~ आलोचना…

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~ आलोचना

जब करो तुम कोई वजह से किसी की भी आलोचना,

रोक लेना जिह्वा को अपनी और दिल से इतना सोचना

 

की तुम में कितनी खूबियां है तुम में कितने दोष हैं,

लेना पकड़ कोना कोई और आँखों को अपनी मूँद कर,

अपनी सिमटी समझ की खिड़कियों को देना खोल तुम,

और सोचना, उठा भी पाओगे क्या अपनी कमीयों का तोल तुम

 

कितना आसान चीनीनुक्ता और अपनी कथनी को कहना पुख्ता,

है बड़ा कठिन सुनना लगा कान और अपनी गलती को लेना मान,

इक धक्का सा लग जाता है जब दोष कोई गिनवाता है,

अपने दोषों की गठरी छुपाने को अफवाहें फिर फैलाता हैं

 

ये अफवाहेंसुखी, तीखी, लाल मिर्च सी होती है,

और हवा का रुख जब पलटता अपनी ही आँखें रोती हैं,

तेरा जायेगा तेरे संग और तू अपने करम की ही खायेगा,

कर के दूजों की बुरीभली तू किसी की आँख ना भायेगा

 

वो जो इधर उधर की खाता है और अफवाहें फैलाता है,

वो किसी का कैसे हो सकता हैं जो बातों की आग लगाता हैं,

ये जिव्हा, गुड़मिश्री की ढेली हैं ये तेज़तीखी तलवार भी है,

ये कड़वा ज़हर का घूँट कभी और करोड़ों का व्यापार भी हैं

 

रोक लेना जिह्वा को अपनी बस दिल से इतना सोचना,

करने लगो आलोचना, अब जो करने लगो आलोचना…

 

Picture : Google Images

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~ आयिना…

~ आयिना...

ये काग़ज़ पलट के तुम क्या देखते हो,

जला देखते हो या कुछ बचा देखते हो...


तुम्हारी वो आदत अब भी बदली नहीं है,

ख़ुद को तुम वैसा दूजे को बदला देखते हो...


तुम्हें याद है बचपन में तुम थे एक सीधी लकीर,

फ़र्क़ इतना कि अब तुम सबको टेड़ा देखते हो...


ये बात बात पर तुम्हारा भोंहें चड़ाना,

तुम ख़ुद को आसमान हमें ज़र्रा देखते हो...


देखा है तुमको कोड़ियों को घूर कर ताकते,

क्यों तुम ख़ुद को सोने चाँदी से जड़ा देखते हो...


तुम्हें ना बारिश से लेना ना पतझड़ को देना,

तुम हमें सूखा पीला, ख़ुद को हरा-भरा देखते हो...


हम भरी महफ़िल में सिर्फ़ तुम्हें देखते हैं,

और तुम हमें देख बस यहाँ वहाँ देखते हो...

Image credits- Vitaliy Deynega

ये दुनियाँ है जाला और हम सब हैं मकड़ी,

है मुहब्बत आज़ादी तो ख़ुद क्यूँ जकड़ा देखते हो...


तुम थिरकती रेलगाड़ी हमें समझो पटरी,

क्यूँ हमारे वजूद को तुम ख़तरा देखते हो...


जो ज़िंदगी कहानी हम तुम उसके किरदार,

एक क़िस्सा मेरा एक तेरा, तुम सिर्फ़ पड़दा देखते हो...


कुछ तुमने बनाया कुछ हमने पिरोया,

तुम अपना बनाया हमारा उजड़ा देखते हो...


अब इसके भी आगे, और कुछ क्या कहूँ मैं,

सच कहना, क्या कभी तुम आयिना देखते हो...



Photo Credits :-

‘Love,’ by Ukrainian sculptor Alexander Milov

Image credits: Vitaliy Deynega

~ ऐब…

~ ऐब…

चलो आपबीती सुनाता हूँ तुम्हारा दिल बहलाता हूँ,
ऐसे वैसे जला हूँ मैं तो थोड़ा तुम्हें भी जलाता हूँ…

मेरे सपनों में रोज़ाना एक कली खिला है करती,
तुम ज़रा मुस्कुराओ तो मैं इक गुलाब खिलाता हूँ…

निकल जाना तो है आसान मैं थोड़ा और उलझाता हूँ,
तुम ठुकराओ चलो मुझको तुम्हें मैं फिर मुँह लगाता हूँ…

