~ इत्तफ़ाक़…

Coincidence

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पड़ गया मेरे आराम में आज फिर खलल पड़ गयाफिर बैठे बैठे हुआ खड़ा आज फिर मन बदल गया,

चलने ही वाला था पर जैसे ही उठाया पहला कदमपिछले वाला अगले वाले से बेवजह ही लड़ गया

 

नीली पतलून, पिली क़मीज़ अंदर सफ़ेद बनियानजूता पहना भुला जुराब, साली किस्मत है ही ख़राब,

घुमा, मुड़ा और जैसे तैसे चल पड़ा देखा बटुआ पड़ाकिसका है ? मेरा तो हैं नहीं, बटुआ था तस्वीरों भरा

 

कल ली थी रेल की टिकट घूमने जाने को कहींजाने क्यों अब कहीं जाने का बिलकुल मन नहीं,

क्या करूँ, क्या नहीं, फाड़ा टिकट उतारी जैकेट,  उतारा जैसे ही जैकेट गिरा उसमें से एक पैकेट

 

पैकेट में थी नाटक की टिकट, नाटकइत्तफ़ाक़”, डिरेक्टर बेबाक़, ऐक्टर तपाक, क्रू फटफट फ़टाक,

ऑडीयन्स में भी जोश था, बस, दरबान ख़ामोश थापूछा तो बोला, बेटा था ना रहा, तस्वीरें थी अब वो भी नहीं

 

याद है ? बटुआ तस्वीरों से भरा, उठाया था, बताना भुल गयाउसकी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा, होश था अब जोश था,

बेटा, उसका लड़खडाता था, ठीक से चल ना पाता थाशौंक उसे सिर्फ़ तस्वीरों का था, “इत्तफ़ाक़ये तक़दीरों का था

~ शमशान…

 

मेरे घर के रास्ते में शमशान है, 

बेदर्द रोज़ लेता किसी की जान है,

आदमी को मिट्टी में मिला देता है,

सबको उनकी औक़ात दिखा देता है…

 

कभी भीड़ तमाम कभी दो चार आदमी,

बता देता है किसकी कितनी जान-पहचान है,

लौट जाते हैं फिर किसी रोज़ लौट आने को,

भूलना ही पड़ता है सच साँस चलाने को…

 

लटका चेहरा, दर्द गहरा, वक़्त ठहरा सा,

दो चार दिन, कुछ और ग़म, हर कोहरा छट जाता है,

आज किसी अपने को, कल किसी के अपने को,

छोड़ना वहाँ आता है, फिर काम में लग जाता है…

 

शमशान की इस बात पर मगर हँसी आती है,

उसके ठीक सामने एक हस्पताल भी हैं,

वहाँ से जान आती है यहाँ से चली जाती है,

ज़माने भर की फ़िक्र, बीच का का सफ़र, गोल सिफ़र…

 

शमशान के बग़ल में मुर्दाघर भी हैं,

दोनों की आपस में अच्छी बनती हैं,

जो एक में जलती है दूसरे में दफ़नायी जाती है,

राख मिट्टी की फिर मिट्टी में मिलायी जाती है…

 

हस्पताल और दोनों के बीच मैं एक सड़क है,

और एक चाय की दुकान, एक स्कूल, एक मयखाना हैं,

तीनों में एक चीज़ बड़ी अच्छी हैं,

देख लगता हैं वहाँ, दुनियाँ में सिर्फ़ ये तीनों सच्ची हैं…

 

सड़क के दूसरी ओर, इबादत और पूजा घर हैं,

आदमी अन्दर कुछ और बाहर कुछ और होता है,

लूटता है किसी को तो कभी खुद लूट जाता है,

फिर सड़क के उस पार जा चैन की साँस सोता है…

 

~ अख़बार…

 

सुबह की गरम चाय ने आज जैसे ही तलूये को छूआ, इक हलकी सी जलन का एहसास हुआ…

ठीक उतना ही…

जितना दिल का टुकड़ा बचा है, बाक़ी तो सब जला दिया था तुमने…
उतनी जितनी आस बाक़ी छोड़ी थी तुमने, सब उम्मीदें मिटा देने के बाद…

ठीक उतना ही…
जितनी ख़ुशी रह गयी थी यादों में लिपटी, बाक़ी सब तुम्हारे साथ लपेट भेजी थी…
जितना तल्ख़ पर रह गया था स्वाद तुम्हारे होंठों का, बाक़ी सुखी छोड़ दी थी तुमने ज़मीन…

ठीक उतना ही…
जितना सपनों में तुम्हें देखना बाक़ी रहा, तस्वीर तक तो कोई नहीं छोड़ी तुमने…
जितनी फ़िक्र रही तुम्हें मेरी, अपनी सारी फ़िक्र तुम छोड़ गए थे मेरे पास…

बस एक ख़लिश ही मेरी पूरी रही, बाक़ी की ठंडी चाय की तरह, जिसे बड़े ही आराम से सुबह के अख़बार के साथ रोज़ पीती हूँ…

