~ दस नम्बर…

~ दस नम्बर… 

“लीजिए श्रीमान यही वो कालोनी है जिसकी मैं बात कर रहा था, सब कुछ वैसा जैसा आपको सूट करे…सूट नया लिया लगता है अपने, जूता बहुत जच् रहा है साथ में…हाँ तो मैं आपको कालोनी के बारे में बता रहा था – बस स्टॉप गेट से बाहर निकलते ही, १० मिनट चलेंगे तो मेट्रो स्टेशन प्रपोज़द है, अन्दर ही पार्क है, और पूरी तरह सेफ एंड गार्डेड, CCTV और सिक्योरिटी गार्ड भी है” 

“कैसे हो चाचा?”

“कैसा हूँ…बेटा उम्र निकल गयी अब तो बस जान निकलनी बाक़ी है, यहाँ कोई चोर भी तो नहीं आता, आता तो लड़-वड कर मर-वर जाता तो शायद इनाम-विनाम से चार पैसे मिल जाते घर वाली को…छोडो अपनी सुनाओ, कैसा चल रहा है धन्धा?”

“चाचा सब ठीक, भाई साहब को मकान दिखाना था, दस नम्बर की चाबी दो और वो नौ नम्बर खाली हुआ क्या?”

“मर गया, मर गया”

“मर गया… क्या कह रहे हो चाचा?”

“अर्रे…मच्छर मर गया, कब से परेशान कर रहा था, ख़ून पी रखा था, एक घंटे से इस मच्छर ने…और…नौ नम्बर वाली ने तो किराया बड़ा दिया और तीन साल का इक्स्टेन्शन भी ले लिया है…ये लो चाबी”

“चलिए साहब, किराया दस हज़ार, एक महीने का मेरा कमिशन और तीन महीने का अड्वैन्स किराया”

“ये कालोनी यहाँ सबसे ज़्यादा डिमांड में रहती है, कोई आ जाए तो जाता नहीं इतनी जल्दी और पड़ोस तो आपका बहुत ही अच्छा है, सारा मोहल्ला मरता है उसके स्टाइल पर, टी-वी में काम करती है, ज्यादातर चुप रहती है अब, पहले ऐसा नहीं था, लेकिन हाँ पहले कोई था उसका अपना, बहुत चहकते थे नौ और दस नम्बर मिल कर…फिर पता नहीं क्या हुआ एक दिन अचानक ही चला गया, उधर वो निकला और इधर इनकी ख़ुशी, महक और चहक सब कुछ अचानक एक दिन दबे पाँव ये मोहल्ला छोड़ कर चली गयी”

“लेकिन एक बात की तारीफ़ कह लीजिए या यूँ कहे आज भी अपने प्यार पे भरोसा है, सिर्फ़ चाचा से बात करती है कभी कभी…उन्हीं को बता रही थी…वो एक दिन आएगा ज़रूर….और जब भी घर पर होती है बस एक ही गाना गाती और बजाती रहती है….वो क्या है गाना”

“मन कस्तूरी रे…ऐसा कुछ, हाँ आख़िर में…बात हुई ना पूरी रे”

(कोई तो बात है जो शायद अधूरी रह गयी दोनो की, सारा मोहल्ला भी दुआ करता है की वो आ जाए, ना जाने कहाँ गया वो, क्यूँ गया…ब्लडी हेल्ल)


“लिफ़्ट नहीं है, सीड़ियों से जाना पड़ेगा और हाँ जिसको भी पता चलेगा, गिर पड़ेगा की आप दस नम्बर किराये पर ले रहे है” –“सुन रहे है ना आप?”

“हाँ हाँ आप ही को सुन रहा हूँ, १० नम्बर, १० हज़ार, १ महीना आपका, ३ महीना अड्वैन्स और ९ नम्बर में कोई है जो हो के भी नहीं है…ठीक सुना ना मैंने?”

“क्या बात है, आप ने तो कमाल कर दिया, कान नए लगवाए है या आज ही साफ़ करवाए है?”

