मेरी रोटी … फ़सल किहोजी है वेख आवाँ”

बुलेट नू मारी किक, जाँदें जाँदें इक लत हैप्पी नू वी, ते काला फुर्र…

“बीजी भूख लगी है, परोंठे ला दे चार नाले दे देयी अचार”

“आज तो शराब बंद”

ख़बर पड़ के अख़बार विच, “हैप्पी” ते उसदी भूख दोनो रफ़ूचक्कर…

“शराब बंद, सरकार दा दिमाग़ ख़राब हो गया हेगा, शराब ते टैक्स मिलदा है, उसनु बंद करता, स्मैक वेचड़-गे सारे” – हैप्पी बड़बड़ान्दा भज्या…   

खेत विच काला पहुंच्या ही सी,ते…

“काला भैया, काला भैया, आज हरिया फिर नहीं आया, आप बताओ इतनी फ़सल का ध्यान हम नौ लोग कैसे करेंगे?”

“साला बुरबक कहने लगा, हमहु नहीं डरत काउन काला गोरा से”

“हम आपका खिलाप किछऊ नाहीं सुन सकत, खींच कान का नीचे चार लगा दिया, सारा विचार ठिकाने आ गया”

“ओय ठंड रख ठंड, भोला है, बोलया ही ते है, कुछ उखड़ाया ते नहीं, कल लें आयी नाल अपने” – काला बोल्या…

“भैया, ई-तो हैप्पी भैया का जीप है” – हीरा बोला…

  

“कीथे, ओय हाँ, चल तू कम कर, हीरे नू ले आयीं सवेरे…

किक, स्टार्ट, चलया जट विदआउट फ़ियर…

“ओ निक्के, रुक कीथे भजदा पया हैं?”

“फ़ौज भर्ती होंन, मैं वी परमवीर जितना हैं…वीरे शराब ते बैन लग गया है, कठि करण झल्ला फिरदा हाँ” – हैप्पी सिद्दा जवाब दे ही नहीं सकदा सी…

“चंगा…ओदे नाल की होना, तू ते स्मैक पी लयी” – काले ने वि मज़ाक कित्ता…

“ना ओ वीरे ना…नशे दी लत्त है बस पागल नहीं हाँ मैं, मरना नी मैं स्मैक पी…शराब ते चल जाऊँ, स्मैक पी मैं आप ते आप पूरा घर मार देनॉ”

“सरकार दा चक्कर होर हेगा, सरकारी नशा बैन कर ऐसने अपने घर दी स्मैक दी सप्लाई वदाँ देनी है”

“पीन आड़े ने शराब बंद होयी ते, फिर स्मैक ही मारनी है”

“आ सरकार दी चाल हैं, सोचया उना की स्मैक विकेगी ते पोलिटिशिअन दे घर डिरेक्ट्ली इनकम”

काला चुप, सोंच विच,

…आदम होश विच वोट दे अन्दाँ है, ए नशे विच उड़दाँ पंजाब की समझा गया…

~ तुम ज़रा दर्द दो ना…

सोच बंद, शब्द फरार, कलम सुखी, पन्ने खाली फड़फड़ा रहें हैं,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

जिस्म ढीला, आँखें नम, ज़बान पे ताला, हर काम मैंने टाला,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

होश हो के भी नहीं, ढूँढने लगता हूँ जो गुमा ही नहीं,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

बत्तियाँ सारी गुल, उजाले से कोफ़्त अँधेरे से प्यार,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

शोर चुभता, ख़ामोशी खलती, वो आज बात नहीं जो कल थी,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

भूख नदारद, प्यास भी रूठी, झूठ लगे सच्चा, सच्ची बातें झूठी,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

