~ कोड 05278 आगे 06121992…

Think out of the box!

Cogito, ergo sum

नाई और कसाई
दो दुकाने आमने सामने,
~
और ~
इतिहास में दर्ज एक शर्मनाक तारीख

राम राम भाई जान, आज बहुत लेट खोली दुकानचाचा सलाम, हाँ आजकल सुबह सुबह कम होता है काम

राम राम वाले भैया हमारे गाँव के एकलौते नाई है, वैसे वो ३ बहनों के भी इकलौते भाई हैं

सलाम चाचा, पेशे से कसाई है, आगे पीछे कोई नहीं,  पूरा गाँव है उनका और वो गाँव के, इसलिए अकेलापन नहीं खलता,  लेकिन भाई साहब, क्या काटते है जनाब, एक एक पीस, इसलिए धन्धा उनका ख़ूब चलता

 

अच्छे दोस्त मिलते नहीं आजकलचल भाई मेरे बाल ही सज़ा देख़ाली है तो कर ले अब थोड़ा काममेरा क्या है, बकरा कटा पड़ा हैकोई आएगा तो दुकान खोल दूंगा और पिस तोल दूंगा

आओ बैठो चाचा, नया चल रहा है, स्पाइक बना दूँ,  ३ बाल हैं, अच्छे लगेंगे, कम पड़े तो बोलो, बकरे की पूँछ लगा दूँ, और किसी को नहीं बताऊँगा, राज़ को राज़ रखूँगा पसीने में दबाकर

कर लो भाईजान, उड़ा लो आप भी खिल्ली, लो रास्ता काट गयी बिल्ली

भाइयों तुम दोनो का हो गया तो मेरा काम भी कर दो,  दाड़ी बनवाने आया हूँ, शाम को मटन खाने का मन भी हैचाचा जाओ दुकान खोलो और 1 किलो बाँते तोलोमेरा मतलब किलो भर चाँपे तोलो

भगाओ मत हट रहा हूँ भाई, बाल तो सजवा लूँ, तुम्हारा क्या है घूमते हो और खाते होकाम धाम कोई तुम्हें है नहीं, ना मिली तुम्हे छोकरी, ना नौकरीखाओ मटन पर पहले कमीज के बंद कर लो बटन

बटन नहीं हैचेन हैआज मन बड़ा बैचैन हैचाकरी नहीं करते हम किसी की, पैसा इतना है, क्यूँ करनी, धन्धा हमसे होगा नहीं, बाँध लेता है,  शादी कर के, शराब की दुकान की सेल बड़ाने का भी मेरा कोई विचार नहीं हैयाद आया घर में अचार नहीं है

अचार भी रखा है दुकान पर, ले लेनाखुलवा ही दोगे शटर तुमबड़े ही बेग़ैरत क़िस्म के इंसान हो के नहीं,

खोलता हूँ और तोलता हूँबातेतुम्हारी

बोलो बड़बोले भाई, मेरी मानो दाड़ी भी कलर करवा लोसफ़ेदी की चमकार के चक्कर में कहीं रिन वाले ले ना जाए आपको इशतहार के चक्कर मेंआपके, मुँह पर वैसे फ़्रेंच कट अच्छी लगेगीबना दूँ

ये क्या फिर से वही फटी क़मीज़, कितनी बार पहनोगे जनाब, अब कंधा देदो इसे भाई साहब

 

रुको रुको भाईऐसी वैसी कमीज नहीं है,इस क़मीज़ से प्यार है मुझे,  बाबूजी ने मेरे जन्मदिन वाले दिन, रात को ९ बजे दुकान खुलवा कर ख़रीदी थी मेरे लियेआज रेडीओ के मुँह पर ताला क्यूँ लगाया हुआ हैचलाओ इसे या बेच दो

 

भैया साइकिल की चेन उतर गयी है ज़रा खेंच दो

 

