~ खरोश…

~ खरोश…

मेरी खाब में ही रूह काँप जाती है,

हैरां हूँ कि तुम्हें नींद खूब आती है…

लापरवाहियों से भी चराग बुझते हैं

दीये सिर्फ आँधियाँ नहीं बुझाती हैं…

हूँ शर्मसार मैं ख़ामोश हकमरानों से,

साहेबान को तो शर्म भी न आती है…

हल्का शोर ज़ोरों का डरा देता है हमको,

आपको चीख चिल्लाहट क्या डराती है…

ये मेरे शहर का एक आम वाक्या है,

तुम्हें ये लगा मेरी खरोश ज़ाती है…

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~ माला आराम की…

~ माला आराम की

राधा को हो जैसे श्याम ना मिला,

हमको भी काम का कोई काम ना मिला

यहाँ वहाँ मटकियाँ उठाते रहे,

डिंगें हाँकते हम बड़बड़ाते रहे

बस इसी आस में सुबह उठ जाते,

कोई हमें प्यार से आवाज़ लगा दे

दिन भर की फिर अफ़रातफ़री,

जैसे बिना बारिश की छतरी

शिल्पा की मम्मी सलमा की अम्मी,

किसी काम में ना रखना कोई कमी

रात नुक्कड़ पे हो जाना खड़ा,

प्यार दूर, कोई हमसे वजह होक ना लड़ा

क्यूँ करना चमचागिरी सोच नौकरी नहीं की,

आलस की डिग्री और चोटी की फुक्रागिरी

ख़ुद को शहंशाह से कभी कम नहीं आँका,

ख़ुशनसीबी ने कभी हमारी ओर नहीं झाँका

कोई पागल कोई दीवाना कह बुलाने लगा,

कभी कभी तो आयिना भी हमें समझाने लगा

जैसे राधा ने माला जपी श्याम की,

वैसे हमने भी माला जपी आराम की

~ और मैं था दोपहर में…

सारा शहर इश्क़ में था, और मैं शहर में,

रात आखिरी पहर में,

और मैं था दोपहर में

 

चारों ओर फैली थी ख़ामोशी, और मैं ख़बर में,

धूप थी, लू चल रही थी,

और मैं था दोपहर में

 

जमघट में हर कोई तत्पर था, और मैं यमुना तट पर था,

दिन जाने को था शाम आने को थी,

और मैं था दोपहर में

 

कश्तियाँ किनारे पर खड़ी थी, और मैं था लहरों में,

किरणें तैर रही थी पानी में,

और मैं था दोपहर में

 

दुकानें बड़ रही थी, और मैं घाटे में,

मुनाफ़ा था सफ़र में,

और मैं था दोपहर में

 

रात दूध जलेबी सी थी, और मैं खट्टे में,

अँधेरा था शजर पे,

और मैं था दोपहर में

 