इतना सा अफसाना है,

सच कहता हूँ सच के सिवा कुछ नहीं,

दर्द जब तक निगाह में नहीं होता,

लिखना चाहूँ लिखा नहीं जाता,

अब और गिड़गिड़ा भी नहीं पा रहा हूँ,

बिन रेत घंस रहा बिन पानी डूब रहाँ हूँ,

बचा लो, निकालो भँवर से,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

रख के काग़ज़ पे क़लम, इस उम्मीद से हूँ,

अभी उठेगा एक दर्द और सब मीठा हो जाएगा,

सोच, शब्द, क़लम, पन्ने, खिल उठेंगें,

और एक क़िस्सा नज़र होगा,

आज़मा के देख लो,

कितना हंसी वो मंज़र होगा…

जैसे…कुछ ऐसा सा…

ये सर्दियों की सुनहरी धुप और तुम्हारी गर्मियाँ,

ख़ूबियाँ तेरी हज़ार, अनगिनत मेरी कमियाँ…

~ तो क्या बात थी…

तुम ईद का चाँद होती – तो क्या बात थी,
जो ना कह पाया तुम वो बात होती – तो क्या बात थी,
तुम आते जाते नज़र आती फिर ठहर जाती – तो क्या बात थी,
तुम मेरी पहचान मेरी जात होती – तो क्या बात थी,
तुम यहीं कहीं होती – तो क्या बात थी,
तुम आसमान तुम ज़मीन होती – तो क्या बात थी,
जो हम पहले मिले होते – तो क्या बात थी,
जो हम सिलसिले होते – तो क्या बात थी,
जो तुम होती कोई क़िस्सा – तो क्या बात थी,
जो तुम होती मेरा हिस्सा – तो क्या बात थी,
तुम कहानी मैं किरदार – तो क्या बात थी,
मैं कबीला तुम सरदार – तो क्या बात थी,
मैं तारा तुम चाँदनी होती – तो क्या बात थी,
जिसे देखूँ तुम होती हर वो नज़ारा – तो क्या बात थी,
तुम होती समन्दर और किनारा भी – तो क्या बात थी,
तुम होती जो हवा और मुझको उड़ाती – तो क्या बात थी,
तुम अमावस भी चाँदनी रात भी होती – तो क्या बात थी,

और तुम, तुम क्या निकली मेरी पहली मुहब्बत निकली,
मुहब्बत जो मुझे इस जहाँ से रूखसत होते-होते मिली…

तुम मुझे पहले क्यूँ नहीं मिली?
जो तुम मुझे पहले मिल जाती,

कोई तो होता जो कहता, काश…
ये जो जल रही है, ये लवारिश नहीं है लाश…

~ कोड 05278 आगे 06121992…

Think out of the box!

Cogito, ergo sum

नाई और कसाई
दो दुकाने आमने सामने,
~
और ~
इतिहास में दर्ज एक शर्मनाक तारीख

राम राम भाई जान, आज बहुत लेट खोली दुकानचाचा सलाम, हाँ आजकल सुबह सुबह कम होता है काम

राम राम वाले भैया हमारे गाँव के एकलौते नाई है, वैसे वो ३ बहनों के भी इकलौते भाई हैं

सलाम चाचा, पेशे से कसाई है, आगे पीछे कोई नहीं,  पूरा गाँव है उनका और वो गाँव के, इसलिए अकेलापन नहीं खलता,  लेकिन भाई साहब, क्या काटते है जनाब, एक एक पीस, इसलिए धन्धा उनका ख़ूब चलता

 

अच्छे दोस्त मिलते नहीं आजकलचल भाई मेरे बाल ही सज़ा देख़ाली है तो कर ले अब थोड़ा काममेरा क्या है, बकरा कटा पड़ा हैकोई आएगा तो दुकान खोल दूंगा और पिस तोल दूंगा

आओ बैठो चाचा, नया चल रहा है, स्पाइक बना दूँ,  ३ बाल हैं, अच्छे लगेंगे, कम पड़े तो बोलो, बकरे की पूँछ लगा दूँ, और किसी को नहीं बताऊँगा, राज़ को राज़ रखूँगा पसीने में दबाकर

कर लो भाईजान, उड़ा लो आप भी खिल्ली, लो रास्ता काट गयी बिल्ली

भाइयों तुम दोनो का हो गया तो मेरा काम भी कर दो,  दाड़ी बनवाने आया हूँ, शाम को मटन खाने का मन भी हैचाचा जाओ दुकान खोलो और 1 किलो बाँते तोलोमेरा मतलब किलो भर चाँपे तोलो

भगाओ मत हट रहा हूँ भाई, बाल तो सजवा लूँ, तुम्हारा क्या है घूमते हो और खाते होकाम धाम कोई तुम्हें है नहीं, ना मिली तुम्हे छोकरी, ना नौकरीखाओ मटन पर पहले कमीज के बंद कर लो बटन