यह लो नवाब साहबबोलो तो पंक्चर भी कर दूँ, लगा दूंगानाइ गिरी कुछ ख़ास ना चल रहीसाइकिले ही बना दूंगाजैसे ठाकुर साहब, वैसे साहबजादे

 

ये लो, चला दिया बाजा, तुम्हें देख लिया था आते हुए, इसीलिये बंद किया था, एक ही राग चले सोचा था,

अब आपके लिए पेश है, भूले बिखरे गीत, इसकी फ़रमाइश की है, नाम गली के, गुमनाम भाई ने,

लग जा गले की फिर ये हसीं रात हो ना हो, शायद फिर इस जन्म में मुलाकात हो ना हो

 

कहानी ले लो, कहानी ले लो, मुझसे मेरी जवानी ले लो

 

लो आ गया, पगला यहीं काकहने को पागल है, बातें इसकी किसी स्कूल मास्टर से कम नहीं… 

कैसे दी कहानी?

अभी कहाँ दी, तुमने माँगी नहींकौनसी लोगेआज वाली या कल वाली

कल वाली

कल आ जाना दुकान पे, आज लिखूँगा, रात को पड़ूँगा, सुबह ले लेना

वाह, ठीक है, कल ले लूँगा,

भैया ये पागल है, या बनता है?

ये तो नहीं मालूम, एक बार पूछा तो, बड़बड़ाने लगा,

कुछ दोस्त बनाए थे हमने हम उनसे प्यार किया करके

वो मुस्कुरा के मिला करें और सीने पे वार दे जी भर के…”

 

सच कहा, फ़्रेंच कट काली दाड़ी पर जमेगीएकदम मस्त लगेगी, बना दोरुको यह क्या यह क्या दाम बड़ा दिए, कल तक तो ३० रुपए लिखे थे, आज ३३ कर दिए

 

हाँ भाई, काम कम है, सोचा दाम बड़ा देता हूँ,  तुम मटन के साथ खाते हो, मैं प्याज़ के साथचला लेता हूँ

वाह, शायरी सूझ रही है

लगता है कल वाला दर्द फिर उठा है, मेरी दाड़ सूज रही हैचलता हूँ, फिर मिलता हूँ

ये लो १०१० के ३ और ११ के तीन, पूरे ३३

 

शुक्र है, बातो का गोदाम गया, अब गाने सुनता हूँ और ताने बुनता हूँ

 

चाचा, किस विचार में खोए हो, अचार डाल दिया या आँखे खोल सोए हो….मुफ़्त में लूँगा और रुपया १ ना दूँगाअच्छा राम रामकल परसों आऊँगा करने दुआ सलामआम के आम और गुठलियों के दाम

 

चाचा चलो आओ खाना खा लेआज मैं मटन लाया हूँऔर तुम तो वही लाए होगे, जली कटी रोटी और अचारकितना अचार खाते होघर पर ही बनाते होअचार से याद आयाआज वार क्या है?

आज सोमवार हैकल मंगलजय हनुमान !!

मेरा बूंदी प्रशाद ले आना जब जाना, सारा ख़ुद ही मत खाना,  पिछली दफ़ा का इस बार ना चलेगा बहाना

वार पूछा क्योंकि मैं तो तुम्हें बताना भूल ही गयारात को बॉम्बे जा रहा हूँछोटी से मिलने

वहाँ से दिल्ली६ जाऊँगा बड़ी से भी मिल आऊँगा,  दिल्ली का मौसम सुना है इस बार दिसम्बर में भी गरम है

कल ट्रेन पकड़नी है… रेज़र्वेशन भी नहीं हुआ,  RAC में जाना पड़ेगा… टी टी तो अपने शर्मा जी हैप्रशाद ले जाऊंगा प्यार बढेगा..