“चलिए आगे बढ़िये…देख कर सुबह सुबह भीड़ होती है बालकोनी में, यहाँ…ज़िंदगी दरवाज़ों पर जैसे नाच रही हो…ध्यान से आगे काँच टूटा पड़ा है, लग ना जाए”

“कैसे हो भाई, आज गाना नहीं सुनाओगे, सुनाओ और थोड़ा सा रास्ता बनाओ, साहब को मकान दिखाना है, फिर घर जाना है…आज इतवार है और बीवी का जन्मदिन है, भूलने का नाटक करूँगा, और फिर प्यार का इज़हार…चलो गाना गाओ यार”

> “ये लो मेरा सुनते जाओ और बाक़ी दरवाज़ों पे कान लगाओ”…”जब लाइफ़ हो आउट ओफ कंट्रोल होंठों को कर के गोल”

> “पप्पू…होंठ बाद में गोल कर लियो पहले दीवार में होल कर, कील ठोक, कपड़े सुखाने की रस्सी टांगनी है…और बालटी में पानी भर दे”

>”गीज़र ख़राब है, पानी गैस पे गरम होगा आज, और सुनो आज दुकान जाते हुए गैस वाले को सिलेंडर बोल देना, नौ दिन हो गए लिखवाए हुए”

>”आज सुबह से छाती में हल्का सा दर्द हो रहा है, गैस है शायद, थोड़ा टहल लूँ शायद आराम मिले, आज इतवार है क्लिनिक भी बंद होंगे, कल तो बिलकुल समय नहीं होगा, परसों जाऊँगा किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाऊँगा”

>”सुनो परसों क्या है?…परसों, परसों, परसों नौ तारीख़ और शनिवार है…बोलो, क्या मेरा शनि भारी होने वाला है?”

“हाँ हो सकता है, परसों बंटी का रिज़ल्ट जो आना है”

>”रिज़ल्ट रिज़ल्ट, कोई रिज़ल्ट नहीं मिलता तुम्हें समझाने का, अब माँ बाबूजी की तो उम्र निकल गयी, तुम ही प्यार से बात कर लिया करो”

> “सुबह छत पर बुलाया था…आयी नहीं तुम, प्यार को प्यार से देखने का मन था मेरे प्यार, जान आज शाम का क्या प्रोग्राम है, मूवी देखने चलें?”

>”तो ठीक है फिर, शाम को प्रोग्राम पक्का, चिकन हम ले आएँगे, और तू शराब…चखना उसी वक़्त ख़रीद लेंगे, मिलते है ९ बजे हम, तुम और जाम…अच्छा हाँ, बीयर ठंडी मिली तो पकड़ लियो”

>”पराँठे ठंडे खाओगे या गरम?”

“ठंडे कौन खाता है श्रीमती जी?”

“वोही जो बाज़ार से गरम लस्सी लाता है श्रीमान”

“कोई मौक़ा ना छोड़ना ताना देने को”

लो फिर, एक और…तैयार हूँ आज लेट आने का बहाना अभी लेने को…रहने दो चलो जाओ, प्याज़ के पकोड़े बनाए है, ख़ुद खाना सेक्रेटेरी’ को मत खिलाना” 

>”बाबूजी प्याज़ ख़त्म हैं, शाम को सैर करने मण्डी चले जाना, प्याज़ और कोई दो चार सब्ज़ी पकड़ लाना”

“ले आऊँगा बहू”…

(सारी उम्र निकाल दी कमाने, पड़ाने में, बची खुची सब्ज़ी लाने में निकाल दूँगा, ना जाने कन्धा मिलेगा या पैदल ही जाऊँगा वहाँ भी)

>”पैदल चलिए, अब मार्केट यहीं तो है, गाड़ी क्या करनी है, थोड़ा पैदल भी चल लिया करो, अदरक हो गए हो, जहाँ देखो वहीं से बड़ रहे हो, थोड़ा कंट्रोल करो नहीं तो टेम्पो ख़रीदना पड़ेगा”

>”और मत करो तुम कंट्रोल, तुम्हारा क्या…कुछ हो गया तो पापा मुझे मार देंगे”

> “छोटे देंगें दो कान के नीचे, कह रहे है, आज के बाद अगर हमसे ऊँची आवाज़ में बात की तो”

>”ऊँची है बिल्डिंग लिफ़्ट मेरी बंद है…अब गाओ तुम <ह> से गाओ”

“हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते”…”अब तुम <ए> से गाओ”

“एक मैं और एक तू है”

>”तू नहीं बोलते बेटा, बोलो आप कैसे हो…तू गंदे बच्चे बोलते है”

