~ जानदार दारूवाला 2019…

एक बार फिर नए साल की भविष्यवाणी ले कर हाज़िर, गाय का रखवाला, आपका अपना जानदार दारूवाला…

पिछले साल की तरह ही 2 जीरो (नहीं ज़ीरो की रेटिंग नहीं) एक आठ, मेरा मतलब दो-हज़ार अठारह का उन्नीस होगा, सिर्फ़ एक अंक ही बदलेगा बाक़ी के हालात रहेंगे ज्यों-के-त्यों, खुलेंगे शायद कुछ और #metoo मोमेंट्स, उनके जो नहीं समझे थे NO मतलब NO, ज्यादा कुछ नहीं सिर्फ न्यूज़ चैनल की #TRP  बड़ेगी, क्वालिटी गिरेगी…

विराट, रनवीर, सोनम और तो और सुहेल सेठ हिच हो गए, सलमान उर्फ़ भाई उर्फ़ बिग बॉस अभी भी ख़ुशहाल हैं, गंगा का फ़ण्ड क्लीन, स्टैचू मेड विद सपोर्ट ओफ़ चीन, तेल-सिलेंडर का भाव जाते जाते गिर गया, कुछ राज्यों में कमल मुरझाया और हाथ खिल गया…

…कमर्शल ब्रेक… (तेल बचाये इलेक्ट्रिक कार चलायें, बदबू आये तो एलोन मस्क लगाये)…(Netflix एंड Chill, नहीं समझे तो वॉच प्राइम इट्स नो क्राइम)…

याद रखें इस साल चुनाव हैं, अपना वोट प्रतयाक्षी को ही दें, पार्टी से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा, कोई तोप तो कोई जहाज़ खाती है, हाथी, साइकिल, हल, सब आइटम हैं, सिर्फ आम आदमी की जेब पर झाड़ू चलाती हैं…

इस साल भी दिवाली के पटाखे बचाए जाएँगे और शादियों में जलायें जायेंगे, साल के अन्त में कुछ और नोट बन्द हो सकते हैं (हो सकता है ना भी हों) जिन्हें कहते थे पप्पू वो अक़्लमंद हो भी सकते हैं (हो सकता है ना भी हों), प्रदूषण, माल्या, मोदी किसी का कुछ भी नहीं बिगड़ेगा, शायद आदमी धर्म से ऊपर उठेगा और गाय नहीं तो देश हित में peacock के नाम पर लड़ेगा…

ये नारा अमर होगा “मंदिर वहीं बनाऊँगा मैं”…या सरकार बदली तो देश में ही घूमूँगा “विदेश नहीं जाऊँगा मैं”…

संभावना है शहरों, गाँव, क़स्बों के नाम बदले जाएँगे और जनता पर लगेंगी नयी पाबंदियाँ, हालात में नहीं होगा रत्ती भर भी बदलाव, लगाते हो तो लगी शर्त, सलाह मानो तो मत लगाओ, धंदा अगर मंदा हैं तो कोई नया व्यापर जैसे आलू की फ़ैक्ट्री या पकौड़ों की दुकान लगाओं…

वेल इन टाइम वैलेंटायन की तैयारी कर लें, बजट का भी सेम टाइम है, गर्ल्फ़्रेंड से उम्मीद रखें, सरकार आपकी उम्मीदों पर फिर शू-शू करेगी, और एक महीने बाद जिनका इंकरेमेंट है उनकी मेहनत उन पर थू-थू करेगी, करेंगें देश के चोर फिर से चोरी और सीनाज़ोरी, आप सामान्य नागरिक है तो पुलिस देखते ही बिन ग़लती आप करंगे सौरी…

क्रिकेट होगा नया सेक्रड गेम, क्यूँ ना हो, चाय वाला पुराना हो गया, क्रिकेट कप्तान एक पाकसाफ़ प्रधानमंत्री या बंगला चुनाव जीत सकता है, अर्रे मुझसे पूछो तो मैं तो धोनी के हाथ पूरा मिर्ज़ापुर कर दूँ, या कोहली की सी अकड़ से हालात सुधार का आग़ाज़ करूँ, और नोटा से ना हारूँ, इस साल फिर जीते जी ख़ुद का ना मारूँ…

नए साल का पहला जाम, दिल्ली में राजीव चौक और हरियाणा में गुड़गाँव (गुरुग्राम को मेरा प्रणाम) के नाम…