अँधेरा दिन निगलता रहा, और मैं पिघलता,

ख़्वाहिशें थी बिस्तर पे,

और मैं था दोपहर में

~ कहीं सवाल, कहीं जवाब…

हदों से गुज़र रहा हर हद पार कर रहा,

कहीं से बन रहा तो कहीं से उखड़ रहा

इस क़दर अथाह, बेपनाह जैसे आसमान,

दूर कहीं उतर रहा और कहीं चड़ रहा

गहराईओं में लुप्त, अचेत, खाली खंडहर,

शान्त खामोश कहीं तो कहीं से बवंडर

सपाट मीलों तक फैला, अनन्त रेगिस्तां,

सभ्य कहीं से ज़रा, कहींकहीं से शैतान

सूक्ष्म ध्वनि, तीव्र और एकदम सटीक,

जितना ख़राब बिलकुल उतना ठीक

एक सोच, विचारधारा, अद्भुत ख्याल,

कहीं से लगे जवाब तो कहीं से सवाल

भद्र, उदार अलौकिक निरन्तर निर्मणाधीन,

संसार में कभी तो कभी आत्मा में विलीन

गुरु, सिद्ध साधुसंत और पैगंबर पीर,

दास कहीं, भक्त कहीं, कहीं कहीं से कबीर

~ क्रेज…

~ क्रेज…

मेरे मुल्क में एक शहर है

और शहर में एक मकान,

उस मकान में एक जान,

जान में एक रूह है बसी,

उस रूह की ये व्यथा है…

कैसे मैं ये विवरण करूँ,

रात दिन बस तेरा ही स्मरण करूँ,

स्तुति करूँ मैं तेरी हर पल,

तीर्थ को करूँ तेरा ही भ्रमण,

विचारों को मेरे तू देती शक्ति,

कैसे करूँ मैं ये अभिव्यक्ति,

तेरी आस्था में मैं लीन मैं,

तुझमें में ही मैं विलीन हूँ,

देह को तुझपे न्योछावर करूँ,

तू है तो किसी से मैं क्यूँ डरूँ…

तुझमें सूर्य सा तेज है,

हे प्रधानमंत्री की कुर्सी,

मुझको बस तेरा ही क्रेज है…

~ धर्म…

दो ही धर्म है

अमीर होना या ग़रीब होना,

होना बदनसीब या ख़ुशनसीब होना

उनसे दूर होना या उनके करीब होना,

सब जैसा होना या अजीबो गरीब होना

होना आबाद या निस्तोनाबाद होना,

किसी के बस में या बिलकुल आज़ाद होना

टहनी से लटका या गिरा हुआ फल होना,

ताज़ा आज या गुज़रा हुआ कल होना

सड़क का कंकर या मील का पत्थर होना,

भला चंगा होना या बद से बदत्तर होना

भोलाभाला होना या तेज़तर्रार होना,

काम का होना या बिलकुल बेकार होना

गोराचिट्टा होना या अँधेरी रात सा,

या इस जात का उस जात का

दो ही धर्म है

बाकी सब पहनावे हैं,

बहकाने के छलावे हैं…

~ चुनाव चिन्ह…

~ चुनाव चिन्ह

सोचा उन्नीस में अगला चुनाव है और कोई बीस इक्कीस न हो जाये,

हम उठे, चुनाव ऑफिस गए और अपना परचा भर आये

 

हमारा परचा एक्सेप्ट तो हो गया पर कोने पे सितारा * बना दिया,

कहा, विचार होगा इस परकल आये और अपना चुनाव चिन्ह विस्तार से समझाए

 

हमने चुनाव चिन्ह में तीन ऑप्शन दिए थे – “बोतल, गिलास और बार

हमें क्या, हम क्लियर थे समझाने को, एकदम तैयार

 

अब उठायी दोनों टाँगे, ताँगा झोला और फिर पहुँच गए चुनाव दफ़्तर

नम्बर पहला था और एक सवाल आयाये भी कोई चुनाव चिन्ह है; ये तो समाज की बुराईयाँ है, कुछ और लायें

अब ये ज़रा हमें दुःख गया, पैर फैलाये और विस्तार से समझाया

इन तीनो चिन्ह में से कोई एक भी बता दें जो धर्म, जात, या किसी भी वजह से तोड़ती हो,

चलिए यह बता दीजिये, कौन सा कुछ खाने से रोकता है, या कौन सा अपना विचार हम पर थोपता है,

जनाबशराब कौन बना रहा है, कौन पिला रहा है और कौन पी रहा है इसमें कोई भेद भाव नहीं है,

शराब तो एकता का प्रतीक है और ये बात पूरी दुनिया ठीक है,

रही बात बाकी के चिन्हो कीसमाज में बुराईयां कौन फैला रहा हैं, वो चिन्ह शांति के होंगे मगर आग वही लगा रहे हैं और आप ख्वामखाह हमें ही बहका रहे हैं

 