>”गंदे कपड़े वॉशिंग मशीन में डाल दिया करो, दो ही हाथ हैं मेरे…सब कुछ नहीं कर सकती, कुछ तो काम अपने आप भी कर लिया करो”

>”आज अपने आप, बिना अलार्म, बिना किसी के उठाए उठ गए जनाब, सब ठीक तो है, तबियत ठीक है ना…१३ साल का रीकॉर्ड तोड़ दिया आपने तो” 

>”और ये लगा छक्का…इसी के साथ ये शृंखला जीत कर भारत ने एक नया रेकॉर्ड क़ायम किया है…भारत लगातार ११ मैंचों में  जीत हासिल करने वाला पहला देश बन गया है”

>”देश भर में सिर्फ़ एक ही सवाल उठ रहा है, क्या कभी सच का पता चलेगा या इस बार भी हिरन ने ख़ुद को गोली मार ली… शायद ग़रीब और जानवर में कोई फ़र्क़ नहीं है, दोनो का अपनी ज़िंदगी पे इख़्तियार है और ना मौत पर…खाने के खोज में सारी उम्र निकल देते है और फिर एक दिन किसी का भोजन बन जाते है…कहीं जाना नहीं मिलते है एक छोटे से ब्रेक के बाद”

>”ब्रेक मारी, लगी नहीं, सड़क गिली थी और शायद ब्रेक ढीली और गया मेरा स्कूटर शर्मा जी की गाड़ी में…वो तो अच्छा हुआ शर्मा जी स्टेशन जाने को लेट हो रहे थे, बाल बाल बचा, लगा था हुआ सुबह सुबह महाभारत का पाठ आज तो”

>”आज से शाम को लेट आऊँगा, एक और टयूशन मिल गयी है, और जाना भी थोड़ा दूर है, लंच के साथ रात का खाना भी पैक कर देना, ट्रेन में ही खा लूँगा, पैसे और वक़्त दोनो बचेंगे…जो बचेगा काम आएगा, छोटी की टयूशन फ़ीस के लिए”…

(अजीब मज़ाक़ करती है ज़िंदगी सारी दुनिया को पड़ाता हूँ और अपनी बेटी को समय नहीं दे पता हूँ….चलो हलवाई अपनी मिठाई ख़ुद कहाँ खाता है)

>”खाना खाता नहीं, शराब छोड़ता नहीं, समझ में नहीं आता क्या करूँ मैं तेरा, मैं कमा कमा के थक गयी हूँ और तुझे कोई मतलब नहीं की तेरी माँ जिये या मरे…बस और बस पीने से मतलब”

“पड़ोसी कैसे लगे आपको?…कहे देता हूँ इस कालोनी की बात ही अलग है”

“लीजिए यही है आपका दस नम्बर…एक बात तो मैं आपको पूछना ही भूल गया, आप खाने और कमाने के लिए क्या करते हैं?…शक्ल सूरत से तो आप भी किसी मॉडल से कम नहीं लगते, पहले भी कितने आए, लेकिन हमने किसी को दस नम्बर दिखाया नहीं, हम भी चाहते है की कोई सिंगल हैंडसम सा लड़का ही रहे वहाँ, शायद ख़ुशी लौट आएं”

“कहानियाँ लिखता हूँ”

“अच्छा, फिर तो मज़ा आ जाएगा, मुझे कहानियों का बचपन से बहुत शौक है…लेकिन सिर्फ सुनने का, पड़ा लिखा थोड़ा कम हूँ ना…कभी सुनाओ अपनी लिखी कोई अच्छी सी कहानी…शुरू से अंत तक”

“बिलकुल, शुरुआत तो तुम सुना ही चुके हो, अंत सुन लो…सच्ची कहानी है, आपबीती”

“नौ नम्बर वाला मेरा छोटा भाई था, परसों कैन्सर से लड़ते लड़ते हार गया, नहीं चाहता था कि आपकी मैडम की ज़िंदगी ख़राब हो, इसलिए चला गया, एक दिन, चुपचाप, अचानक, दबे पाँव, अकेला, अकेले मरने के लिए”…चार पैसे भी जोड़े थे उसने, अपने सपनो को पूरा करने के लिए…मरने से पहले…सपना तो कोई पूरा ना हुआ, अपना ही पूरा हो गया” 

