~ शरारतें…

कुछ शरारतें

~ शरारतें… 

शरारतें शरारतें…

शरारतें शरारतें… 

शरारतें शरारतें… 

वो दो चार पल की,

वो तेरे-मेरे कल की, 

हाँ वही, शरारतें…

कभी हसीं ख़ुशी की, 

कभी जो हमनें की थी, 

शरारतें शरारतें… 

वो तौलिया छुपाती, 

बुलाने पर ना आती, 

हाँ वही, शरारतें…

टेढ़े मेढ़े मुँह बनाती, 

बना बना चिढ़ाती, 

वोही, शरारतें…

दिन में गुम थी जाती, 

रात को थी सताती, 

शरारतें शरारतें… 

कभी हसीं ख़ुशी की, 

वोही जो हमने की थी, 

हाँ वही, शरारतें…

क्यूँ खो गये यूँ हम-तुम,  

खो गयी हमारी , 

शरारतें शरारतें…

जो थी हसीं ख़ुशी की, 

कभी जो हमने की थी, 

हाँ वही, शरारतें…

शरारतें शरारतें…

शरारतें शरारतें…

शरारतें शरारतें…

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~ खरोश…

~ खरोश…

मेरी खाब में ही रूह काँप जाती है,

हैरां हूँ कि तुम्हें नींद खूब आती है…

लापरवाहियों से भी चराग बुझते हैं

दीये सिर्फ आँधियाँ नहीं बुझाती हैं…

हूँ शर्मसार मैं ख़ामोश हकमरानों से,

साहेबान को तो शर्म भी न आती है…

हल्का शोर ज़ोरों का डरा देता है हमको,

आपको चीख चिल्लाहट क्या डराती है…

ये मेरे शहर का एक आम वाक्या है,

तुम्हें ये लगा मेरी खरोश ज़ाती है…

~ बंदा…

~ बंदा

कुछ लोग कभी तन्हा नहीं होते,

जिस गाह होते है, उस गाह नहीं होते

घुटनोंघुटनों दर्द में घसे होते हैं,

घुटते हैं मगर फना नहीं होते

हारजीत के हंगामों से दूर रहते,

बेकार मुद्दों के वो दरमियाँ नहीं होते

दिलग़मआशना बखूबी छुपा लेते हैं,

कभी भी, कहीं भी, यूँ ही बरहना नहीं होते

शक्सियत से लापरवाह ज़रूर होते है,

मगर वो बेपरवाह नहीं होते

इल्मअदब,इल्मकलम के बादशाह,

किसी तख्तोताज के शहंशाह नहीं होते

मंदिर मस्जिद की जानिब से गुज़रते ज़रूर,

मगर जनाब ये हिन्दूमुस्लमान नहीं होते

करीबकरीब ख़ामोश से होते हैं,

मगर बेज़ुबान नहीं होते

सवाल का जैसे दुरुस्त जवाब हों,

वो कोई अंदाज़ा नहीं होते

खैर मनायें के ऐसे लोग चन्द होते हैं,

मलाल भी रखें कि बेइन्तिहाँ नहीं होते

~ माला आराम की…

~ माला आराम की

राधा को हो जैसे श्याम ना मिला,

हमको भी काम का कोई काम ना मिला

यहाँ वहाँ मटकियाँ उठाते रहे,

डिंगें हाँकते हम बड़बड़ाते रहे

बस इसी आस में सुबह उठ जाते,

कोई हमें प्यार से आवाज़ लगा दे

दिन भर की फिर अफ़रातफ़री,

जैसे बिना बारिश की छतरी

शिल्पा की मम्मी सलमा की अम्मी,

किसी काम में ना रखना कोई कमी

रात नुक्कड़ पे हो जाना खड़ा,

प्यार दूर, कोई हमसे वजह होक ना लड़ा

क्यूँ करना चमचागिरी सोच नौकरी नहीं की,

आलस की डिग्री और चोटी की फुक्रागिरी

ख़ुद को शहंशाह से कभी कम नहीं आँका,

ख़ुशनसीबी ने कभी हमारी ओर नहीं झाँका

कोई पागल कोई दीवाना कह बुलाने लगा,

कभी कभी तो आयिना भी हमें समझाने लगा

जैसे राधा ने माला जपी श्याम की,

वैसे हमने भी माला जपी आराम की

~ और मैं था दोपहर में…

सारा शहर इश्क़ में था, और मैं शहर में,

रात आखिरी पहर में,

और मैं था दोपहर में

 