जय हो !! ग से गाय, ग से गंगा गए साल का आख़िरी और नए साल का पहले पंगा…  

…ये सत्य को एक व्यंग्य के रूप में पेश करने की कोशिश है, ये काल्पनिक सीमाओं से बाध्य भी नहीं, अगर आप नाम, जगह, इत्यादि किसी से भी ये अंदाज़ा लगा सकते हैं की वो किस व्यक्ति विशेष को लेकर कही गयीं है तो अपने लिए एक ज़ोरदार ताली बजाएं और अपनी अगली पार्टी में मुझे भी बुलायें…

~ शमशान…

 

मेरे घर के रास्ते में शमशान है, 

बेदर्द रोज़ लेता किसी की जान है,

आदमी को मिट्टी में मिला देता है,

सबको उनकी औक़ात दिखा देता है…

 

कभी भीड़ तमाम कभी दो चार आदमी,

बता देता है किसकी कितनी जान-पहचान है,

लौट जाते हैं फिर किसी रोज़ लौट आने को,

भूलना ही पड़ता है सच साँस चलाने को…

 

लटका चेहरा, दर्द गहरा, वक़्त ठहरा सा,

दो चार दिन, कुछ और ग़म, हर कोहरा छट जाता है,

आज किसी अपने को, कल किसी के अपने को,

छोड़ना वहाँ आता है, फिर काम में लग जाता है…

 

शमशान की इस बात पर मगर हँसी आती है,

उसके ठीक सामने एक हस्पताल भी हैं,

वहाँ से जान आती है यहाँ से चली जाती है,

ज़माने भर की फ़िक्र, बीच का का सफ़र, गोल सिफ़र…

 

शमशान के बग़ल में मुर्दाघर भी हैं,

दोनों की आपस में अच्छी बनती हैं,

जो एक में जलती है दूसरे में दफ़नायी जाती है,

राख मिट्टी की फिर मिट्टी में मिलायी जाती है…

 

हस्पताल और दोनों के बीच मैं एक सड़क है,

और एक चाय की दुकान, एक स्कूल, एक मयखाना हैं,

तीनों में एक चीज़ बड़ी अच्छी हैं,

देख लगता हैं वहाँ, दुनियाँ में सिर्फ़ ये तीनों सच्ची हैं…

 

सड़क के दूसरी ओर, इबादत और पूजा घर हैं,

आदमी अन्दर कुछ और बाहर कुछ और होता है,

लूटता है किसी को तो कभी खुद लूट जाता है,

फिर सड़क के उस पार जा चैन की साँस सोता है…

 

~ बूढ़ा…

 

बूढ़ा जो देखन मैं चला, बूढ़ा ना मिल्या कोय,

फिर जो देखी अपनी लाठड़ी, रे मुझसे बूढ़ा ना कोय,

इब के, उठायी अपनी लाठड़ी, मैं चल पड़ो

 

बूढ़ा जो देखन मैं चला, बूढ़ा ना मिल्या कोई,

दो क़दम भी ना चला गयो, रे मुझसे बूढ़ा ना कोई,

लाठड़ी ने किया किनारे, मैं बैठ गयो,

इब के, मँगायी पहियों वाली कुर्सी, मैं रिडक पड़ो

 

बूढ़ा जो देखन मैं चला, बूढ़ा ना मिल्या कोई,

रे पहियों मुझसे ना हिलो, रे मुझसे बूढ़ा ना कोई,

चकराया, सब छोड़ के इब मैं चिल्लाया,

इब के, चारपायी ने मँगवाया, मैं लेट गया

 

चारों बेटन नू किया जमा, लेटे लेटे आँखंन ने मूँद लिया,

ना हाथा मैं ना टांगा में मेरे जान, रे ठीक ठाक सै माहरे कान,

यो ना कहना था, यो कह दिया, बुड़े कानन ने यो सुन लियो,

बूढ़े तू मरता काहे नी, तू मरे ज़मीना बाँटेंगे

 

इब के, चारों लौंडन नू किया जमा, गिरते पड़ते मैं खड़ा हुआ

रे सालों तुमको बड़ा किया, अपने पैरन पे खड़ा किया,

इब बूढ़ा हूँ तो के हुआ, समसान ते लेके जाओं इब,

इस बूढ़े ने तुम जलाओ इब

फिर बैठ ज़मीना लेना बाँट, और मेरी राख ने लेना चाट

~ शायद, यक़ीनन…

 