“मैं आया था, कुछ दिन बग़ल में रह जान पहचान कर उसे ये बात बताने की हिम्मत जुटाऊँगा…अब ना होगा मुझसे, आप दे दीजिएगा खबर और कह दीजिएगा, वो उसकी आँखो में देख कर मर नहीं पाता, हो सके तो माफ़ कर देगी और अपनी बची हुई उम्मीद आज साफ़ कर देगी”

“और उससे मेरे बारे में कुछ ना कहना, कोई कहानी बना लेना और मेरा नम्बर प्लीज़ अपने मोबाइल से हटा देना”

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~ खरोश…

~ खरोश…

मेरी खाब में ही रूह काँप जाती है,

हैरां हूँ कि तुम्हें नींद खूब आती है…

लापरवाहियों से भी चराग बुझते हैं

दीये सिर्फ आँधियाँ नहीं बुझाती हैं…

हूँ शर्मसार मैं ख़ामोश हकमरानों से,

साहेबान को तो शर्म भी न आती है…

हल्का शोर ज़ोरों का डरा देता है हमको,

आपको चीख चिल्लाहट क्या डराती है…

ये मेरे शहर का एक आम वाक्या है,

तुम्हें ये लगा मेरी खरोश ज़ाती है…

~ उड़दाँ पंजाब…

~ उड़दाँ पंजाब…

ज़िंदगी दे क़िस्से, आए सारयाँ दे हिस्से,

किसे नू दीस्से, किसे नू नयि दीस्से…

एन्ना जया बोल की बीजी फिर हल्के-फुल्के बानांण लग्ग पयी…     

हैप्पी ओय हैप्पी

उठ वी जा हुन, अद्दी रात्ती बड़ा शोर पाया फेर तू,

हैपी सद्दा, “उड़दा पंजाब”, उड़ सकदा सी उठ नयी…

हैप्पी दा वड्डा भ्ररा सी अपणा काला,

काला नां हैं जी काले दा, ते उसनु हर चीज़ काली पसंद सी…

रोटी दे नाल – काली दाल,

चावलॉ दे नाल – काले चने,

काली पैंट, काली क़मीज़, नाल काला चश्मा,

काली बुलट ते काली पग्ग,

पीनी उस, काली रम नाले ब्लैक पेप्पर चिकन,

फ़ेवरेट पिक्चर “ब्लैक”…

एक्को चीज़ सफ़ेद सी उस दे कोल, चिटा दिल,

हिक़दम साफ़, नियत सुफेद कोई काली हरकत बर्दाश्त ना सिगी उसनु,

ना करदाँ ना सेहँदा…

वेख्या, काले दी तरीफा ख़त्म ही ना होन कदें…

हैप्पी नू बस पीनी शराब ते करना पिंड दा महोल ख़राब

जमया ठीक सी, नौ साल दा सी, जद्दो बाऊजी नू परमवीर चक्र मिलया,

लोकॉ दे लेयी कश्मीर जन्नत है, इस घर दी जन्नत लूट लयी कश्मीर ने…

बस उस तो बाद ते, हर वक़त नशा,

कहंदाँ है, पाकस्तान तो ज़िन्दा बच के आए हिंदुस्तान, मरण वास्ते…

डरदाँ है होर मरदा है ते बस काले ते, काला है ही सोना, पिंड दी जान…

“बीजी, मेरी रोटी … फ़सल किहोजी है वेख आवाँ”

बुलेट नू मारी किक, जाँदें जाँदें इक लत हैप्पी नू वी, ते काला फुर्र…

“बीजी भूख लगी है, परोंठे ला दे चार नाले दे देयी अचार”

“आज तो शराब बंद”

ख़बर पड़ के अख़बार विच, “हैप्पी” ते उसदी भूख दोनो रफ़ूचक्कर…

“शराब बंद, सरकार दा दिमाग़ ख़राब हो गया हेगा, शराब ते टैक्स मिलदा है, उसनु बंद करता, स्मैक वेचड़-गे सारे” – हैप्पी बड़बड़ान्दा भज्या…   

खेत विच काला पहुंच्या ही सी,ते…

“काला भैया, काला भैया, आज हरिया फिर नहीं आया, आप बताओ इतनी फ़सल का ध्यान हम नौ लोग कैसे करेंगे?”

