~ पैदल ही…

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~ उन दिनों…

उन दिनों मैं तेरा नमाज़ी था,

जब ख़ुदा भी मेरा सवाली था…

मैं दुआ के सिवाय क्या देता,

दिल भी दुनिया के जैसा खाली था…

दी दुआ बद्दुआ के बदले में,

इश्क़ अपना अजब मिसाली था…

वस्ल की मौज भी फरेबी थी,

हिज्र का दर्द भी ख़याली था…

कर गया बे-लिबास रूह मेरी,

जिस्म का पर्दा ही वो जाली था…

~ खरोश…

~ खरोश…

मेरी खाब में ही रूह काँप जाती है,

हैरां हूँ कि तुम्हें नींद खूब आती है…

लापरवाहियों से भी चराग बुझते हैं

दीये सिर्फ आँधियाँ नहीं बुझाती हैं…

हूँ शर्मसार मैं ख़ामोश हकमरानों से,

साहेबान को तो शर्म भी न आती है…

हल्का शोर ज़ोरों का डरा देता है हमको,

आपको चीख चिल्लाहट क्या डराती है…

ये मेरे शहर का एक आम वाक्या है,

तुम्हें ये लगा मेरी खरोश ज़ाती है…

~ माला आराम की…

~ माला आराम की

राधा को हो जैसे श्याम ना मिला,

हमको भी काम का कोई काम ना मिला

यहाँ वहाँ मटकियाँ उठाते रहे,

डिंगें हाँकते हम बड़बड़ाते रहे

बस इसी आस में सुबह उठ जाते,

कोई हमें प्यार से आवाज़ लगा दे

दिन भर की फिर अफ़रातफ़री,

जैसे बिना बारिश की छतरी

शिल्पा की मम्मी सलमा की अम्मी,

किसी काम में ना रखना कोई कमी

रात नुक्कड़ पे हो जाना खड़ा,

प्यार दूर, कोई हमसे वजह होक ना लड़ा

क्यूँ करना चमचागिरी सोच नौकरी नहीं की,

आलस की डिग्री और चोटी की फुक्रागिरी

ख़ुद को शहंशाह से कभी कम नहीं आँका,

ख़ुशनसीबी ने कभी हमारी ओर नहीं झाँका

कोई पागल कोई दीवाना कह बुलाने लगा,

कभी कभी तो आयिना भी हमें समझाने लगा

जैसे राधा ने माला जपी श्याम की,

वैसे हमने भी माला जपी आराम की

~ और मैं था दोपहर में…

सारा शहर इश्क़ में था, और मैं शहर में,

रात आखिरी पहर में,

और मैं था दोपहर में

 

चारों ओर फैली थी ख़ामोशी, और मैं ख़बर में,

धूप थी, लू चल रही थी,

और मैं था दोपहर में

 

जमघट में हर कोई तत्पर था, और मैं यमुना तट पर था,

दिन जाने को था शाम आने को थी,

और मैं था दोपहर में

 

कश्तियाँ किनारे पर खड़ी थी, और मैं था लहरों में,

किरणें तैर रही थी पानी में,

और मैं था दोपहर में

 

दुकानें बड़ रही थी, और मैं घाटे में,

मुनाफ़ा था सफ़र में,

और मैं था दोपहर में

 

रात दूध जलेबी सी थी, और मैं खट्टे में,

अँधेरा था शजर पे,

और मैं था दोपहर में

 

अँधेरा दिन निगलता रहा, और मैं पिघलता,

ख़्वाहिशें थी बिस्तर पे,

और मैं था दोपहर में