बटन नहीं हैचेन हैआज मन बड़ा बैचैन हैचाकरी नहीं करते हम किसी की, पैसा इतना है, क्यूँ करनी, धन्धा हमसे होगा नहीं, बाँध लेता है,  शादी कर के, शराब की दुकान की सेल बड़ाने का भी मेरा कोई विचार नहीं हैयाद आया घर में अचार नहीं है

अचार भी रखा है दुकान पर, ले लेनाखुलवा ही दोगे शटर तुमबड़े ही बेग़ैरत क़िस्म के इंसान हो के नहीं,

खोलता हूँ और तोलता हूँबातेतुम्हारी

बोलो बड़बोले भाई, मेरी मानो दाड़ी भी कलर करवा लोसफ़ेदी की चमकार के चक्कर में कहीं रिन वाले ले ना जाए आपको इशतहार के चक्कर मेंआपके, मुँह पर वैसे फ़्रेंच कट अच्छी लगेगीबना दूँ

ये क्या फिर से वही फटी क़मीज़, कितनी बार पहनोगे जनाब, अब कंधा देदो इसे भाई साहब

 

रुको रुको भाईऐसी वैसी कमीज नहीं है,इस क़मीज़ से प्यार है मुझे,  बाबूजी ने मेरे जन्मदिन वाले दिन, रात को ९ बजे दुकान खुलवा कर ख़रीदी थी मेरे लियेआज रेडीओ के मुँह पर ताला क्यूँ लगाया हुआ हैचलाओ इसे या बेच दो

 

भैया साइकिल की चेन उतर गयी है ज़रा खेंच दो

 

यह लो नवाब साहबबोलो तो पंक्चर भी कर दूँ, लगा दूंगानाइ गिरी कुछ ख़ास ना चल रहीसाइकिले ही बना दूंगाजैसे ठाकुर साहब, वैसे साहबजादे

 

ये लो, चला दिया बाजा, तुम्हें देख लिया था आते हुए, इसीलिये बंद किया था, एक ही राग चले सोचा था,

अब आपके लिए पेश है, भूले बिखरे गीत, इसकी फ़रमाइश की है, नाम गली के, गुमनाम भाई ने,

लग जा गले की फिर ये हसीं रात हो ना हो, शायद फिर इस जन्म में मुलाकात हो ना हो

 

कहानी ले लो, कहानी ले लो, मुझसे मेरी जवानी ले लो

 

लो आ गया, पगला यहीं काकहने को पागल है, बातें इसकी किसी स्कूल मास्टर से कम नहीं… 

कैसे दी कहानी?

अभी कहाँ दी, तुमने माँगी नहींकौनसी लोगेआज वाली या कल वाली

कल वाली

कल आ जाना दुकान पे, आज लिखूँगा, रात को पड़ूँगा, सुबह ले लेना

वाह, ठीक है, कल ले लूँगा,

भैया ये पागल है, या बनता है?

ये तो नहीं मालूम, एक बार पूछा तो, बड़बड़ाने लगा,

कुछ दोस्त बनाए थे हमने हम उनसे प्यार किया करके

वो मुस्कुरा के मिला करें और सीने पे वार दे जी भर के…”

 

सच कहा, फ़्रेंच कट काली दाड़ी पर जमेगीएकदम मस्त लगेगी, बना दोरुको यह क्या यह क्या दाम बड़ा दिए, कल तक तो ३० रुपए लिखे थे, आज ३३ कर दिए

 

हाँ भाई, काम कम है, सोचा दाम बड़ा देता हूँ,  तुम मटन के साथ खाते हो, मैं प्याज़ के साथचला लेता हूँ

वाह, शायरी सूझ रही है

लगता है कल वाला दर्द फिर उठा है, मेरी दाड़ सूज रही हैचलता हूँ, फिर मिलता हूँ

ये लो १०१० के ३ और ११ के तीन, पूरे ३३

 

शुक्र है, बातो का गोदाम गया, अब गाने सुनता हूँ और ताने बुनता हूँ

 

चाचा, किस विचार में खोए हो, अचार डाल दिया या आँखे खोल सोए हो….मुफ़्त में लूँगा और रुपया १ ना दूँगाअच्छा राम रामकल परसों आऊँगा करने दुआ सलामआम के आम और गुठलियों के दाम

 

चाचा चलो आओ खाना खा लेआज मैं मटन लाया हूँऔर तुम तो वही लाए होगे, जली कटी रोटी और अचारकितना अचार खाते होघर पर ही बनाते होअचार से याद आयाआज वार क्या है?