“साला बुरबक कहने लगा, हमहु नहीं डरत काउन काला गोरा से”

“हम आपका खिलाप किछऊ नाहीं सुन सकत, खींच कान का नीचे चार लगा दिया, सारा विचार ठिकाने आ गया”

“ओय ठंड रख ठंड, भोला है, बोलया ही ते है, कुछ उखड़ाया ते नहीं, कल लें आयी नाल अपने” – काला बोल्या…

“भैया, ई-तो हैप्पी भैया का जीप है” – हीरा बोला…

  

“कीथे, ओय हाँ, चल तू कम कर, हीरे नू ले आयीं सवेरे…

किक, स्टार्ट, चलया जट विदआउट फ़ियर…

“ओ निक्के, रुक कीथे भजदा पया हैं?”

“फ़ौज भर्ती होंन, मैं वी परमवीर जितना हैं…वीरे शराब ते बैन लग गया है, कठि करण झल्ला फिरदा हाँ” – हैप्पी सिद्दा जवाब दे ही नहीं सकदा सी…

“चंगा…ओदे नाल की होना, तू ते स्मैक पी लयी” – काले ने वि मज़ाक कित्ता…

“ना ओ वीरे ना…नशे दी लत्त है बस पागल नहीं हाँ मैं, मरना नी मैं स्मैक पी…शराब ते चल जाऊँ, स्मैक पी मैं आप ते आप पूरा घर मार देनॉ”

“सरकार दा चक्कर होर हेगा, सरकारी नशा बैन कर ऐसने अपने घर दी स्मैक दी सप्लाई वदाँ देनी है”

“पीन आड़े ने शराब बंद होयी ते, फिर स्मैक ही मारनी है”

“आ सरकार दी चाल हैं, सोचया उना की स्मैक विकेगी ते पोलिटिशिअन दे घर डिरेक्ट्ली इनकम”

काला चुप, सोंच विच,

…आदम होश विच वोट दे अन्दाँ है, ए नशे विच उड़दाँ पंजाब की समझा गया…

~ तरक्की …

~ तरक्की

प्लाट पर काम शुरू हो चुका था

खुदाई,

नींव,

पिलर,

उसके बाद दीवारें,

फिर छत,

खिड़कीदरवाज़े लकड़ी लोहे का काम,

और रंगाईपुताई इत्यादि

फिर घर के सामान की बारी,

एक सोफ़ा,

डबल बेड,

ड्रेसिंग टेबल का शीशा,

दो अलमारी,

दीवार के लिए तस्वीरें,

क़ालीन, डाइनिंगटेबल नहीं लिया,

एक बुक शेल्फ भी

किचन और बिजली की नंबर लगा,

गैस बर्तन वग़ैरह,

फ़्रिज, एसी की जगह कूलर,

पंखा, लाईटे,

टीवी,

और म्यूजिक सिस्टम,

कुछ गमले,

और डोरबेल्ल भी सेट हो गयी

एक उम्र लगी बाबूजी को यह सब करने में

मेरी पढ़ाई भी पूरी हो गयी और शहर में नौकरी भी लग गयी,

हम दोनों में अब बस एक शहर का फ़ासला था

और अब मेरी बारी थी ये सब करने की,

मेरी औलाद और मुझ में समंदर भर का फासला तो होना चाहिए

~ माला आराम की…

~ माला आराम की

राधा को हो जैसे श्याम ना मिला,

हमको भी काम का कोई काम ना मिला

यहाँ वहाँ मटकियाँ उठाते रहे,

डिंगें हाँकते हम बड़बड़ाते रहे

बस इसी आस में सुबह उठ जाते,

कोई हमें प्यार से आवाज़ लगा दे

दिन भर की फिर अफ़रातफ़री,

जैसे बिना बारिश की छतरी

शिल्पा की मम्मी सलमा की अम्मी,

किसी काम में ना रखना कोई कमी

रात नुक्कड़ पे हो जाना खड़ा,

प्यार दूर, कोई हमसे वजह होक ना लड़ा

क्यूँ करना चमचागिरी सोच नौकरी नहीं की,

आलस की डिग्री और चोटी की फुक्रागिरी

ख़ुद को शहंशाह से कभी कम नहीं आँका,

ख़ुशनसीबी ने कभी हमारी ओर नहीं झाँका

कोई पागल कोई दीवाना कह बुलाने लगा,

कभी कभी तो आयिना भी हमें समझाने लगा

जैसे राधा ने माला जपी श्याम की,

वैसे हमने भी माला जपी आराम की

~ शोरबा…

~ शोरबा…

बचपन की हसीन यादों की खोल पोटली और आवाज़ कर के तोतली बैठे बैठे मुँह से निकल गया, ज़बान से फ़िसल गया….अम्मी आज शोरबा नहीं बनाया…