तुम्हारे बालों का ये गुच्छा तुम्हारे गालों की लाली,
कभी बालों को सहलाऊँ कभी गालों से गाल लगाता हूँ…

तुम कंधे पे रखना सिर मैं सिर से सिर मिलाता हूँ,
जो लगे जहान है सुना-सुना रुको मैं कुछ गुनगुनाता हूँ…
“के तू किसी रेल सी गुज़रती है…”

और उसपर…
आधी रात हो झमाझम बरसात हो पानी पानी चारों ओर,
तुम हिलना मत तुम्हें बाहों में ले के मैं तुम्हारे संग नहाता हूँ…

मुझे तुम याद रखना बस जैसे भी तुम्हें मैं याद आता हूँ,
शराफ़त छोड़ दो अब तुम मैं तुम्हारा ऐब बन जाता हूँ…

~ आम…

 

फलों के राजा आम ने कुछ खास करने का तय किया,

छोड़ा पेड़ और किया प्रस्थान, कर दिया उसने ऐलान

अब आम, आम नहीं रहा वो एकदम खास हो गया,

अब आम, आम नहीं रहा वो वो इलीटक्लास हो गया

शहर के बीचोंबीच उसका अब अपना एस्टेट था,

अपॉइंटमेंट के बाद भी मिलने को करना पड़ता उसका वेट था

 

इन सब आम की किस्मों में एक किस्म पहले से ही थी खास,

मोर इक्वल दैन अदर्स वो, उसके सामने सब इक्वली बकवास

खास एंड प्रीमियम किस्म ने सोचा अब थोड़ा बदलाव लाया जाए,

सबसे उमदा क़िस्म का नाम गुरु, बाक़ियों को भक्त बुलाया जाए

गुरु का काम था देना प्रवचन सुबह और शाम, ले के प्रभु का नाम,

भक्त प्रवचनों पे अमल करते, जो ना ले प्रभु ना नाम उससे लड़ते

 

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ऐलान हुआ सिर्फ़ आम ही पेड़ पर उगेगा और कोई फल नहीं,

पेड़ सारे बाक़ी लिटाए जाने लगे, जो ना लेते कटवाए जाने लगे

बाक़ी फलों को ये बात खलने लगी, बदले की आग जलने लगी,

सब हुए एकजुट, गन्ने को चुना प्रधान, आगे सुनाऊँ या ख़ुद ही लेंगें जान

आम का पलट वॉर, सब गुठली वालों को भाईबहन बना लिया, लगाया घाव,

नफरतों का बो दिया बीज वहां जहाँ बीज ही नहीं थे, खेला कमल का दाँव

 

अब सब गुठलियाँ एक और, दूसरी और बेचारे गिने चुने केले, गन्ने वगैरहा,

यही होता हैं ना खास होने का मज़ा मसल दो पीस दो जो मांगे कोई जगह

वही किस्साहर आम खास होना चाहता है हर खास खास रहना चाहता है,

आम और खास की युगोंयुगों की लड़ाई, हर दौर में जाती है दोहराई

अब फल हटा कर जानवर लगाओ या फूल पत्तों को लड़वाओ,

कुछ ना बदलेगा, खास खास रहेगा और बेमौत हर बार आम ही मरेगा

~ डिवाईडर…

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ये जो शहर कि सड़क है ना, ये हम तुम हैं,

इस सड़क, यानी की हमारे चेहरे की झुर्रियाँ फ़ुटपाथ,

और इस फ़ुटपाथ के होंठ भी हैडिवाईडर,

अक्सर गुलाबी हो जाते हैं ये डिवाईडर,

कभी एक, कभी दो पाँच साल में पक्का नहीं तो,

जब चुनाव आने को होता है

 

साल दर साल हमारी तर्रक्की के निशान, डिवाईडर,

ठीक ठाक दिखते होते नहीं हैं हम,

तोड़े फिर काम चलाऊ जोड़े जाते हम,

आगे बड़ रहे चुनाव के चक्कर में हथोडे पड़ रहे,

हमारी हालत का अंदाज़ा नेता सिर्फ़ डिवाईडर से लगाते,

जो फ़ुटपाथ डिवाईडर सँवर रहे, मतलब नेताजी चुनाव लड़ रहे

 

