~ आकाशवाणी…

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~ दिल्ली…

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Google Images “no copyright infringement is intended”

 
पुरानी दिल्ली की नयी सड़क,
शोख़ियाँ, अन्दाज़, ख़ूब तेरी तड़क भड़क,
दिल्ली पुरानी की नयी सड़क…
 
बल्लीमारा, फ़तहपुरी, क़ुचा-ए-नील,
लहंगें, ज़री, ज़रदोज़ी ये गाइड-कुंजियाँ,
नल्ली नहारी, पराँठे, कुलचे तेरे जामुन-ए-गुलाब,
गोल जलेबी सी तेरी गलियाँ लाजवाब…
 
ताँगे, रिक्शे, गाड़ियाँ, स्टेशन की भीड़,
कोठे, जिस्म, भूख और के लाचारी ग्राहक,
कभी आयें चखने मद-मय-हुस्न खाने,
बस क़ीमत चुकायें यहाँ रिश्ते नहीं निभाने…
 
चौक चाँदनी पाँचवाँ चाँद, बावली खारी,
क़िला-लाल, बाज़ार उर्दू, नीम-हकीम, और
गली क़ासिम जान, ग़ालिब की हवेली जहाँ,
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरिजा साथ रहते यहाँ…
 
पुरानी दिल्ली की नयी सड़क,
शोख़ियाँ, अन्दाज़, ख़ूब तेरी तड़क भड़क,
तू – दिल्ली पुरानी की नयी सड़क…
 

~ तुम ज़रा दर्द दो ना…

सोच बंद, शब्द फरार, कलम सुखी, पन्ने खाली फड़फड़ा रहें हैं,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

जिस्म ढीला, आँखें नम, ज़बान पे ताला, हर काम मैंने टाला,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

होश हो के भी नहीं, ढूँढने लगता हूँ जो गुमा ही नहीं,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

बत्तियाँ सारी गुल, उजाले से कोफ़्त अँधेरे से प्यार,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

शोर चुभता, ख़ामोशी खलती, वो आज बात नहीं जो कल थी,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

भूख नदारद, प्यास भी रूठी, झूठ लगे सच्चा, सच्ची बातें झूठी,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

इतना सा अफसाना है,

सच कहता हूँ सच के सिवा कुछ नहीं,

दर्द जब तक निगाह में नहीं होता,

लिखना चाहूँ लिखा नहीं जाता,

अब और गिड़गिड़ा भी नहीं पा रहा हूँ,

बिन रेत घंस रहा बिन पानी डूब रहाँ हूँ,

बचा लो, निकालो भँवर से,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

रख के काग़ज़ पे क़लम, इस उम्मीद से हूँ,

अभी उठेगा एक दर्द और सब मीठा हो जाएगा,

सोच, शब्द, क़लम, पन्ने, खिल उठेंगें,

और एक क़िस्सा नज़र होगा,

आज़मा के देख लो,

कितना हंसी वो मंज़र होगा…

जैसे…कुछ ऐसा सा…

ये सर्दियों की सुनहरी धुप और तुम्हारी गर्मियाँ,

ख़ूबियाँ तेरी हज़ार, अनगिनत मेरी कमियाँ…

~ December-Twenty-Five…

~ December-Twenty-Five…

He swayed left from right and jumped up and down,

He had a mask put on and wore a colourful gown,

He made everyone laugh; it would be always a piece of fun,

He was a short height miniature smaller then than a gun,

He acted like a fool as he had to make his living,

He kept all his pain and smiles, he was always giving,

Sometimes on a horse or on a sleigh he would stand,

Sit he would sit, laugh he would laugh, he followed all the commands,

He was almost fifty two and his birthday was on twenty-fifth-december,

And he had his pretty corner to cry as no one cared to remember,

He was born on a Monday and the day was christmas,

Well, he was a loner all his life and never made no fuss,

His mother left him when he was born, new and alive at Six-Forty Five,

The circus opens in the morning at ten, someone just screamed where the hell is Uncle Ben,

Its morning, the time is six-forty-five; alone in his tent he breathed his final sigh,

And, the banner outside his tent just read; welcome its December-twenty-five…

~ साये…

 

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साये ये रात के साये,

कहाँ ले आए हमें ये रात के साये,

घनेरे कलेरे डरे डरे से ये घबराये,

ओड़ चादर फटी ये ठुकराये,

ये साये रात के

 