रमज़ान बस मोड़ पर ही था, जब उसने मुँह मोड़ लिया था और फिर कभी नहीं दिखाया, उसके हाथ का सा शोरबा फिर ना खाने मिला, ना ही स्वाद आया…

सही कहा गया है, सामान सब वोही होता है, प्यार कितना डालना है बस वहीं चूक हो जाती है, माँ प्यार कहाँ तोल-मोल के डालती है…

हर ईद को अम्मी शोरबा पकाती थी, और उसकी ख़ुशबू से पूरी गली महक उठती थी, इत्र भी हौला था उसकी ख़ुशबू को…हर घर में सजते थे दस्तर-ख़्वान और एक हमारा घर था जहाँ सारी दुनिया की ख़ुशी और ख़ुशबू एक डोंगे में भर जाती थी…

थोड़ा तो जलती थी सारी गली उस खुशबु-ऐ-खास से की मिठास से, सब आते थे, थोड़ा थोड़ा कर बहुत सा तो वो ही पी जाते थे…बच्चे हाथ चूमते थे माँ का और बड़े माथा मेरा, खिल-खिलता सा था कुछ ऐसा छुटपन, शोरबे सा महकता और चिड़ियों सा चहकता…

अब्बू का मनी-ऑर्डर ही आता था हर महीने की ३ तारीख़ को, अब्बू की नौकरी भी बड़ी अजीब थी, ट्रेन चलाते थे दुनिया भर के लोगों को यहाँ-वहाँ ना जाने कहाँ कहाँ पहुँचाया किया करते बस अपने घर तक की पटरी शायद उतरी हुई थी…

३ साल में शायद दिन भर के लिए एक ही बार आते थे, और तब चाय नाश्ते से लेकर रात का खाना क्या ख़ूब सजता था…लेकिन अब्बू को शोरबा बिलकुल पसंद नहीं था, कहते थे अमीरों के चोंचलें है, उनको गोश्त बहुत पसंद था, ठंडा भी…

१३ साल का था, जब पहली बार मनी-ऑर्डर नहीं आया, हाँ एक टेलेग्रैम ज़रूर आया था, कुछ तो था लिखा उसमें जिसने अम्मी को सारी रात सोने ना दिया, वो आख़री बार डाक चाचा को घर के दरवाज़े पर देखा था…

अम्मी चुप चाप ज़्यादा रहती थी…

शोरबा अब हमारे घर अक्सर बनने लगा, जैसे की ईद हफ्ते में ही चार बार हो…

अम्मी अब घर में कम नज़र आती थी, और उन्हें नज़र भी कम आने लगा था…सारा दिन सुई में धागा डालते डालते सब ठीक से दिख रहा है इसका दिखावा करती थी…और सीती रहती थी कुछ तो था जो अंदर उधड़ा हुआ था…

कभी कभार बीच बीच में मुस्कुराती थी, और वो हँसी कुछ बूँदो सी छलक आती थी, लोगों के नए कपड़े बनाती थी, और मेरे लिए नए कुर्ते और नयी कतरन से ही अपनी शलवार भी…ईद को…

वक़्त बीत रहा था, और क़द बड़ रहा था मेरा, दिखने में थोड़ा साँवला था शुरू से, हाँ काग़ज़ काले करता था बचपन से…पड़ते पड़ते मेरा बचपन लड़कपन में और पड़ाते पड़ाते अम्मी की उम्र उस मोड़ पर आ गए जहाँ उन्हें मेरी ज़रूरत थी…

और मुझे शहर बुला रहा था, हमारे गाँव में स्कूल तो था पर कॉलेज का नामों-निशान नहीं, अम्मी ने अपनी कमज़ोर नज़र से मेरा आने वाला वक़्त देख लिया और पोटली बाँध मुझे शहर को चलता किया, सब कुछ भरा था उसमें, और आवाज़ भारी…

जैसे ही मेरी पढ़ाई पूरी हुई नौकरी लग गयी… इस बीच ना जाने कितनी बार मैंने अम्मी को अपने पास बुलाने की कोशिश की, उनका वही दोहराना हर बार…ठीक से पड़ ले और जब अच्छी सी नौकरी लग जाएगी तो मुझे भी अपने पास बुला लियो…

