~ इत्तफ़ाक़…

Coincidence

Picture Credit : Google Images

 

पड़ गया मेरे आराम में आज फिर खलल पड़ गयाफिर बैठे बैठे हुआ खड़ा आज फिर मन बदल गया,

चलने ही वाला था पर जैसे ही उठाया पहला कदमपिछले वाला अगले वाले से बेवजह ही लड़ गया

 

नीली पतलून, पिली क़मीज़ अंदर सफ़ेद बनियानजूता पहना भुला जुराब, साली किस्मत है ही ख़राब,

घुमा, मुड़ा और जैसे तैसे चल पड़ा देखा बटुआ पड़ाकिसका है ? मेरा तो हैं नहीं, बटुआ था तस्वीरों भरा

 

कल ली थी रेल की टिकट घूमने जाने को कहींजाने क्यों अब कहीं जाने का बिलकुल मन नहीं,

क्या करूँ, क्या नहीं, फाड़ा टिकट उतारी जैकेट,  उतारा जैसे ही जैकेट गिरा उसमें से एक पैकेट

 

पैकेट में थी नाटक की टिकट, नाटकइत्तफ़ाक़”, डिरेक्टर बेबाक़, ऐक्टर तपाक, क्रू फटफट फ़टाक,

ऑडीयन्स में भी जोश था, बस, दरबान ख़ामोश थापूछा तो बोला, बेटा था ना रहा, तस्वीरें थी अब वो भी नहीं

 

याद है ? बटुआ तस्वीरों से भरा, उठाया था, बताना भुल गयाउसकी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा, होश था अब जोश था,

बेटा, उसका लड़खडाता था, ठीक से चल ना पाता थाशौंक उसे सिर्फ़ तस्वीरों का था, “इत्तफ़ाक़ये तक़दीरों का था

Advertisements

~ हुजूम…

बेहोशी के आलम में आज सारी आवाम हैहुकूमत किसीकी भी हो, ये सत्ता की गुलाम है,

ये अंधी, ये बेहरी है, और हाल जो हो, जैसा होआना इसी पर इल्जाम है, हुजूम इसका नाम है

 

आलम ये है अब के अव्वल तो सब डिजिटल है, और बैठ बंद कमरों डीजीटाइज़ेशन भी कमाल का,

वो कमरे अफवाहों के मैन्युफैक्चरिंग प्लांट बने बैठे हैंअफवाहे बनायीं, उड़ाई और आखिर में ख़बरे बन आती हैं

 

मुद्दों से मुख्तलिफ है मगर हुजूम में अक्ल की कमी नहींहुजूम बेरोज़गार है, कहीं भूखा कहीं बेघर है ये हुजूम,

कहीं अनपढ़, सरकार का खरीदा कारीगर कहीं हुजूमइस कमअक्ल हुजूम को सरकारी कारें चलाती हैं

 

इसलिए शायद ये वो भीड़ है जो मौकापरस्त हैमारकाट, पथराव तो कभी बलात्कार में मस्त है

हुजूम का ना कोई वजूद है ना है इसका कोई जूनूनउसके नाम पर कुछ भी लूट लो, क्या कर लेगा कानून