एक ज़मीन का टुकड़ा कुछ उखड़ा, था, शायद

दो गज़ लम्बाई, दो हाथ भर चौड़ाई, यक़ीनन

 

बदमस्त हो वहां ज़िन्दगी सो रही थी, शायद

मौत चेहरों पे सिरहाने उसके रो रही थी, यक़ीनन

 

दूर से लगा, कुछ ऐसा वो मंज़र था, शायद

मिटटी में जा मिला मिटटी से वो बना था, यक़ीनन

 

भीड़ थी और कुछ चेहरों पे गीली लकीर थी, शायद,

बाकी रौनक आजा रही, रस्म निभा रही थी, यक़ीनन   

 

ताबूत में अब बस होने को वो बंद था, शायद

आज़ाद छंद था अब वो आज़ाद छंद था, यक़ीनन

~ कालविस्र्द्ध…

 

एक हुजूम का हिस्सा है; आदमी नहीं जैसे कोई किस्सा हैं

टेबल का टुटा पैर या कुर्सी की टूटी हुई बाँह,

अखबार का अनपड़ा इश्तहार या जगह भरती खबर बेकार,

घड़ी की सबसे लम्बी सुई या पुरानी रजाई की रुई जैसे,

टूटे मुँह वाले चाय का गिलास या बीते फैशन का लिबास,

खुद से भी कितना दूर है, ना जाने किसके पास हैं… 

 

भरी कॉपी है कोई या किताब के आखिरी पन्ने में रखा बुकमार्क,

सर्दियों में फ्रिज में बेकार जमी बर्फ या बड़े चेक वाला स्कार्फ़,

पुराने पर्स में रखा फटा हुआ नोट या पुरानी चोट का निशान,

ज़मीन जिसकी सारी बिक गयी खोखली ज़मींदारी की शान,

सोलह अगस्त की जैसे पतंग, सोच सोच कर हूँ मैं दंग

 

मोटी निब का पेन जैसा कोई या खाली लाल रिफिल सा है,

वो चश्मा है गोल सा जिसकी उम्र आँखों से भी हो बड़ी,

तीन पहिये वाली साईकिल जैसे बच्चे से छोटी हो, कोने में पड़ी,

बची हुई उन का ज़रा सा गोला कोई और कोई बड़ा ही भोला यहाँ,

बेज़ार कहो, बेकार कहो, उसे अपनी ही हालत का शिकार कहो

 

दादी की सफ़ेद चीनी वाली कटोरी कोई, कोई बिना धार की छुरी,

साठ मिनट की ऑडियो कैसेट कोई और कोई टेप रिकॉर्डर सा है,

बिन पानी के सूखा नल सा तो कोई भुलाबिसरा कल सा है,

ब्लैक एंड वाइट कैमरा कोई और कोई धूल चढ़ी तस्वीर,

वक़्त का चक्र पीस देता हर सब्र

सब हुजूम का हिस्से है; जो गयी बीत उस ज़रूरत के किस्से हैं

~ गोश्त की दुकान…

साहब, छोटा मुँह और बड़ी बात…

दो पैर, दो हाथ…छरहरा बदन, तीखे नयन…बिगड़े हालात…खिलता चमन…उजाड़ोगे?

गोश्त नया है आया…एकदम गर्म…हज़ार मील का सफर है किया तय…

दो दिन, दो रात लगी यहाँ तक लाने में..सोलह की है…खाली पेट …भरोगे?

बोटी बोटी रसदार है…आप हाँ करते हो नहीं तो मेरे पास दूसरा खरीददार हैं…

साहब, आप तो खिलाड़ी है…वो पहली बार बाजार में आयी है…हम दोनों की ये पहली कमाई है…

और हाँ, अगर हाथ न आये तो प्यार से समझाना…मरोड़ियेगा मत…मरोड़ना पड़े तो तोड़िएगा मत…

थोड़ी ख़ुद पीजिएगा…और बहला फुसला के गर्दन से पकड़ लेना…अकड़ने लगे, तो बाहों में जकड़ लेना…

चीख़ना चिल्लाना बहुत होगा, दिल मज़बूत रखना…तड़पनतो होगी…मुँह अच्छे से ढकना…

ज़रूरी बात, दाम में कोई कमी ना होगी…सस्ता चाहिए तो बाड़े में और बहुत हैं जंजाल…चुन लीजिए हमारी दुकान में एक से बड़कर एक हैं ज़िंदा कंकाल…