अच्छा विचार हैऔर मेरी ओर से तुम छोटी और बड़ी के लिए ले जाओइस बार बहुत अच्छा बना है अचार ले जाओपैक करता हूँ

और मेरी भी दुआए ले जानामेरा फ़ोन नम्बर बदल गया है लिख लोकोड वही – 05278 आगे – 06121992

राज़ी ख़ुशी जाओ, और जल्दी लौट के आओहाल चाल बाँटते रहनाअच्छे दोस्त मिलते नहीं आजकल

मैं रहूँ या ना रहूँ, तुम मुझ में कहीं बाकी रहना, बस इतना है तुमसे कहना

यह फ़रमाइश की है चाचा ने राम भूमि से

चाचा, ये तुम ही हो ना, मुझे पता है तुम्हें ये गाना बहुत पसंद है, ना जाने क्या चला गया कान में सुबह से नाक बंद है

ये लो, बीच वाले जीजाजी का फ़ोन भी आ गया,

हेलो जीजा जी कैसे हो आज कैसे याद कियाक्या, कल आ रहे होलो और मैं दिल्ली जा रहा हूँ सुबह की गाडी सेअब तुम्हारा इस्तक़बाल चाचा करेंगेठीक है बोल देता हूँनमाज़ के बाद मस्जिद के सामने ही मिलेंगेरखता हूँ

चाचा कल जीजा जी आ रहे है, कार से, सेवा करने… अब तुम ही करना उनका स्वागतमटन बहुत शौक़ से खाते हैरोटी जलाना मतमैं शाम में पहुँच के फ़ोन करूँगानम्बर लिख लिया है मैंनेआज जल्दी जाऊँगा, खाऊँगासुबह की गाड़ी हैअभी बनानी ख़ुद की भी दाड़ी है, रात में ही बनाऊँगापहले जाते ही गरम पानी से नहाऊँगासर्दी बड़ी है

वर्दी छोटी पहन के आये हो दरोगा साहबबैठो खाना खाओगे या कुछ और

हाँ तो चाचा और तुम अपना ध्यान रखनाजुम्मे की नमाज़ में दुआ करनाबूंदी मैं ले आऊंगाजल्दी वापस आऊंगाखाने का भी रखना ध्यानजली कटी सुनाने वाला नहीं है कोईजली कटी रोटी से ही काम चलाते होबड़ी जल्दी जल्दी खाते हो

लो आ गया तुम्हारा चहेता ग्राहक

हाथ धोलो और ९ किलो मटन तोलोअभी भी ९ किलो ही लेता है या बड़ा दियाहोटल इसने अच्छा चला दियाएक बार ही खाया थालेकिन ज़ुबान पे आज भी स्वाद है

बैठिये दरोगा साहब..बाल कटवाओगे या शेव कर दूँऔर कुछ नहीं तो जेब ही भर दूँ

क्या बोलते रहते होतुमसे पैसे लेंगे, शेव करो हम तुम्हे कुछ नहीं देंगे

 

चाचाचाचाक्या इरादा हैअँधेरा होगा थोड़ी देर मेंआज दुकान बढ़ानी है या रात यही बितानी है… चलो चलेफ़ोन कर देना पहुँच करखुदाहाफिज

राम राम चाचाकर दूंगा उतरते ही

 

हे भगवान् ६ बज गएअर्रेलौंडे रिक्शा निकाल और सीधा प्लेटफार्म में डालभगवन तेरा भला करेले किराया और पकड़ अगली सवारीआ गयी गाड़ी हमारी

सफ़र बहुत लम्बा था, आराम से कट गया फिर भी… बॉम्बे की बात ही कुछ और हैसमंदर भी है, सितारे भी, मिलते यहाँ किनारे भीपर घर की बात ही कुछ और है… भैया एक चाय देना, और रेडीओ की आवाज़ बड़ा लेना

यह लो भाई सुन लो

तेरा शहर जो पीछे छूट रहा..कुछ अन्दर अन्दर टूट रहा

 