बिना बात कभी पीछे पड़े,

धुआँ उड़ाते, चेहरा छुपाते, लड़खड़ाते,

गिरते गिरते से, सम्भलते से, डगमगाते,

दूर से झाँकते, क़रीब आ सो जाते,

हाय ये राते के साये

 

एक सच को छिपाए हुए,

बिन बुलाये ये आये हुए,

एक मरियल लकीर से, फ़क़ीर से,

भूख से लिपटे, कालिख से चिपटे,

ये काले काले साये

 

आमने, सामने, घूमते गोल गोल,

कभी बैठे, कभी खड़े, मुँह खोल,

जैसे अभी ये जाएँगें निगल,

वो पहली किरण, इनका आख़िरी शंड़,

और रह जाती ना जाने वाली, काली रात

 

हाय, ये काली के रात के साये

~ सहेली…

~ सहेली

~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~

मोहे इश्क़ हुआ ज़रा धीरे से,

धीरे धीरे से तेरे वीरे से,

इक काम करा दे मेरा,

ले चल कल उसे तू मेले में,

मिलवा दे मुझे तू अकेले में,

तू है ना मेरी पक्की वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

मेरा दिल अब ना मेरे क़ाबू में,

नैन मेरे, रस्ते पे अड़े,

थक गयी अब मैं खड़े खड़े,

इक बार मुझे मिलवा दे ना,

नाल उसदे मुझे बिठा दे ना,

ओ मेरी पक्की वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

मैं रात से बुझी बुझी सी हूँ,

ना भूख मुझे ना प्यास लगे,

कभी दिल अटके कभी साँस रुके,

अंकल को ससुर बनवा दे ना,

मम्मी को सास बनवा दे ना,

ओ तू मेरी पक्की वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

मैं बावरी हो के नचड़ा

मैं हुँड नहीयो है बचना,

जग झूठा लगे वो सच-ना,

तेरा वीरे विच दिखे मुझे सजना,

मैं बस उस वास्ते है सजना,

हायों मेरी पक्की वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

तू मेरी पक्की वाली सहेली है,

बचपन से साथ तू खेली है,

मेरी डोली घर बुलवा दे ना,

अपड़े वीरे से अन्ख लड़वा दे,

अपने घर मेरा घर वसावा दे,

ओ मेरी सच्ची वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

~ घुसपैठिया…

~ घुसपैठिया…

मेरे दिल को वो अपना है घर कर बैठा,
सामान मेरा सब इधर उधर कर बैठा,
ना चाबी लगायी ना तोड़ा उसने ताला ,
ना जाने कैसे है वो बसर कर बैठा…
घुसपैठिया…

ना उठाया मुझे ना मुझको जगाया मुझे,
ना चीख़ा पुकारा, ना आवाज़ लगायी,
ना जाने कैसे तय वो ये सफ़र कर बैठा,
वो रुख़ कैसे अपना इधर कर बैठा है…
घुसपैठिया…

मेरे तकिए पे वो अपना सर कर बैठा,
अलमारी में मेरी अपनी बुशर्रत टाँग के,
पतलून को मेरे कुर्ते की नज़र कर बैठा,
कैसे वो इस घर को अपना घर कर बैठा…
घुसपैठिया…

मेरे पसीने को अपना इत्र बनाके, उसको लगाके,
वो ख़ुशबू को मेरी है अपनी ईत्र कर बैठा है,
बरामदे में मेरे उसने अपनी चारपायी बिछायी,
मेरी रातों की नींद में अपनी वो सहर कर बैठा…
घुसपैठिया…

मेरी माँ को वो अम्मी है कह कर बुलाता,
मेरे डैडी को अपना फ़ॉदर कर बैठा है,
ख़ुद मेरी जान मुझको जानेजिगर कर बैठा,
मेरी कश्ती में तैर वो सारा सफ़र कर बैठा…
घुसपैठिया…

वो बारिश में अपनी मुझे तर-बतर कर बैठा,
वो आलू और मुझको है मटर कर बैठा ,
मैं बिखरी हुई थी वो मुझको बाहों में लेके,
गुम थी कहीं मैं, मुझको वो ताज़ा ख़बर कर बैठा…
घुसपैठिया…

~ जिस्म-फरोशी…

 

दुश्मनों को भी दोस्त बना देती है,

राजनीती है ये कुछ भी करा देती है,

भाई को भाई से दरकार नहीं होती,

ये आम आदमी की सरकार नहीं होती

 