आज सोमवार हैकल मंगलजय हनुमान !!

मेरा बूंदी प्रशाद ले आना जब जाना, सारा ख़ुद ही मत खाना,  पिछली दफ़ा का इस बार ना चलेगा बहाना

वार पूछा क्योंकि मैं तो तुम्हें बताना भूल ही गयारात को बॉम्बे जा रहा हूँछोटी से मिलने

वहाँ से दिल्ली६ जाऊँगा बड़ी से भी मिल आऊँगा,  दिल्ली का मौसम सुना है इस बार दिसम्बर में भी गरम है

कल ट्रेन पकड़नी है… रेज़र्वेशन भी नहीं हुआ,  RAC में जाना पड़ेगा… टी टी तो अपने शर्मा जी हैप्रशाद ले जाऊंगा प्यार बढेगा..

अच्छा विचार हैऔर मेरी ओर से तुम छोटी और बड़ी के लिए ले जाओइस बार बहुत अच्छा बना है अचार ले जाओपैक करता हूँ

और मेरी भी दुआए ले जानामेरा फ़ोन नम्बर बदल गया है लिख लोकोड वही – 05278 आगे – 06121992

राज़ी ख़ुशी जाओ, और जल्दी लौट के आओहाल चाल बाँटते रहनाअच्छे दोस्त मिलते नहीं आजकल

मैं रहूँ या ना रहूँ, तुम मुझ में कहीं बाकी रहना, बस इतना है तुमसे कहना

यह फ़रमाइश की है चाचा ने राम भूमि से

चाचा, ये तुम ही हो ना, मुझे पता है तुम्हें ये गाना बहुत पसंद है, ना जाने क्या चला गया कान में सुबह से नाक बंद है

ये लो, बीच वाले जीजाजी का फ़ोन भी आ गया,

हेलो जीजा जी कैसे हो आज कैसे याद कियाक्या, कल आ रहे होलो और मैं दिल्ली जा रहा हूँ सुबह की गाडी सेअब तुम्हारा इस्तक़बाल चाचा करेंगेठीक है बोल देता हूँनमाज़ के बाद मस्जिद के सामने ही मिलेंगेरखता हूँ

चाचा कल जीजा जी आ रहे है, कार से, सेवा करने… अब तुम ही करना उनका स्वागतमटन बहुत शौक़ से खाते हैरोटी जलाना मतमैं शाम में पहुँच के फ़ोन करूँगानम्बर लिख लिया है मैंनेआज जल्दी जाऊँगा, खाऊँगासुबह की गाड़ी हैअभी बनानी ख़ुद की भी दाड़ी है, रात में ही बनाऊँगापहले जाते ही गरम पानी से नहाऊँगासर्दी बड़ी है

वर्दी छोटी पहन के आये हो दरोगा साहबबैठो खाना खाओगे या कुछ और

हाँ तो चाचा और तुम अपना ध्यान रखनाजुम्मे की नमाज़ में दुआ करनाबूंदी मैं ले आऊंगाजल्दी वापस आऊंगाखाने का भी रखना ध्यानजली कटी सुनाने वाला नहीं है कोईजली कटी रोटी से ही काम चलाते होबड़ी जल्दी जल्दी खाते हो

लो आ गया तुम्हारा चहेता ग्राहक

हाथ धोलो और ९ किलो मटन तोलोअभी भी ९ किलो ही लेता है या बड़ा दियाहोटल इसने अच्छा चला दियाएक बार ही खाया थालेकिन ज़ुबान पे आज भी स्वाद है

बैठिये दरोगा साहब..बाल कटवाओगे या शेव कर दूँऔर कुछ नहीं तो जेब ही भर दूँ

क्या बोलते रहते होतुमसे पैसे लेंगे, शेव करो हम तुम्हे कुछ नहीं देंगे

 

चाचाचाचाक्या इरादा हैअँधेरा होगा थोड़ी देर मेंआज दुकान बढ़ानी है या रात यही बितानी है… चलो चलेफ़ोन कर देना पहुँच करखुदाहाफिज

राम राम चाचाकर दूंगा उतरते ही

 

हे भगवान् ६ बज गएअर्रेलौंडे रिक्शा निकाल और सीधा प्लेटफार्म में डालभगवन तेरा भला करेले किराया और पकड़ अगली सवारीआ गयी गाड़ी हमारी