भैयाजी यहाँ फ़ोन कहाँ है, STD करनी है

आगे, सीधा जा के उलटा हो जायिएऔर कटिंग चाय के ३ रुपये लायिए

लीजिये १० का है

दिए और खयालो में चल पड़ास्टेशन देख हैरान..इतना बड़ा

चल बेटा, गाड़ी गयी, अगली की तैयारी कर,

और नाश्ता लगा दे, मेरे लिए १ वड़ापाव सजा दे

 

ये गया सीधा, हुआ उलटा, और झट से पलटा, बाक़ी पैसे लेना जो भूल गया था

सीधा, उलटा, वापस दुकान पेआया और धीरे से चिल्लाया, भाईजीएक फ़ोन मिलाना है, मिला दो, और वो स्टूल इधर खिसका दो

नम्बर बताइए

स्टूल क्या करेंगे, मेरी कुर्सी पे आ जायिए

हँसते हँसते, मेरी हँसी छूट गयीऔर दरवाज़े में अटक घड़ी टूट गयी, देखा तो टाइम ९ बता रही थीअब तक तो चाचा नमाज़ पढ़ के, मस्जिद के सामने अड़ के खड़े होंगेजीजा भी पहुँच गए होंगे, रुकता हूँ १० मिनट बाद करता हूँ

आज की ताज़ा ख़बर, आज की ताज़ा ख़बर

क्या ताज़ा होगा, सब वही होगा सोच के मुस्कुरा दिया और नम्बर बता दिया

कोड 05278 आगे 06121992….घंटी बज रही है,

उठा नहीं रहे

सेठजी सुनिये आप पकड़िएबाजू वाली दुकान का महूरत हैहवन हो रहा हैमैं अटेंड कर के आता हूँअंदर आईये और आराम से मिलाइए, मैं जा के आता हूँ, आप बैठ जायिए

चाचा तो एक ही घंटी में ही उठा लेते है फ़ोनकभी कभी तो बजता हैहमारे सिवा उन्हें करता है कौन

नम्बर चेक कर लेता हूँ..कोड 05278 आगे 06121992…सही है, मिलाया और घंटी ही जा रही है

फिर जवाब नहीं आया..और जैसे ही अखबार की आज की ताज़ा ख़बर पर पड़ी मेरी नज़र

 

उधर हवन हुआ सम्पन

ॐ भूर्भुवः स्वः

और इधर मैं

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~ इत्तफ़ाक़…

Coincidence

Picture Credit : Google Images

 

पड़ गया मेरे आराम में आज फिर खलल पड़ गयाफिर बैठे बैठे हुआ खड़ा आज फिर मन बदल गया,

चलने ही वाला था पर जैसे ही उठाया पहला कदमपिछले वाला अगले वाले से बेवजह ही लड़ गया

 

नीली पतलून, पिली क़मीज़ अंदर सफ़ेद बनियानजूता पहना भुला जुराब, साली किस्मत है ही ख़राब,

घुमा, मुड़ा और जैसे तैसे चल पड़ा देखा बटुआ पड़ाकिसका है ? मेरा तो हैं नहीं, बटुआ था तस्वीरों भरा

 

कल ली थी रेल की टिकट घूमने जाने को कहींजाने क्यों अब कहीं जाने का बिलकुल मन नहीं,

क्या करूँ, क्या नहीं, फाड़ा टिकट उतारी जैकेट,  उतारा जैसे ही जैकेट गिरा उसमें से एक पैकेट

 

पैकेट में थी नाटक की टिकट, नाटकइत्तफ़ाक़”, डिरेक्टर बेबाक़, ऐक्टर तपाक, क्रू फटफट फ़टाक,

ऑडीयन्स में भी जोश था, बस, दरबान ख़ामोश थापूछा तो बोला, बेटा था ना रहा, तस्वीरें थी अब वो भी नहीं

 

याद है ? बटुआ तस्वीरों से भरा, उठाया था, बताना भुल गयाउसकी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा, होश था अब जोश था,