कोई हाथ फैला रहा हैं और खानदान चला रहा हैं,

कहीं फूल है तो कीचड भी बेहिसाब,

साईकिल वोट खा रही हैं और गाडी चला रही हैं,

हथोड़ा कहीं कर रहा है वार और तरक़्क़ी में हैं बेरोज़गार,

कहीं तीर कमान, कहीं उगता सूरज और कहीं हल का निशानसब मिल के कर रहे हमें परेशान,

हमारे इरादे मज़बूत है इनपे झाड़ू ना चलायें,

जनाब, हाथी चल सकता हैतो बोतल, गिलास या बार क्यों नहीं

 

हमारा चिन्ह हमें मिलना चाहिए और हमने तो ओपिनियन पोल भी करवाया हैं

अस्सी प्रतिशत हमारे साथ हैं,

जो धर्मजातरंगभेद से ऊपर उठना चाहते हैं

बचे बीस प्रतिशत,

कुछ लड़ने लड़ाने में व्यस्त और कुछ विदेशों में हैं विलुप्त

जनाब, हमारा तो सिर्फ़ चिन्ह नशे का है प्रतीक

ये सब तो सत्ता के नशे में हैं धुत्तकहिए अब ठीक?…

   

  

    

~ ख़त…

~ ख़त…

हवाओं में आज इक मीठी सी महक है,

देखुँ ख़त आया होगा…

वो दूर कुछ नज़र आ भी रहा है,

धूल भी उड़ रही है,

धड़कने अब मेरी बड़ने लगी,

मैं भागी भागी इस सोच में थी,

बताया नहीं इस बार की आने को हैं,

फिर सोचा ये तो ऐसे ही हैं, पगले कहीं के…

बता देते….

तो कुछ अच्छा सा बना लेती,

और ख़ुद को थोड़ा सज़ा लेती,

बता देते….

तो रात भर ना सोती मैं,

और मीठे सपनो में खोती मैं,

बता देते….

तो टिका तिलक मँगा लेती,

और फूलों से सेज सज़ा लेती,

बता देते….

तो सारे ख़त में पड़ लेती,

और सपनो में तुमसे लड़ लेती,

ये सोच सोच अब धड़कने मेरी तेज़ हुई,

वो धूल उड़ाती, गाड़ी, आ रुकी…

दो जवान, गर्दन झुकी और सीना तान,

आगे बड़े, आ कर पास,

दे गए, तिरेंगे में लिपटा…एक ख़त…

~ तुम ज़रा दर्द दो ना…

सोच बंद, शब्द फरार, कलम सुखी, पन्ने खाली फड़फड़ा रहें हैं,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

जिस्म ढीला, आँखें नम, ज़बान पे ताला, हर काम मैंने टाला,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

होश हो के भी नहीं, ढूँढने लगता हूँ जो गुमा ही नहीं,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

बत्तियाँ सारी गुल, उजाले से कोफ़्त अँधेरे से प्यार,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

शोर चुभता, ख़ामोशी खलती, वो आज बात नहीं जो कल थी,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

भूख नदारद, प्यास भी रूठी, झूठ लगे सच्चा, सच्ची बातें झूठी,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

इतना सा अफसाना है,

सच कहता हूँ सच के सिवा कुछ नहीं,

दर्द जब तक निगाह में नहीं होता,

लिखना चाहूँ लिखा नहीं जाता,

अब और गिड़गिड़ा भी नहीं पा रहा हूँ,

बिन रेत घंस रहा बिन पानी डूब रहाँ हूँ,

बचा लो, निकालो भँवर से,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

रख के काग़ज़ पे क़लम, इस उम्मीद से हूँ,

अभी उठेगा एक दर्द और सब मीठा हो जाएगा,

सोच, शब्द, क़लम, पन्ने, खिल उठेंगें,

और एक क़िस्सा नज़र होगा,

आज़मा के देख लो,

कितना हंसी वो मंज़र होगा…

जैसे…कुछ ऐसा सा…

ये सर्दियों की सुनहरी धुप और तुम्हारी गर्मियाँ,

ख़ूबियाँ तेरी हज़ार, अनगिनत मेरी कमियाँ…