धूल मिट्टी चाट चाट एक रंग की हो गए,

एक सफ़ेद एक काला फिर एक सफ़ेद फिर एक काला,

कहीं सफ़ेद पिले का जोड़ा कहीं काले पिले का,

वक़्त की धूल सारे भेद भाव मिटाती रहती,

लो फिर जैसे ही हुई घोषणा चुनाव है,

सरकार हमें तोड़ती, फिर बड़े भाव से भेद भाव ओड़ती

 

ना देश बदलता ना बदलते सड़कों के हालात,

डिवाइड एंड रुल बदल डिवाईडर हो गया है,

बार बार बदला जा रहा है,

इसी पैसे से फिर चुनाव लड़ा जा रहा है,

नेताजी के पिताजी के मामाजी के बेटे, कांट्रैक्टर हैं,

पहले कंडक्टर थे और अब सेमीकंडक्टर

 

कल बारिश में मुझमें फिर जगह जगह पानी भर गया,

डिवाईडर जो कल बना था जगह जगह से आज उखड़ गया,

मेरे होठों का काला पीला सफ़ेद जगह जगह से फीका पड़ गया,

नेताजी के पिताजी के मामाजी का बेटा, वही सेमीकंडक्टर,

जगह जगह आज उसका अपना मकान है,

यहाँ हर फ़ुटपाथ शमशान और मेरा भारत महान है

~ आँच…

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सुनो आँच ज़रा धीमी कर दो, चावल देर से पकेंगे,

और हम कुछ और देर तलक साथ लिपट लेंगे

कुछ कहना नहीं, आज तुमने फिर पाज़ेब को पहना नहीं,

चावलों को धीरेधीरे पकने दो, कुछ और देर सर रखने दो

थोड़ा सा होंठों में फाँसला करो, जो जगह मिलेगी,

आज कच्चे चावल खिला देना, मेरे होठों को चबा देना

बीचबीच में आँखें मुँदना, आज चावलों का पानी पिला देना,

तुम कूदना और मुझे फाँदने की वजह देना

आज ख़्वाब सज़ा लेते है, रहने दो चावल, रात भर पका लेते है,

पकने दो उन्हें भी, जगने दो हमें भीसहर तक, दोपहर तक

 

~ घुसपैठिया…

~ घुसपैठिया…

मेरे दिल को वो अपना है घर कर बैठा,
सामान मेरा सब इधर उधर कर बैठा,
ना चाबी लगायी ना तोड़ा उसने ताला ,
ना जाने कैसे है वो बसर कर बैठा…
घुसपैठिया…

ना उठाया मुझे ना मुझको जगाया मुझे,
ना चीख़ा पुकारा, ना आवाज़ लगायी,
ना जाने कैसे तय वो ये सफ़र कर बैठा,
वो रुख़ कैसे अपना इधर कर बैठा है…
घुसपैठिया…

मेरे तकिए पे वो अपना सर कर बैठा,
अलमारी में मेरी अपनी बुशर्रत टाँग के,
पतलून को मेरे कुर्ते की नज़र कर बैठा,
कैसे वो इस घर को अपना घर कर बैठा…
घुसपैठिया…

मेरे पसीने को अपना इत्र बनाके, उसको लगाके,
वो ख़ुशबू को मेरी है अपनी ईत्र कर बैठा है,
बरामदे में मेरे उसने अपनी चारपायी बिछायी,
मेरी रातों की नींद में अपनी वो सहर कर बैठा…
घुसपैठिया…

मेरी माँ को वो अम्मी है कह कर बुलाता,
मेरे डैडी को अपना फ़ॉदर कर बैठा है,
ख़ुद मेरी जान मुझको जानेजिगर कर बैठा,
मेरी कश्ती में तैर वो सारा सफ़र कर बैठा…
घुसपैठिया…

वो बारिश में अपनी मुझे तर-बतर कर बैठा,
वो आलू और मुझको है मटर कर बैठा ,
मैं बिखरी हुई थी वो मुझको बाहों में लेके,
गुम थी कहीं मैं, मुझको वो ताज़ा ख़बर कर बैठा…
घुसपैठिया…

~ जिस्म-फरोशी…

 

दुश्मनों को भी दोस्त बना देती है,

राजनीती है ये कुछ भी करा देती है,

भाई को भाई से दरकार नहीं होती,

ये आम आदमी की सरकार नहीं होती

 