सफ़र बहुत लम्बा था, आराम से कट गया फिर भी… बॉम्बे की बात ही कुछ और हैसमंदर भी है, सितारे भी, मिलते यहाँ किनारे भीपर घर की बात ही कुछ और है… भैया एक चाय देना, और रेडीओ की आवाज़ बड़ा लेना

यह लो भाई सुन लो

तेरा शहर जो पीछे छूट रहा..कुछ अन्दर अन्दर टूट रहा

 

भैयाजी यहाँ फ़ोन कहाँ है, STD करनी है

आगे, सीधा जा के उलटा हो जायिएऔर कटिंग चाय के ३ रुपये लायिए

लीजिये १० का है

दिए और खयालो में चल पड़ास्टेशन देख हैरान..इतना बड़ा

चल बेटा, गाड़ी गयी, अगली की तैयारी कर,

और नाश्ता लगा दे, मेरे लिए १ वड़ापाव सजा दे

 

ये गया सीधा, हुआ उलटा, और झट से पलटा, बाक़ी पैसे लेना जो भूल गया था

सीधा, उलटा, वापस दुकान पेआया और धीरे से चिल्लाया, भाईजीएक फ़ोन मिलाना है, मिला दो, और वो स्टूल इधर खिसका दो

नम्बर बताइए

स्टूल क्या करेंगे, मेरी कुर्सी पे आ जायिए

हँसते हँसते, मेरी हँसी छूट गयीऔर दरवाज़े में अटक घड़ी टूट गयी, देखा तो टाइम ९ बता रही थीअब तक तो चाचा नमाज़ पढ़ के, मस्जिद के सामने अड़ के खड़े होंगेजीजा भी पहुँच गए होंगे, रुकता हूँ १० मिनट बाद करता हूँ

आज की ताज़ा ख़बर, आज की ताज़ा ख़बर

क्या ताज़ा होगा, सब वही होगा सोच के मुस्कुरा दिया और नम्बर बता दिया

कोड 05278 आगे 06121992….घंटी बज रही है,

उठा नहीं रहे

सेठजी सुनिये आप पकड़िएबाजू वाली दुकान का महूरत हैहवन हो रहा हैमैं अटेंड कर के आता हूँअंदर आईये और आराम से मिलाइए, मैं जा के आता हूँ, आप बैठ जायिए

चाचा तो एक ही घंटी में ही उठा लेते है फ़ोनकभी कभी तो बजता हैहमारे सिवा उन्हें करता है कौन

नम्बर चेक कर लेता हूँ..कोड 05278 आगे 06121992…सही है, मिलाया और घंटी ही जा रही है

फिर जवाब नहीं आया..और जैसे ही अखबार की आज की ताज़ा ख़बर पर पड़ी मेरी नज़र

 

उधर हवन हुआ सम्पन

ॐ भूर्भुवः स्वः

और इधर मैं

~ इत्तफ़ाक़…

Coincidence

Picture Credit : Google Images

 

पड़ गया मेरे आराम में आज फिर खलल पड़ गयाफिर बैठे बैठे हुआ खड़ा आज फिर मन बदल गया,

चलने ही वाला था पर जैसे ही उठाया पहला कदमपिछले वाला अगले वाले से बेवजह ही लड़ गया

 

नीली पतलून, पिली क़मीज़ अंदर सफ़ेद बनियानजूता पहना भुला जुराब, साली किस्मत है ही ख़राब,

घुमा, मुड़ा और जैसे तैसे चल पड़ा देखा बटुआ पड़ाकिसका है ? मेरा तो हैं नहीं, बटुआ था तस्वीरों भरा

 

कल ली थी रेल की टिकट घूमने जाने को कहींजाने क्यों अब कहीं जाने का बिलकुल मन नहीं,

क्या करूँ, क्या नहीं, फाड़ा टिकट उतारी जैकेट,  उतारा जैसे ही जैकेट गिरा उसमें से एक पैकेट

 

पैकेट में थी नाटक की टिकट, नाटकइत्तफ़ाक़”, डिरेक्टर बेबाक़, ऐक्टर तपाक, क्रू फटफट फ़टाक,

ऑडीयन्स में भी जोश था, बस, दरबान ख़ामोश थापूछा तो बोला, बेटा था ना रहा, तस्वीरें थी अब वो भी नहीं