यहाँ गरीब ही आना, गरीब रहना पड़ता है,

बदनसीबों का बन के नसीब रहना पड़ता है,

और जिन के भरोसें इनकी गाडी चलती है,

छुपछुप के उनके करीब रहना पड़ता है

 

नयेनवेलों को परवाज़ की हिदायत नहीं होती,

आचरण में दाग ना हो तो कोई इनायत नहीं होती,

पर्दा है, परहेज़ है, सफ़ेद कुर्ता शराफत का दस्तावेज़ है,

काले को सफ़ेद बनाती है, राजनीती सब को कहाँ आती है

 

खाने के खिलाने के पुख्ता इंतज़ामात होते है,

शराफत सड़क पर नंगी सोती रौनक महलों में होती है,

यहाँ ना भाई भाई का हुआ बाप को बेटे से खतरा होता है,

राजनीती जिस्मफरोशी है कोई किसी के साथ भी सोता है

~ शमशान…

 

मेरे घर के रास्ते में शमशान है, 

बेदर्द रोज़ लेता किसी की जान है,

आदमी को मिट्टी में मिला देता है,

सबको उनकी औक़ात दिखा देता है…

 

कभी भीड़ तमाम कभी दो चार आदमी,

बता देता है किसकी कितनी जान-पहचान है,

लौट जाते हैं फिर किसी रोज़ लौट आने को,

भूलना ही पड़ता है सच साँस चलाने को…

 

लटका चेहरा, दर्द गहरा, वक़्त ठहरा सा,

दो चार दिन, कुछ और ग़म, हर कोहरा छट जाता है,

आज किसी अपने को, कल किसी के अपने को,

छोड़ना वहाँ आता है, फिर काम में लग जाता है…

 

शमशान की इस बात पर मगर हँसी आती है,

उसके ठीक सामने एक हस्पताल भी हैं,

वहाँ से जान आती है यहाँ से चली जाती है,

ज़माने भर की फ़िक्र, बीच का का सफ़र, गोल सिफ़र…

 

शमशान के बग़ल में मुर्दाघर भी हैं,

दोनों की आपस में अच्छी बनती हैं,

जो एक में जलती है दूसरे में दफ़नायी जाती है,

राख मिट्टी की फिर मिट्टी में मिलायी जाती है…

 

हस्पताल और दोनों के बीच मैं एक सड़क है,

और एक चाय की दुकान, एक स्कूल, एक मयखाना हैं,

तीनों में एक चीज़ बड़ी अच्छी हैं,

देख लगता हैं वहाँ, दुनियाँ में सिर्फ़ ये तीनों सच्ची हैं…

 

सड़क के दूसरी ओर, इबादत और पूजा घर हैं,

आदमी अन्दर कुछ और बाहर कुछ और होता है,

लूटता है किसी को तो कभी खुद लूट जाता है,

फिर सड़क के उस पार जा चैन की साँस सोता है…

 

~ मरकज़-ए-जाँ…

 

किताबें चारों ओर और बीच में हूँ मैं,

जैसे लहलहाते खेतों में इकलौता पेड़,

जैसे तैरती पतंग तारों के बीचों बीच,

गोल सब, किस तारें से हूँ दूर किसके करीब,

दुनियाँ अजीबो-गरीब और बीच में हूँ मैं…

 

हर पन्ना फड़फड़ा रहा बहती हवा के साथ

मैं किताबों से और किताबें मुझसे करती बात,

हर हर्फ़ उछल उछल बना रहा अपनी ही तान,

कभी किस्सा कभी कहानी सुनते मेरे कान, 

कितने सारे हिस्से मेरे और बीच में हूँ मैं…

 

इधर उधर सीधे खड़े कुछ लेटे, भरे हुए पेन,

कुछ सच्ची कहानियाँ, बाकी कुछ तो हैं वहम,

कुछ आप बीती हैं कुछ जैसे सुनी सुनायीं हैं,

कुछ किताबें पड़ ली हैं कुछ यूँ ही सजायी हैं,

बनावट की सजावट और बीच में हूँ मैं…

 

कुछ किस्से कहानियाँ लिखनी बाक़ी हैं अभी,

दर्द और अभी झेलने होंगे कह पाएंगे तभी,

कुछ टूटे कुछ बिखरे अल्फ़ाज़ समेटने भी हैं, 

कुछ बातें किस्से-कहानी की माला में पिरोनी हैं,

वो एक आखिरी क़िस्सा जिसके बीच में हूँ मैं…