नौकरी लगते ही अगले हफ़्ते की टिकट करवा ली थी मैंने, सोचा था ख़ुद जा कर ले कर आऊँगा, लेकिन नयी नौकरी की पहली शर्त एक हफ़्ते में जोयनिंग और ३ महीने कोई छुट्टी नहीं…

अब मैं तो नहीं जा सकता था मगर अम्मी की टिकट करवा दी, रहा नहीं जा रहा था, रोज़ होटल का खाना और ख़ाली घर में ख़ुद से गुनगुनाना अब बंद…

आते ही मेरी पहली फ़रमाइश शोरबा होगा, वो ही जो पूरी मोहल्ला महका दे…ऐसा ही किया मैंने…

माँ के आते ही मेरी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा, गले लग के ना जाने कितना तो हम ने अरमानो को बहाया, माँ दुबली भी बहुत हो गयी थी, लेकिन आते ही सबसे पहले मुझे सुनने को मिला, क्या यहाँ कुछ खाने को नहीं मिलता, माँ को बच्चे हमेशा दुबले पतले ही लगते है, मैंने भी कह दिया, अब तू आ गयी है ना अब रोज़ शोरबा बनाना और जी भर के खिलाना…

ना जाने ऐसा क्या बोल दिया, अम्मी के आँसू रुकने को ना हुए, उस पूरा दिन अम्मी ने कोई बात नहीं की, चुप चाप एक कोने में बैठी, कभी उठती थी और फिर लेट जाती, मैंने बहुत कोशिश की पूछने की, ज़रा सा मुस्कुरा देती पर कुछ ना बोलती, सब ठीक है और कुछ याद आ गया बोल के, चुप हो जाती…

अगले दिन, सुबह मैं ज्यूँ ही मैंने दफ़्तर का रूख किया, उसने आवाज़ दी, और सिर्फ़ इतना कहा आज आते समय गोश्त लेता आइयो…आज कुछ ख़ास बनाऊँगी तेरे लिए, ख़ुश था माँ ने कुछ बात तो की, शाम को उनके पास ही बैठा रहा जब उन्होंने तैयारी शुरू की, ऐसा लगा ज़िंदगी संभल सी गयी…

अम्मी ने गोश्त से हड्डीयां अलग की, गोश्त ऐसे रखा की वो कुछ है ही नहीं…और बोला के ले जा, यह सामने जो भीड़ लगी है, उनको बाँट दे, आज मैंने भी तय किया था, चुप चाप हुक्म-ए-तामील होगी, की भी…

माँ फिर तैयारी में लग गयी, ठीक वैसे ही जैसे वो शोरबा बनाती थी बचपन में..इत्मीनान से लगातार हांडी में हाथ चल रहा था, नज़र पड़ी तो देखा जहाँ एक ओर हड्डियाँ उबल रही थी नमक के पानी में, और आँख से भी वही नमक मिला पानी बह रहा है…

ना जाने क्यूँ पर पूछने भर की हिम्मत ना जुटा पाया, ऐसे जैसे कोई रोक रहा था मुझको, कुछ देर अभी बीती ही थी की ख़ुशबू से सारा घर महक उठा और अब ना रहा गया और वही ज़बान जो कुछ देर पहले चुप रहने की क़सम खा बैठी थी, फ़िसली और सिर्फ़ इतना ही बोल पायी, ये तो शोरबे की महक है, लेकिन जितना ख़ुश था उतना ही हैरान भी, बिना गोश्त के कैसे…और पूछ बैठा…

जवाब सादा था, पका हुआ भी, महक मीठी थी चारों ओर, वो बोली…

जितना तुझे शोरबे से प्यार था, इसको बनाना मेरे लिए उतना ही दर्द भरा था, जितने पैसे होते थे, उतने में बाज़ार से सिर्फ़ हड्डियों पर ज़रा सा चिपका हुआ गोश्त मिलता था, पानी में पका वही बनाती थी, सोचा था कि कभी वो दिन आएगा जब मैं इसे आख़री बार बनाऊँगी…आज वो दिन है…

इतना बोल वो हमेशा के लिए चुप हो गयी…

~ और मैं था दोपहर में…

सारा शहर इश्क़ में था, और मैं शहर में,

रात आखिरी पहर में,

और मैं था दोपहर में

 