 

याद है ? बटुआ तस्वीरों से भरा, उठाया था, बताना भुल गयाउसकी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा, होश था अब जोश था,

बेटा, उसका लड़खडाता था, ठीक से चल ना पाता थाशौंक उसे सिर्फ़ तस्वीरों का था, “इत्तफ़ाक़ये तक़दीरों का था

~ सहेली…

~ सहेली

~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~

मोहे इश्क़ हुआ ज़रा धीरे से,

धीरे धीरे से तेरे वीरे से,

इक काम करा दे मेरा,

ले चल कल उसे तू मेले में,

मिलवा दे मुझे तू अकेले में,

तू है ना मेरी पक्की वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

मेरा दिल अब ना मेरे क़ाबू में,

नैन मेरे, रस्ते पे अड़े,

थक गयी अब मैं खड़े खड़े,

इक बार मुझे मिलवा दे ना,

नाल उसदे मुझे बिठा दे ना,

ओ मेरी पक्की वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

मैं रात से बुझी बुझी सी हूँ,

ना भूख मुझे ना प्यास लगे,

कभी दिल अटके कभी साँस रुके,

अंकल को ससुर बनवा दे ना,

मम्मी को सास बनवा दे ना,

ओ तू मेरी पक्की वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

मैं बावरी हो के नचड़ा

मैं हुँड नहीयो है बचना,

जग झूठा लगे वो सच-ना,

तेरा वीरे विच दिखे मुझे सजना,

मैं बस उस वास्ते है सजना,

हायों मेरी पक्की वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

तू मेरी पक्की वाली सहेली है,

बचपन से साथ तू खेली है,

मेरी डोली घर बुलवा दे ना,

अपड़े वीरे से अन्ख लड़वा दे,

अपने घर मेरा घर वसावा दे,

ओ मेरी सच्ची वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

~ आलोचना…

alochana

~ आलोचना

जब करो तुम कोई वजह से किसी की भी आलोचना,

रोक लेना जिह्वा को अपनी और दिल से इतना सोचना

 

की तुम में कितनी खूबियां है तुम में कितने दोष हैं,

लेना पकड़ कोना कोई और आँखों को अपनी मूँद कर,

अपनी सिमटी समझ की खिड़कियों को देना खोल तुम,

और सोचना, उठा भी पाओगे क्या अपनी कमीयों का तोल तुम

 

कितना आसान चीनीनुक्ता और अपनी कथनी को कहना पुख्ता,

है बड़ा कठिन सुनना लगा कान और अपनी गलती को लेना मान,

इक धक्का सा लग जाता है जब दोष कोई गिनवाता है,

अपने दोषों की गठरी छुपाने को अफवाहें फिर फैलाता हैं

 

ये अफवाहेंसुखी, तीखी, लाल मिर्च सी होती है,

और हवा का रुख जब पलटता अपनी ही आँखें रोती हैं,

तेरा जायेगा तेरे संग और तू अपने करम की ही खायेगा,

कर के दूजों की बुरीभली तू किसी की आँख ना भायेगा

 

वो जो इधर उधर की खाता है और अफवाहें फैलाता है,

वो किसी का कैसे हो सकता हैं जो बातों की आग लगाता हैं,

ये जिव्हा, गुड़मिश्री की ढेली हैं ये तेज़तीखी तलवार भी है,

ये कड़वा ज़हर का घूँट कभी और करोड़ों का व्यापार भी हैं

 

रोक लेना जिह्वा को अपनी बस दिल से इतना सोचना,

करने लगो आलोचना, अब जो करने लगो आलोचना…

 

Picture : Google Images

~ आयिना…

~ आयिना...

ये काग़ज़ पलट के तुम क्या देखते हो,

जला देखते हो या कुछ बचा देखते हो...


तुम्हारी वो आदत अब भी बदली नहीं है,

ख़ुद को तुम वैसा दूजे को बदला देखते हो...


तुम्हें याद है बचपन में तुम थे एक सीधी लकीर,

फ़र्क़ इतना कि अब तुम सबको टेड़ा देखते हो...


ये बात बात पर तुम्हारा भोंहें चड़ाना,

तुम ख़ुद को आसमान हमें ज़र्रा देखते हो...


देखा है तुमको कोड़ियों को घूर कर ताकते,

क्यों तुम ख़ुद को सोने चाँदी से जड़ा देखते हो...