बेटा, उसका लड़खडाता था, ठीक से चल ना पाता थाशौंक उसे सिर्फ़ तस्वीरों का था, “इत्तफ़ाक़ये तक़दीरों का था

~ Crescent…

IMG_1645.jpg

And they started to walk together…

they walked in a straight line which had highs and lows,

as if the road was trying to match their heartbeat,

an up and a down, an up and a down…

 

In between they held their hands,

the cold breeze numbed his hands,

almost frozen and they needed to be warmed,

brush of their palms was just enough to give him a slight current,

and their hearts spoke to each other, enhancing the  warmth…

 

The sun wasn’t that bright,

but this pancake layer of moon was visible,

the shape wasn’t perfect round,

as if…

they both had taken a bite and made it a waxing crescent.

White pancake perfectly placed on this big blue plate,

it was their first day-moon moment together…

~ एक कश तेरे लिए…

हेलो इसमत, मंतो

तुम्हारी आख़िरी कहानी पड़ी, क्याक्या लिखती रहती हो, इस बार अगर कोई भी शोर हुआ, मैं नहीं आने वाला तुम्हारे साथ, लाहोर

अच्छा, पहली बात वो आख़िरी कहानी नहीं है, मन किया तो और लिखूँगी, और दूसरी, ठीक है मत आना, मैं भी देखती हूँ कैसे रह लेते हो

अच्छा, कहाँ हो अभी

अभी, चारपाई पे, उलटी लेट कर, कहानी को सीधा कर रही हूँ, कुछ ज़्यादा ही टेडी हैं, इससे अच्छा तो खीर बना लेती, तुम पहले कहते तो तुम्हें भी बुला लेती, मिल के दोनो कहानी और खीर दोनो सीधी कर लेते

उफ़्फ़, बातों में तुमसे कोई नहीं जीत सकता, मेरे सिवाआ रहा हूँ, इस गरम हवा में ठंडी खीर खाएँगे और कहानी का उल्लू सीधा कर लेंगे

(ठकठक करते ही दरवाज़ा चर्र कर के खुला, और मुँह से निकला)

दरवाज़ा लगवाया ही क्यूँ है जब बंद करना ही नहीं होता

लगवाया था, की कोई आए तो अंदर से बंद कर लूँगी और आया भी कौन, मंतोतुम्हारे ही नाम पर कहावत बनी है, बिन बुलाए मेहमान

हँस लो, हँस लोऐसी ना जाने कितनी है जिन्हें इन्तज़ार ही सिर्फ़ मेरा रहता है

रहने भी दो हुज़ूर, ऐसा तुम्हारा दिल कहता हैतुम्हारा इन्तज़ार तो खुदा भी ना करे

कुछ खिलाओगी, पिलाओगी भी या सिर्फ़ खुदा का ख़ौफ़ दिखा के डराओगी, खीर कहाँ है और वो टेढ़ी कहानी

मुझे देखो, मैं सीधी हो गयी तो कहानी भी सीधी हो गयी, कुछ पका लिया था, पकने से पहले ही खा लिया था, कहानी क्या थी, बला थी, तुम देख लेते तो लट्टू हो जाते

फिर वही बातों की जलेबी पका गोल गोल घुमा रही हो, सब छोड़ो क्या खिला रही हो, बाक़ी समझ गया, कहानी पूरी हो गई और भूख उसी के साथ मर गयी तुम्हारी, सब अकेले अकेले ही कर लिया, मुझे सिर्फ़ सताने के लिए बुलाया है क्या

अब कुछ पिलाओ, गिलास कहाँ रखें है

पुराने गिलास, घर पर ही होंगे कहीं, नए चाहिए, तो नहीं है, बाज़ार से ले आओशराब तुम्हें पता है कहाँ रखी हैनिकाल लोमेरी सिगरेट नहीं मिल रही, सब हो गया तो, वहाँ से लिहाफ़ हटा बैठिए जनाब, चियर्स