चारों ओर फैली थी ख़ामोशी, और मैं ख़बर में,

धूप थी, लू चल रही थी,

और मैं था दोपहर में

 

जमघट में हर कोई तत्पर था, और मैं यमुना तट पर था,

दिन जाने को था शाम आने को थी,

और मैं था दोपहर में

 

कश्तियाँ किनारे पर खड़ी थी, और मैं था लहरों में,

किरणें तैर रही थी पानी में,

और मैं था दोपहर में

 

दुकानें बड़ रही थी, और मैं घाटे में,

मुनाफ़ा था सफ़र में,

और मैं था दोपहर में

 

रात दूध जलेबी सी थी, और मैं खट्टे में,

अँधेरा था शजर पे,

और मैं था दोपहर में

 

अँधेरा दिन निगलता रहा, और मैं पिघलता,

ख़्वाहिशें थी बिस्तर पे,

और मैं था दोपहर में

~ कहीं सवाल, कहीं जवाब…

हदों से गुज़र रहा हर हद पार कर रहा,

कहीं से बन रहा तो कहीं से उखड़ रहा

इस क़दर अथाह, बेपनाह जैसे आसमान,

दूर कहीं उतर रहा और कहीं चड़ रहा

गहराईओं में लुप्त, अचेत, खाली खंडहर,

शान्त खामोश कहीं तो कहीं से बवंडर

सपाट मीलों तक फैला, अनन्त रेगिस्तां,

सभ्य कहीं से ज़रा, कहींकहीं से शैतान

सूक्ष्म ध्वनि, तीव्र और एकदम सटीक,

जितना ख़राब बिलकुल उतना ठीक

एक सोच, विचारधारा, अद्भुत ख्याल,

कहीं से लगे जवाब तो कहीं से सवाल

भद्र, उदार अलौकिक निरन्तर निर्मणाधीन,

संसार में कभी तो कभी आत्मा में विलीन

गुरु, सिद्ध साधुसंत और पैगंबर पीर,

दास कहीं, भक्त कहीं, कहीं कहीं से कबीर

~ क्रेज…

~ क्रेज…

मेरे मुल्क में एक शहर है

और शहर में एक मकान,

उस मकान में एक जान,

जान में एक रूह है बसी,

उस रूह की ये व्यथा है…

कैसे मैं ये विवरण करूँ,

रात दिन बस तेरा ही स्मरण करूँ,

स्तुति करूँ मैं तेरी हर पल,

तीर्थ को करूँ तेरा ही भ्रमण,

विचारों को मेरे तू देती शक्ति,

कैसे करूँ मैं ये अभिव्यक्ति,

तेरी आस्था में मैं लीन मैं,

तुझमें में ही मैं विलीन हूँ,

देह को तुझपे न्योछावर करूँ,

तू है तो किसी से मैं क्यूँ डरूँ…

तुझमें सूर्य सा तेज है,

हे प्रधानमंत्री की कुर्सी,

मुझको बस तेरा ही क्रेज है…

~ सियासत…

~ सियासत…

सियासत में ज़रूरी है ज़रा सा ध्यान रखना,

थोड़ा झुकना ज़रूरी है अगर ऊँचा है उठना…

कोई झुकता कहाँ हैं…

ज़रूरी ये भी ईमान को संभाल रखना,

बिन पैंदे का लोटा बन इधर उधर ना लुढ़कना…

कोई टिकता कहाँ है…

और लाज़मी है ज़ुबान पे मिश्रियाँ रखना,

नफ़रतें दूर रख घोलना मुहब्बत दिलों में…

कोई रखता कहाँ है…

ज़रूरी है समझना और बाँटना दर्द सबका,

सब को साथ लाना सब को साथ रखना…

कोई लाता कहाँ है…

बेहद लाज़मी है बड़ा कर हाथ उठाना,

वादों को याद रखना और उनको निभाना…

कोई निभाता कहाँ है…

सबसे ऊपर है सियासत में रियायत की हिफ़ाज़त,