तुम्हें ना बारिश से लेना ना पतझड़ को देना,

तुम हमें सूखा पीला, ख़ुद को हरा-भरा देखते हो...


हम भरी महफ़िल में सिर्फ़ तुम्हें देखते हैं,

और तुम हमें देख बस यहाँ वहाँ देखते हो...

Image credits- Vitaliy Deynega

ये दुनियाँ है जाला और हम सब हैं मकड़ी,

है मुहब्बत आज़ादी तो ख़ुद क्यूँ जकड़ा देखते हो...


तुम थिरकती रेलगाड़ी हमें समझो पटरी,

क्यूँ हमारे वजूद को तुम ख़तरा देखते हो...


जो ज़िंदगी कहानी हम तुम उसके किरदार,

एक क़िस्सा मेरा एक तेरा, तुम सिर्फ़ पड़दा देखते हो...


कुछ तुमने बनाया कुछ हमने पिरोया,

तुम अपना बनाया हमारा उजड़ा देखते हो...


अब इसके भी आगे, और कुछ क्या कहूँ मैं,

सच कहना, क्या कभी तुम आयिना देखते हो...



Photo Credits :-

‘Love,’ by Ukrainian sculptor Alexander Milov

Image credits: Vitaliy Deynega

~ Hakuna Matata…

 

पानी को आईना बना चाँद को रोटी समझ खा गया, शहर में जानवरों की तादाद देख शेर जंगल की ओर भागा गया…

पूरा जंगल उत्सुकता का मारा, आते ही लगा दी सवालों की झड़ी और मिनटों में लम्बी लाइन लग पड़ी…

पहला सवाल कुत्ते ने पूछा – शहर तो बड़ा साफ़ होगा?
~ जवाब मिला – साफ़ सिर्फ काले चश्में वाले लोग थे, बाकी तो नर्क रहे भोग थे…

दूसरा, लोमड़ी – सुना है वहां भी मेरे चर्चे हैं “लोमड़ी की सी चालाकी?
~ शेर हँसा – तुम से कहीं बढ़कर, तुम्हारी खाल से पता तो चलता है…

बिच्छू आया, डंक घुमाया, बैठा, आदमी काटता है क्या?
~ शेर – हाँ ऐसा इकलौता जानवर जो अपने ही जैसों को काटता है, और किसी को नहीं बांटता है, खाया जाये ना जाये,
सड़ा देगा मगर किसी और को नहीं देगा…

बिल्ली, मुझे शहर पसंद है, सुना है वहाँ बिल्ली को दूध आराम से मिलता है, ऐसा है?
~ शेर – बिल्ली को तो मिलता है, मगर सड़को पर आदमी के बच्चे सूखे पड़े रहते है, शायद बिल्लियों को ही मिलता है…

उड़ती उड़ती चिड़िया आयी और चिल्लाई, आदमी उड़ते हैं क्या?
~ मैं भी हैरान हूँ – सुना तो बहुत हैं – बहुत उड़ने लगा हैं पर निकल आये हैं…

हाथी आया – घुमा फिरा के सूंड को पूछा – ये शहर में हाथी के दांतो का क्या करते हैं?
~ शेर ने सुना था – जड़ दिया … भाई हाथी वहां खाने और दिखने के दांत अलग होते हैं, इसलिए तुम्हारे ले जाते हैं…

बारी आयी सांप की – ऐसे कौन सी चीज़ हैं जो शहर में आराम से मिल जाती हैं?
~ शेर पहले तो थोड़ा परेशान हुआ, सब कुछ तो हैं…हाँ शायद ज़हर…सब कहते हैं इसने-उसने ज़िन्दगी में ज़हर घोल रखा हैं…

बारी अब थी गिरगिट की, और उसे रंग बदलने से कहाँ फ़ुर्सत, रंग को किया उसने लाल और चिपकाया अपना सवाल…क्या आदमी रंग बदलता है?
~ सवाल तो अच्छा है; मगर बवाल वहाँ रंग बदलने का कम है, आपका रंग कितना गोरा या काला है ये बहुत बड़ा मसला है… गोरा होना जैसे लाजवाब है और ना होना कोई पाप…स्किन का वाइट कलर इम्पोर्टेन्ट फैक्टर है और ना होना डार्क चैप्टर…
जवाब तुम्हारे सवाल का…इतने वहाँ मौसम नहीं जितने आदमी के रंग हैं…चार पैसे में रंग बदल जाता हैं, कुछ हज़ार में बालों का कलर, लाखों में फ्यूचर का कलर ब्राइट होते देखा हैं…और इश्क़ ऐसी बला जिसमें सब टेक्नीकलर…