उफ़्फ़ तुम और तुम्हारी बातें, ये लो सिगरेट, जलाओ और एक मेरे लिए भी

शुक्रिया जनाब, ये लीजिये और आख़िरी कश ना पीजिएगा, कहानियाँ और लिखूँगी पर आरज़ू इतनी की आख़िरी कश मैं ही लूँगी

इसमत तुम लिखती रहो हमेशा, अब से मैं पूरी कभी नहीं पियूँगा, जब भी पियूँगा, हर बार छोड़ दूँगाआख़िरी, एक कश तेरे लिए

~ Hakuna Matata…

 

पानी को आईना बना चाँद को रोटी समझ खा गया, शहर में जानवरों की तादाद देख शेर जंगल की ओर भागा गया…

पूरा जंगल उत्सुकता का मारा, आते ही लगा दी सवालों की झड़ी और मिनटों में लम्बी लाइन लग पड़ी…

पहला सवाल कुत्ते ने पूछा – शहर तो बड़ा साफ़ होगा?
~ जवाब मिला – साफ़ सिर्फ काले चश्में वाले लोग थे, बाकी तो नर्क रहे भोग थे…

दूसरा, लोमड़ी – सुना है वहां भी मेरे चर्चे हैं “लोमड़ी की सी चालाकी?
~ शेर हँसा – तुम से कहीं बढ़कर, तुम्हारी खाल से पता तो चलता है…

बिच्छू आया, डंक घुमाया, बैठा, आदमी काटता है क्या?
~ शेर – हाँ ऐसा इकलौता जानवर जो अपने ही जैसों को काटता है, और किसी को नहीं बांटता है, खाया जाये ना जाये,
सड़ा देगा मगर किसी और को नहीं देगा…

बिल्ली, मुझे शहर पसंद है, सुना है वहाँ बिल्ली को दूध आराम से मिलता है, ऐसा है?
~ शेर – बिल्ली को तो मिलता है, मगर सड़को पर आदमी के बच्चे सूखे पड़े रहते है, शायद बिल्लियों को ही मिलता है…

उड़ती उड़ती चिड़िया आयी और चिल्लाई, आदमी उड़ते हैं क्या?
~ मैं भी हैरान हूँ – सुना तो बहुत हैं – बहुत उड़ने लगा हैं पर निकल आये हैं…

हाथी आया – घुमा फिरा के सूंड को पूछा – ये शहर में हाथी के दांतो का क्या करते हैं?
~ शेर ने सुना था – जड़ दिया … भाई हाथी वहां खाने और दिखने के दांत अलग होते हैं, इसलिए तुम्हारे ले जाते हैं…

बारी आयी सांप की – ऐसे कौन सी चीज़ हैं जो शहर में आराम से मिल जाती हैं?
~ शेर पहले तो थोड़ा परेशान हुआ, सब कुछ तो हैं…हाँ शायद ज़हर…सब कहते हैं इसने-उसने ज़िन्दगी में ज़हर घोल रखा हैं…

बारी अब थी गिरगिट की, और उसे रंग बदलने से कहाँ फ़ुर्सत, रंग को किया उसने लाल और चिपकाया अपना सवाल…क्या आदमी रंग बदलता है?
~ सवाल तो अच्छा है; मगर बवाल वहाँ रंग बदलने का कम है, आपका रंग कितना गोरा या काला है ये बहुत बड़ा मसला है… गोरा होना जैसे लाजवाब है और ना होना कोई पाप…स्किन का वाइट कलर इम्पोर्टेन्ट फैक्टर है और ना होना डार्क चैप्टर…
जवाब तुम्हारे सवाल का…इतने वहाँ मौसम नहीं जितने आदमी के रंग हैं…चार पैसे में रंग बदल जाता हैं, कुछ हज़ार में बालों का कलर, लाखों में फ्यूचर का कलर ब्राइट होते देखा हैं…और इश्क़ ऐसी बला जिसमें सब टेक्नीकलर…