यहाँ गरीब ही आना, गरीब रहना पड़ता है,

बदनसीबों का बन के नसीब रहना पड़ता है,

और जिन के भरोसें इनकी गाडी चलती है,

छुपछुप के उनके करीब रहना पड़ता है

 

नयेनवेलों को परवाज़ की हिदायत नहीं होती,

आचरण में दाग ना हो तो कोई इनायत नहीं होती,

पर्दा है, परहेज़ है, सफ़ेद कुर्ता शराफत का दस्तावेज़ है,

काले को सफ़ेद बनाती है, राजनीती सब को कहाँ आती है

 

खाने के खिलाने के पुख्ता इंतज़ामात होते है,

शराफत सड़क पर नंगी सोती रौनक महलों में होती है,

यहाँ ना भाई भाई का हुआ बाप को बेटे से खतरा होता है,

राजनीती जिस्मफरोशी है कोई किसी के साथ भी सोता है

~ चश्मा…

सारा आसमान सर पर उठा रखा है,

ना मालूम मैंने चश्मा कहाँ रखा है,

दो आँखों से ज़माना बहुत देख लिया,

दो और लगा ताज़ा नज़र को रखा है…

 

काश दिल भी दूसरा लगा सकता मैं,

पहले वाला तो टूट के बिखर रखा है,

एक तकिया इधर एक उधर लगाया है,

तुम नहीं हो तुम्हारी याद पे सर रखा है…

 

तुमने जाते जाते जो बात कही थी मुझसे,

अब तलक उसी बात को पकड़ रखा है,

तुम्हें याद है तुमने जो बीज बोए थे,

फूलों ने उनकी की सारा शहर महका रखा है…

 

रात अंधेरी में कोई भटक ना जाए कहीं,

इसलिए चाँद को दिया बना रखा है,

और तो ओर तुम्हें सुन के हैरानी होगी,

तुमको चाँद, ख़ुद को दाग़ बना रखा है…

 

कहने वाले तो यहाँ तक कहते है,

मैंने ये ख़ुद को क्या बना रखा है,

अब उन्हें कैसे बताऊँ, समझाऊँ क्या,

मैंने तुममें ख़ुद को सजा रखा है…

 

मिल गया चश्मा सर पे लगा रखा था,

यूँ ही सारा आसमान सिर पे उठा रखा था,

नज़रें ज़मीन पर, चश्मा तुम्हें तारों में धूँड रहा था,

मैंने तुममें अपना सारा जहाँ रखा था…

~ शमशान…

 

मेरे घर के रास्ते में शमशान है, 

बेदर्द रोज़ लेता किसी की जान है,

आदमी को मिट्टी में मिला देता है,

सबको उनकी औक़ात दिखा देता है…

 

कभी भीड़ तमाम कभी दो चार आदमी,

बता देता है किसकी कितनी जान-पहचान है,

लौट जाते हैं फिर किसी रोज़ लौट आने को,

भूलना ही पड़ता है सच साँस चलाने को…

 

लटका चेहरा, दर्द गहरा, वक़्त ठहरा सा,

दो चार दिन, कुछ और ग़म, हर कोहरा छट जाता है,

आज किसी अपने को, कल किसी के अपने को,

छोड़ना वहाँ आता है, फिर काम में लग जाता है…

 

शमशान की इस बात पर मगर हँसी आती है,

उसके ठीक सामने एक हस्पताल भी हैं,

वहाँ से जान आती है यहाँ से चली जाती है,

ज़माने भर की फ़िक्र, बीच का का सफ़र, गोल सिफ़र…

 

शमशान के बग़ल में मुर्दाघर भी हैं,

दोनों की आपस में अच्छी बनती हैं,

जो एक में जलती है दूसरे में दफ़नायी जाती है,

राख मिट्टी की फिर मिट्टी में मिलायी जाती है…

 

हस्पताल और दोनों के बीच मैं एक सड़क है,

और एक चाय की दुकान, एक स्कूल, एक मयखाना हैं,

तीनों में एक चीज़ बड़ी अच्छी हैं,

देख लगता हैं वहाँ, दुनियाँ में सिर्फ़ ये तीनों सच्ची हैं…

 

सड़क के दूसरी ओर, इबादत और पूजा घर हैं,

आदमी अन्दर कुछ और बाहर कुछ और होता है,

लूटता है किसी को तो कभी खुद लूट जाता है,

फिर सड़क के उस पार जा चैन की साँस सोता है…