~ थैंक-यू …

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~ दिलचस्पियाँ…

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मेरी तुम में तुम्हारी मुझ में, ये दिलचस्पियाँ,
ना कम ना ज्यादा ना आधी ना अधूरी,
सारी की सारी, मेरी तुम्हारी, पूरी की पूरी,
ये हमारी…दिलचस्पियाँ…

ना ढूंढे जगह ये ना कोई वजह ये,
ना आने ना जाने का रस्ता तलाशें,
इक दूसरे की क़ैद में होने की,
ये खोने की…दिलचस्पियाँ…

ये चाय में डूबे बिस्कुट के जैसी,
बचपने की वो “तेरी ऐसी की तैसी”
लड़-भीड़, पिट-पीटा फिर गले से लगा,
ये अल्हड़ कहानियाँ…दिलचस्पियाँ…

ये बेकार तो वहम सी, चिपकी हुई,
तलुए जलाती ये चाय गर्म सी, जलाती हुई,
दिलों का धड़कना इक नज़र को तड़पना,
ये आग सुलगती…दिलचस्पियाँ…

ये बस ज़िद है और ज़िद पे ही है अड़ी,
रूठ कोठे से झांकती कभी दरवाज़े पे खड़ी,
ये पतंगों का हुजूम, मेरी तुझ से जा लड़ी,
ये हमारा जूनून…तेरी मेरी दिलचस्पियाँ…

~ Ecliptic…

~ Ecliptic…

 

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Let’s meet in Autumn,

When the leaves are leaving home…

Or let’s meet soon after that;

When the trees are naked…

Or may be a further after;

When they play a snowman wearing a white blanket…

Or how about one more step ahead;

When they are covered with glittery green colours…

 

But why do we need a season?

 

let’s just meet without any reason…

Let’s follow the ecliptic path;

perfectly like Sun follows Earths spark…

You and me, we should just meet,

to create memories in every season, let that be the reason…

Let’s live moments and memories;

and create a lore, let’s just meet more, more and more…

~ Crescent…

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And they started to walk together…

they walked in a straight line which had highs and lows,

as if the road was trying to match their heartbeat,

an up and a down, an up and a down…

 

In between they held their hands,

the cold breeze numbed his hands,

almost frozen and they needed to be warmed,

brush of their palms was just enough to give him a slight current,

and their hearts spoke to each other, enhancing the  warmth…

 

The sun wasn’t that bright,

but this pancake layer of moon was visible,

the shape wasn’t perfect round,

as if…

they both had taken a bite and made it a waxing crescent.

White pancake perfectly placed on this big blue plate,

it was their first day-moon moment together…

~ आयिना…

~ आयिना...

ये काग़ज़ पलट के तुम क्या देखते हो,

जला देखते हो या कुछ बचा देखते हो...


तुम्हारी वो आदत अब भी बदली नहीं है,

ख़ुद को तुम वैसा दूजे को बदला देखते हो...


तुम्हें याद है बचपन में तुम थे एक सीधी लकीर,

फ़र्क़ इतना कि अब तुम सबको टेड़ा देखते हो...


ये बात बात पर तुम्हारा भोंहें चड़ाना,

तुम ख़ुद को आसमान हमें ज़र्रा देखते हो...


देखा है तुमको कोड़ियों को घूर कर ताकते,

क्यों तुम ख़ुद को सोने चाँदी से जड़ा देखते हो...


तुम्हें ना बारिश से लेना ना पतझड़ को देना,

तुम हमें सूखा पीला, ख़ुद को हरा-भरा देखते हो...


हम भरी महफ़िल में सिर्फ़ तुम्हें देखते हैं,

और तुम हमें देख बस यहाँ वहाँ देखते हो...

Image credits- Vitaliy Deynega

ये दुनियाँ है जाला और हम सब हैं मकड़ी,

है मुहब्बत आज़ादी तो ख़ुद क्यूँ जकड़ा देखते हो...


तुम थिरकती रेलगाड़ी हमें समझो पटरी,

क्यूँ हमारे वजूद को तुम ख़तरा देखते हो...


जो ज़िंदगी कहानी हम तुम उसके किरदार,

एक क़िस्सा मेरा एक तेरा, तुम सिर्फ़ पड़दा देखते हो...


कुछ तुमने बनाया कुछ हमने पिरोया,

तुम अपना बनाया हमारा उजड़ा देखते हो...


अब इसके भी आगे, और कुछ क्या कहूँ मैं,

सच कहना, क्या कभी तुम आयिना देखते हो...



Photo Credits :-

‘Love,’ by Ukrainian sculptor Alexander Milov

Image credits: Vitaliy Deynega

~ ऐब…

~ ऐब…

चलो आपबीती सुनाता हूँ तुम्हारा दिल बहलाता हूँ,
ऐसे वैसे जला हूँ मैं तो थोड़ा तुम्हें भी जलाता हूँ…

मेरे सपनों में रोज़ाना एक कली खिला है करती,
तुम ज़रा मुस्कुराओ तो मैं इक गुलाब खिलाता हूँ…

निकल जाना तो है आसान मैं थोड़ा और उलझाता हूँ,
तुम ठुकराओ चलो मुझको तुम्हें मैं फिर मुँह लगाता हूँ…

तुम्हारे बालों का ये गुच्छा तुम्हारे गालों की लाली,
कभी बालों को सहलाऊँ कभी गालों से गाल लगाता हूँ…

तुम कंधे पे रखना सिर मैं सिर से सिर मिलाता हूँ,
जो लगे जहान है सुना-सुना रुको मैं कुछ गुनगुनाता हूँ…
“के तू किसी रेल सी गुज़रती है…”

