~ ग़लतफ़हमी…

 

एक आमलेट और एक चाय, वहाँ सामने बैठा हूँ, वहीं ले आए, अगर कहें तो आकर ले जाऊँ, थका हूँ थोड़ा हो सके तो वहीं पहुँचाए, चाय अच्छे से उबालना और हाँ कभी कोई ग़लतफ़हमी ना पालना…

कल दुकान नहीं खोली थी, सब ठीक है या तबियत ढीली थी, ये क्या चाय के दाम बड़ा दिए, पराँठा तो बड़ा ही छोटा बनाया है, उसका दाम शायद इसीलिए नहीं बढ़ाया है, निम्बू पानी बंद कर दिया लग रहा है, निम्बू महंगे हो गए या कोई पीता नहीं, ग़लतफ़हमी पाल कोई ज़्यादा जीता नहीं…

आज गरमी भी बहुत है, शायद बरसात भी होगी, दिन में काली सी जैसे रात भी होगी, दूध उबल रहा है, आँच धीमी कर दो और नमक का डिब्बा ख़ाली है भर दो, धनिया सूख रहा है, पानी छिड़क दो, तवा भी काला हो गया है, रगड़ देना जब धोने लगो, वो गिलास टूटा है जो सामने रखा है, ग़लतफ़हमी से हर रिश्ता बीच राह ही छूटा है…

कितना हुआ पूछूँगा नहीं, जितना है लिख लो हिसाब में, अपनी लाल किताब में, पिछले महीने एक हज़ार दिए थे उसमें से १३० रुपए निकलते हैं, इस महीने हिसाब में कम कर लेना उतना, बात करने से कम होती है ग़लतफ़हमी बस समझो इतना…

 

 

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~ कालविस्र्द्ध…

 

एक हुजूम का हिस्सा है; आदमी नहीं जैसे कोई किस्सा हैं

टेबल का टुटा पैर या कुर्सी की टूटी हुई बाँह,

अखबार का अनपड़ा इश्तहार या जगह भरती खबर बेकार,

घड़ी की सबसे लम्बी सुई या पुरानी रजाई की रुई जैसे,

टूटे मुँह वाले चाय का गिलास या बीते फैशन का लिबास,

खुद से भी कितना दूर है, ना जाने किसके पास हैं… 

 

भरी कॉपी है कोई या किताब के आखिरी पन्ने में रखा बुकमार्क,

सर्दियों में फ्रिज में बेकार जमी बर्फ या बड़े चेक वाला स्कार्फ़,

पुराने पर्स में रखा फटा हुआ नोट या पुरानी चोट का निशान,

ज़मीन जिसकी सारी बिक गयी खोखली ज़मींदारी की शान,

सोलह अगस्त की जैसे पतंग, सोच सोच कर हूँ मैं दंग

 

मोटी निब का पेन जैसा कोई या खाली लाल रिफिल सा है,

वो चश्मा है गोल सा जिसकी उम्र आँखों से भी हो बड़ी,

तीन पहिये वाली साईकिल जैसे बच्चे से छोटी हो, कोने में पड़ी,

बची हुई उन का ज़रा सा गोला कोई और कोई बड़ा ही भोला यहाँ,

बेज़ार कहो, बेकार कहो, उसे अपनी ही हालत का शिकार कहो

 

दादी की सफ़ेद चीनी वाली कटोरी कोई, कोई बिना धार की छुरी,

साठ मिनट की ऑडियो कैसेट कोई और कोई टेप रिकॉर्डर सा है,

बिन पानी के सूखा नल सा तो कोई भुलाबिसरा कल सा है,

ब्लैक एंड वाइट कैमरा कोई और कोई धूल चढ़ी तस्वीर,

वक़्त का चक्र पीस देता हर सब्र

सब हुजूम का हिस्से है; जो गयी बीत उस ज़रूरत के किस्से हैं

~ गोश्त की दुकान…

साहब, छोटा मुँह और बड़ी बात…

दो पैर, दो हाथ…छरहरा बदन, तीखे नयन…बिगड़े हालात…खिलता चमन…उजाड़ोगे?

गोश्त नया है आया…एकदम गर्म…हज़ार मील का सफर है किया तय…

दो दिन, दो रात लगी यहाँ तक लाने में..सोलह की है…खाली पेट …भरोगे?

बोटी बोटी रसदार है…आप हाँ करते हो नहीं तो मेरे पास दूसरा खरीददार हैं…

साहब, आप तो खिलाड़ी है…वो पहली बार बाजार में आयी है…हम दोनों की ये पहली कमाई है…

और हाँ, अगर हाथ न आये तो प्यार से समझाना…मरोड़ियेगा मत…मरोड़ना पड़े तो तोड़िएगा मत…

थोड़ी ख़ुद पीजिएगा…और बहला फुसला के गर्दन से पकड़ लेना…अकड़ने लगे, तो बाहों में जकड़ लेना…

चीख़ना चिल्लाना बहुत होगा, दिल मज़बूत रखना…तड़पनतो होगी…मुँह अच्छे से ढकना…

ज़रूरी बात, दाम में कोई कमी ना होगी…सस्ता चाहिए तो बाड़े में और बहुत हैं जंजाल…चुन लीजिए हमारी दुकान में एक से बड़कर एक हैं ज़िंदा कंकाल…