मोर क्वेश्चन प्लीज…मेरा मतलब मोर तुम्हारा सवाल?
मोर जी ने पंख फैलाये और याद आया सवाल तो घर ही भूल आये…पंख फैलाया तो सवाल याद आया…शेर जी, आदमी ख़ुशी में नाचता है या गम में…
~ जितना मुझे समझ आता है ख़ुशी में वो खुल के सामने नाचता है, और ऐसे नाच में सब शरीक होते हैं…गम एक ऐसी हलचल है जो उसे अंदर ही अंदर नचाती है…

अब आया भैंस का नंबर…
शेर जी ये बताओ – भैंस को वहाँ चारा बैठे बैठे मिलता हैं वहाँ तो जंगल हैं नहीं?
~ वहाँ भैंस और आदमी दोनों चारा खाते हैं पगली…कमी नहीं हैं…

भालू आया और वो भी शरमाया और पूछ ही बैठा, वहाँ भी लोग काले होते हैं?
~ इस बात पर शेर थोड़ा गंभीर हुआ और नम भी…एकदम संजीदा हो कर बोला बस यही तो बात हैं जिसकी वजह से मैं वहाँ टिक नहीं पाया, वहाँ खाने-पिने की कोई कमी थी, अपने आप चले आते थे मरने, लेकिन एक दिन मैंने सुना की वहाँ दिल भी काले होते हैं…
पहले तो मेरी समझ नहीं आया लेकिन जब तहकीकात की तो पता चला के जहाँ मैं छुपा था वो हस्पताल के पीछे की दिवार थी और मैं वहाँ छुपा हूँ ये बात किसी और को भी पता थी…वो रोज़ किसी को बहला-फुसला कर लता और वहाँ छोड़ जाता, मुझे लगा शिकार मैंने किया हैं, लेकिन जब पता चला तो मैं तिलमिला उठा और उसी को खा गया…उसका सीना खोला और क्या देखता हूँ…उसका दिल काला था…

यहाँ कोने में बैठा बन्दर कुछ बड़बड़ा रहा था और केला खा रहा था…शेर खुद ही उससे पूछ बैठा –
~ तुम तो उनके पूर्वज हो और तुम्हे तो वहाँ पूजा भी जाता हैं, तुम जंगल में क्या कर रहे हो?
बन्दर ने इत्मीनान से केला खाते खाते जवाब दिया…कुछ लोग हैं जो मुझे पूजते हैं लेकिन भगवान खुद को ही समझते हैं…

…और अब तो जानवरों की जैसे लाइन ही लग गयी…ये दो किलोमीटर लम्बी लाइन – जो-जो सवाल पूछ कर आते रहे, घर जाते खाने-पिने का इंतज़ाम कर लाइन में बेचने लगे…कुछ इस तरह चंद सवालों के जवाब क्या मिले जानवर भी ओपरट्यूनिटी का बिज़नेस करने लगे…और आदमी की तरह वो भी जेबें भरने लगे…

वहीँ कहीं अचानक एक गधे की नज़र पड़ी और वो भी लाइन में लग गया…तीन दिन बाद उसका जब नंबर आया तो शेर तो शेर सारी महफ़िल का सर चकराया…सवाल था ऐसे जैसे जैसे किसी ने पूछ लिया हो के आसमान में कितने तारे है…
सवाल था…
…”क्या शहर में गधे होते हैं?”…

~ इस पर शेर ने नाक से एक लम्बी सांस अंदर खींची और मुँह से गधे के कान में कुछ फुसफुसाया…और उसके बाद तो गधे की जैसे ख़ुशी का कोई ठिकाना ना रहा, वो नाचने लगा गाने लगा, अपनी धुन बजाने लगा, कहीं से भी आने लगा कहीं भी जाने लगा…

~~ सब परेशान की शेर ने उसके कान में क्या बोला की इसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नहीं…
~~ और थोड़ा शेर भी हैरान…आज आदमी की तरह जानवर भी परेशान लग रहे हैं…