और उसपर…
आधी रात हो झमाझम बरसात हो पानी पानी चारों ओर,
तुम हिलना मत तुम्हें बाहों में ले के मैं तुम्हारे संग नहाता हूँ…

मुझे तुम याद रखना बस जैसे भी तुम्हें मैं याद आता हूँ,
शराफ़त छोड़ दो अब तुम मैं तुम्हारा ऐब बन जाता हूँ…

~ तबरेज़…

 

नज़र हम रख लेते है, नज़रिया तुम रख लो,
हमें बस बूँद से मतलब, ये दरिया तुम रख लो,
जो दरिया भी लगे थोड़ा, सारा जहाँ तुम्हारा…

हमें दिल का कोई कोना किनारा बहुत है,
वहाँ चुप चाप, ख़ामोशी से रह लूंगा,
तुम रख लेना ख़ुशी, मैं ग़म रखूँगा, किसी से कुछ ना कहूँगा…

अभी बह रहा हूँ, मुझे चुप-चाप बहने दो,
उतरना मत, रात भर, पहन कर सोया तुम्हें,
खिसको ज़रा मेरी ओर, सर्दी सी है, ज़रा आग जला दो…

और हाँ, एक उम्मीद है, अगर कर सको जो तुम पूरी,
अपना वादा निभाना…वो वादा याद हैं ना,
हमेशा प्यार करने का, तुम्हारा मुझसे ही…

जो नहीं मुमकिन, तो मुश्किल आसान कर देता हूँ,
मिटा कर मिट्टी में भर दो, तुम ज़िंदा रहो मैं मरूँगा,
फिर, दफ़ना या जला देना, लगे तुम्हें जो भी सही…

हाथ में आ जाऊँगा, हथेली में समा जाऊँगा,
बहा देना, मिटा देना, भूलना मत, मैं चैन से सो ना पाऊँगा,
ज़रा आओ क़रीब, पास खिसको , सवाल रहने दो…

समाँ जाओ, ना मैं रहूँ ना तुम रहो,
छुपा लो मुझ को ख़ुद में, फिर हम-तुम बहें,
देखो, सवाल बिखेरे पड़े हैं यहाँ वहाँ,
तुम्हारे बालों की तरह, हर जगह…

~ एक कश तेरे लिए…

हेलो इसमत, मंतो

तुम्हारी आख़िरी कहानी पड़ी, क्याक्या लिखती रहती हो, इस बार अगर कोई भी शोर हुआ, मैं नहीं आने वाला तुम्हारे साथ, लाहोर

अच्छा, पहली बात वो आख़िरी कहानी नहीं है, मन किया तो और लिखूँगी, और दूसरी, ठीक है मत आना, मैं भी देखती हूँ कैसे रह लेते हो

अच्छा, कहाँ हो अभी

अभी, चारपाई पे, उलटी लेट कर, कहानी को सीधा कर रही हूँ, कुछ ज़्यादा ही टेडी हैं, इससे अच्छा तो खीर बना लेती, तुम पहले कहते तो तुम्हें भी बुला लेती, मिल के दोनो कहानी और खीर दोनो सीधी कर लेते

उफ़्फ़, बातों में तुमसे कोई नहीं जीत सकता, मेरे सिवाआ रहा हूँ, इस गरम हवा में ठंडी खीर खाएँगे और कहानी का उल्लू सीधा कर लेंगे

(ठकठक करते ही दरवाज़ा चर्र कर के खुला, और मुँह से निकला)

दरवाज़ा लगवाया ही क्यूँ है जब बंद करना ही नहीं होता

लगवाया था, की कोई आए तो अंदर से बंद कर लूँगी और आया भी कौन, मंतोतुम्हारे ही नाम पर कहावत बनी है, बिन बुलाए मेहमान

हँस लो, हँस लोऐसी ना जाने कितनी है जिन्हें इन्तज़ार ही सिर्फ़ मेरा रहता है

रहने भी दो हुज़ूर, ऐसा तुम्हारा दिल कहता हैतुम्हारा इन्तज़ार तो खुदा भी ना करे

कुछ खिलाओगी, पिलाओगी भी या सिर्फ़ खुदा का ख़ौफ़ दिखा के डराओगी, खीर कहाँ है और वो टेढ़ी कहानी

मुझे देखो, मैं सीधी हो गयी तो कहानी भी सीधी हो गयी, कुछ पका लिया था, पकने से पहले ही खा लिया था, कहानी क्या थी, बला थी, तुम देख लेते तो लट्टू हो जाते

फिर वही बातों की जलेबी पका गोल गोल घुमा रही हो, सब छोड़ो क्या खिला रही हो, बाक़ी समझ गया, कहानी पूरी हो गई और भूख उसी के साथ मर गयी तुम्हारी, सब अकेले अकेले ही कर लिया, मुझे सिर्फ़ सताने के लिए बुलाया है क्या

अब कुछ पिलाओ, गिलास कहाँ रखें है

पुराने गिलास, घर पर ही होंगे कहीं, नए चाहिए, तो नहीं है, बाज़ार से ले आओशराब तुम्हें पता है कहाँ रखी हैनिकाल लोमेरी सिगरेट नहीं मिल रही, सब हो गया तो, वहाँ से लिहाफ़ हटा बैठिए जनाब, चियर्स

उफ़्फ़ तुम और तुम्हारी बातें, ये लो सिगरेट, जलाओ और एक मेरे लिए भी

शुक्रिया जनाब, ये लीजिये और आख़िरी कश ना पीजिएगा, कहानियाँ और लिखूँगी पर आरज़ू इतनी की आख़िरी कश मैं ही लूँगी

इसमत तुम लिखती रहो हमेशा, अब से मैं पूरी कभी नहीं पियूँगा, जब भी पियूँगा, हर बार छोड़ दूँगाआख़िरी, एक कश तेरे लिए