मोर क्वेश्चन प्लीज…मेरा मतलब मोर तुम्हारा सवाल?
मोर जी ने पंख फैलाये और याद आया सवाल तो घर ही भूल आये…पंख फैलाया तो सवाल याद आया…शेर जी, आदमी ख़ुशी में नाचता है या गम में…
~ जितना मुझे समझ आता है ख़ुशी में वो खुल के सामने नाचता है, और ऐसे नाच में सब शरीक होते हैं…गम एक ऐसी हलचल है जो उसे अंदर ही अंदर नचाती है…

अब आया भैंस का नंबर…
शेर जी ये बताओ – भैंस को वहाँ चारा बैठे बैठे मिलता हैं वहाँ तो जंगल हैं नहीं?
~ वहाँ भैंस और आदमी दोनों चारा खाते हैं पगली…कमी नहीं हैं…

भालू आया और वो भी शरमाया और पूछ ही बैठा, वहाँ भी लोग काले होते हैं?
~ इस बात पर शेर थोड़ा गंभीर हुआ और नम भी…एकदम संजीदा हो कर बोला बस यही तो बात हैं जिसकी वजह से मैं वहाँ टिक नहीं पाया, वहाँ खाने-पिने की कोई कमी थी, अपने आप चले आते थे मरने, लेकिन एक दिन मैंने सुना की वहाँ दिल भी काले होते हैं…
पहले तो मेरी समझ नहीं आया लेकिन जब तहकीकात की तो पता चला के जहाँ मैं छुपा था वो हस्पताल के पीछे की दिवार थी और मैं वहाँ छुपा हूँ ये बात किसी और को भी पता थी…वो रोज़ किसी को बहला-फुसला कर लता और वहाँ छोड़ जाता, मुझे लगा शिकार मैंने किया हैं, लेकिन जब पता चला तो मैं तिलमिला उठा और उसी को खा गया…उसका सीना खोला और क्या देखता हूँ…उसका दिल काला था…

यहाँ कोने में बैठा बन्दर कुछ बड़बड़ा रहा था और केला खा रहा था…शेर खुद ही उससे पूछ बैठा –
~ तुम तो उनके पूर्वज हो और तुम्हे तो वहाँ पूजा भी जाता हैं, तुम जंगल में क्या कर रहे हो?
बन्दर ने इत्मीनान से केला खाते खाते जवाब दिया…कुछ लोग हैं जो मुझे पूजते हैं लेकिन भगवान खुद को ही समझते हैं…

…और अब तो जानवरों की जैसे लाइन ही लग गयी…ये दो किलोमीटर लम्बी लाइन – जो-जो सवाल पूछ कर आते रहे, घर जाते खाने-पिने का इंतज़ाम कर लाइन में बेचने लगे…कुछ इस तरह चंद सवालों के जवाब क्या मिले जानवर भी ओपरट्यूनिटी का बिज़नेस करने लगे…और आदमी की तरह वो भी जेबें भरने लगे…

वहीँ कहीं अचानक एक गधे की नज़र पड़ी और वो भी लाइन में लग गया…तीन दिन बाद उसका जब नंबर आया तो शेर तो शेर सारी महफ़िल का सर चकराया…सवाल था ऐसे जैसे जैसे किसी ने पूछ लिया हो के आसमान में कितने तारे है…
सवाल था…
…”क्या शहर में गधे होते हैं?”…

~ इस पर शेर ने नाक से एक लम्बी सांस अंदर खींची और मुँह से गधे के कान में कुछ फुसफुसाया…और उसके बाद तो गधे की जैसे ख़ुशी का कोई ठिकाना ना रहा, वो नाचने लगा गाने लगा, अपनी धुन बजाने लगा, कहीं से भी आने लगा कहीं भी जाने लगा…

~~ सब परेशान की शेर ने उसके कान में क्या बोला की इसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नहीं…
~~ और थोड़ा शेर भी हैरान…आज आदमी की तरह जानवर भी परेशान लग रहे हैं…