ना उलझना बेकार बहस में ना आपस में लड़ाना,

कोई सुनता कहाँ है…

सियासत वो है जो दे एक जैसा दर्जा,

असली चौकीदारी और बाद में चाय पे चर्चा,

सब उलटा होता यहाँ है…

~ चल तू-तू मैं-मैं करते हैं…

~ चल तू-तू मैं-मैं करते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं

फिर धर्म के नाम पर मरते हैं

चल बहस करें बे सिर-पैर की

लाशों के ढेर लगाते हैं

इज़्ज़त की उड़ा धज्जियाँ

कारों और बसो को जलाते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं…

क्या खाया क्या पहना जाए

इसकी एक लिस्ट बनाते हैं

शहरों के नाम बदलते है

कुछ दंगे नए भड़काते है

पड़ोसी को देख जले पड़ोसी

भाई को भाई से लड़ाते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं…

चल देश विदेश की सैर करें

देखें सब आपस में बैर करें

कुछ पुतले नए बनाते है

कुछ बच्चों को भड़काते हैं

चल हरे को भगवा चढ़ाते है

दिलों में आग लगाते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं…

आया है मौसम चुनाव का

अब मुद्दे नए बनाते हैं

ये जनता तो बेचारी है

चल चुना इसे लगाते हैं

बातों में इसे फँसाते है

कुछ सपने नए दिखाते है

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं…

आपस में बिन बात के लड़ते है

छलकपट, दांवपेच लगाते है

माँगें जो पुराना हिसाब कोई

इतिहास में उसे फ़साते हैं

ऐशोआराम से हमको काम,

पहले वोट, फिर जेबों को भरते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं…

~ दोस्त…कहीं खो गए हैं…

मेरे कुछ दोस्त कहीं खो गए हैं,

कुछ हिन्दू तो कुछ मुसलमान हो गए हैं,

बुलाते थे जिन्हें ओये, अबे, साले, गोरे, काले,

कुछ भगवे तो कुछ हरे हो गए हैं,

मेरे कुछ दोस्त कहीं खो गए हैं

 

बड़े प्यारे थे, दो चार नहीं बहुत सारे थे,

दिखाई देते थे सुबह शाम यूँ ही बकबकाते,

किसी काम के नहीं थे आवारा फिरते थे,

कुछ पुजारी तो कुछ मौलवी हो गए हैं,

मेरे कुछ दोस्त कहीं खो गए हैं

 

गली में जम के हुड़दंग मचाते थे,

होली में नहाते, ईद में मीठा खाते थे,

हाथ कंधे पे रख शहर भर घूम आते थे,

कुछ हवनसामग्री तो कुछ हाजी हो गए हैं,

मेरे कुछ दोस्त कहीं खो गए हैं

 

छत पर सब एक साथ सोते थे,

लड़ाईझगडे में पिट एक साथ रोते थे,

मेरे दादादादी, नानानानी उनके भी होते थे,

छोटे थे जो कभी वो सब बड़े हो गए हैं,

मेरे कुछ दोस्त कहीं खो गए हैं

 

मम्मीअम्मी के पूरीपराठें खाते थे,

पापाअब्बू से सब घबराते थे,

रोज़ मिलते हस्ते खिलखिलाते थे,

कुछ जल गए, कुछ दफ़्न हो गए हैं,

मेरे कुछ दोस्त कहीं खो गए हैं