चारों ओर फैली थी ख़ामोशी, और मैं ख़बर में,

धूप थी, लू चल रही थी,

और मैं था दोपहर में

 

जमघट में हर कोई तत्पर था, और मैं यमुना तट पर था,

दिन जाने को था शाम आने को थी,

और मैं था दोपहर में

 

कश्तियाँ किनारे पर खड़ी थी, और मैं था लहरों में,

किरणें तैर रही थी पानी में,

और मैं था दोपहर में

 

दुकानें बड़ रही थी, और मैं घाटे में,

मुनाफ़ा था सफ़र में,

और मैं था दोपहर में

 

रात दूध जलेबी सी थी, और मैं खट्टे में,

अँधेरा था शजर पे,

और मैं था दोपहर में

 

अँधेरा दिन निगलता रहा, और मैं पिघलता,

ख़्वाहिशें थी बिस्तर पे,

और मैं था दोपहर में

~ कहीं सवाल, कहीं जवाब…

हदों से गुज़र रहा हर हद पार कर रहा,

कहीं से बन रहा तो कहीं से उखड़ रहा

इस क़दर अथाह, बेपनाह जैसे आसमान,

दूर कहीं उतर रहा और कहीं चड़ रहा

गहराईओं में लुप्त, अचेत, खाली खंडहर,

शान्त खामोश कहीं तो कहीं से बवंडर

सपाट मीलों तक फैला, अनन्त रेगिस्तां,

सभ्य कहीं से ज़रा, कहींकहीं से शैतान

सूक्ष्म ध्वनि, तीव्र और एकदम सटीक,

जितना ख़राब बिलकुल उतना ठीक

एक सोच, विचारधारा, अद्भुत ख्याल,

कहीं से लगे जवाब तो कहीं से सवाल

भद्र, उदार अलौकिक निरन्तर निर्मणाधीन,

संसार में कभी तो कभी आत्मा में विलीन

गुरु, सिद्ध साधुसंत और पैगंबर पीर,

दास कहीं, भक्त कहीं, कहीं कहीं से कबीर

~ क्रेज…

~ क्रेज…

मेरे मुल्क में एक शहर है

और शहर में एक मकान,

उस मकान में एक जान,

जान में एक रूह है बसी,

उस रूह की ये व्यथा है…

कैसे मैं ये विवरण करूँ,

रात दिन बस तेरा ही स्मरण करूँ,

स्तुति करूँ मैं तेरी हर पल,

तीर्थ को करूँ तेरा ही भ्रमण,

विचारों को मेरे तू देती शक्ति,

कैसे करूँ मैं ये अभिव्यक्ति,

तेरी आस्था में मैं लीन मैं,

तुझमें में ही मैं विलीन हूँ,

देह को तुझपे न्योछावर करूँ,

तू है तो किसी से मैं क्यूँ डरूँ…

तुझमें सूर्य सा तेज है,

हे प्रधानमंत्री की कुर्सी,

मुझको बस तेरा ही क्रेज है…

~ सियासत…

~ सियासत…

सियासत में ज़रूरी है ज़रा सा ध्यान रखना,

थोड़ा झुकना ज़रूरी है अगर ऊँचा है उठना…

कोई झुकता कहाँ हैं…

ज़रूरी ये भी ईमान को संभाल रखना,

बिन पैंदे का लोटा बन इधर उधर ना लुढ़कना…

कोई टिकता कहाँ है…

और लाज़मी है ज़ुबान पे मिश्रियाँ रखना,

नफ़रतें दूर रख घोलना मुहब्बत दिलों में…

कोई रखता कहाँ है…

ज़रूरी है समझना और बाँटना दर्द सबका,

सब को साथ लाना सब को साथ रखना…

कोई लाता कहाँ है…

बेहद लाज़मी है बड़ा कर हाथ उठाना,

वादों को याद रखना और उनको निभाना…

कोई निभाता कहाँ है…

सबसे ऊपर है सियासत में रियायत की हिफ़ाज़त,

ना उलझना बेकार बहस में ना आपस में लड़ाना,

कोई सुनता कहाँ है…

सियासत वो है जो दे एक जैसा दर्जा,

असली चौकीदारी और बाद में चाय पे चर्चा,

सब उलटा होता यहाँ है…