 

~ शायद, यक़ीनन…

 

एक ज़मीन का टुकड़ा कुछ उखड़ा, था, शायद

दो गज़ लम्बाई, दो हाथ भर चौड़ाई, यक़ीनन

 

बदमस्त हो वहां ज़िन्दगी सो रही थी, शायद

मौत चेहरों पे सिरहाने उसके रो रही थी, यक़ीनन

 

दूर से लगा, कुछ ऐसा वो मंज़र था, शायद

मिटटी में जा मिला मिटटी से वो बना था, यक़ीनन

 

भीड़ थी और कुछ चेहरों पे गीली लकीर थी, शायद,

बाकी रौनक आजा रही, रस्म निभा रही थी, यक़ीनन   

 

ताबूत में अब बस होने को वो बंद था, शायद

आज़ाद छंद था अब वो आज़ाद छंद था, यक़ीनन

~ ग़लतफ़हमी…

 

एक आमलेट और एक चाय, वहाँ सामने बैठा हूँ, वहीं ले आए, अगर कहें तो आकर ले जाऊँ, थका हूँ थोड़ा हो सके तो वहीं पहुँचाए, चाय अच्छे से उबालना और हाँ कभी कोई ग़लतफ़हमी ना पालना…

कल दुकान नहीं खोली थी, सब ठीक है या तबियत ढीली थी, ये क्या चाय के दाम बड़ा दिए, पराँठा तो बड़ा ही छोटा बनाया है, उसका दाम शायद इसीलिए नहीं बढ़ाया है, निम्बू पानी बंद कर दिया लग रहा है, निम्बू महंगे हो गए या कोई पीता नहीं, ग़लतफ़हमी पाल कोई ज़्यादा जीता नहीं…

आज गरमी भी बहुत है, शायद बरसात भी होगी, दिन में काली सी जैसे रात भी होगी, दूध उबल रहा है, आँच धीमी कर दो और नमक का डिब्बा ख़ाली है भर दो, धनिया सूख रहा है, पानी छिड़क दो, तवा भी काला हो गया है, रगड़ देना जब धोने लगो, वो गिलास टूटा है जो सामने रखा है, ग़लतफ़हमी से हर रिश्ता बीच राह ही छूटा है…

कितना हुआ पूछूँगा नहीं, जितना है लिख लो हिसाब में, अपनी लाल किताब में, पिछले महीने एक हज़ार दिए थे उसमें से १३० रुपए निकलते हैं, इस महीने हिसाब में कम कर लेना उतना, बात करने से कम होती है ग़लतफ़हमी बस समझो इतना…

 

 

~ कालविस्र्द्ध…

 

एक हुजूम का हिस्सा है; आदमी नहीं जैसे कोई किस्सा हैं

टेबल का टुटा पैर या कुर्सी की टूटी हुई बाँह,

अखबार का अनपड़ा इश्तहार या जगह भरती खबर बेकार,

घड़ी की सबसे लम्बी सुई या पुरानी रजाई की रुई जैसे,

टूटे मुँह वाले चाय का गिलास या बीते फैशन का लिबास,

खुद से भी कितना दूर है, ना जाने किसके पास हैं… 

 

भरी कॉपी है कोई या किताब के आखिरी पन्ने में रखा बुकमार्क,

सर्दियों में फ्रिज में बेकार जमी बर्फ या बड़े चेक वाला स्कार्फ़,

पुराने पर्स में रखा फटा हुआ नोट या पुरानी चोट का निशान,

ज़मीन जिसकी सारी बिक गयी खोखली ज़मींदारी की शान,

सोलह अगस्त की जैसे पतंग, सोच सोच कर हूँ मैं दंग

 

मोटी निब का पेन जैसा कोई या खाली लाल रिफिल सा है,

वो चश्मा है गोल सा जिसकी उम्र आँखों से भी हो बड़ी,

तीन पहिये वाली साईकिल जैसे बच्चे से छोटी हो, कोने में पड़ी,

बची हुई उन का ज़रा सा गोला कोई और कोई बड़ा ही भोला यहाँ,

बेज़ार कहो, बेकार कहो, उसे अपनी ही हालत का शिकार कहो

 

दादी की सफ़ेद चीनी वाली कटोरी कोई, कोई बिना धार की छुरी,

साठ मिनट की ऑडियो कैसेट कोई और कोई टेप रिकॉर्डर सा है,

बिन पानी के सूखा नल सा तो कोई भुलाबिसरा कल सा है,

ब्लैक एंड वाइट कैमरा कोई और कोई धूल चढ़ी तस्वीर,

वक़्त का चक्र पीस देता हर सब्र

सब हुजूम का हिस्से है; जो गयी बीत उस ज़रूरत के किस्से हैं

~ गोश्त की दुकान…

साहब, छोटा मुँह और बड़ी बात…

दो पैर, दो हाथ…छरहरा बदन, तीखे नयन…बिगड़े हालात…खिलता चमन…उजाड़ोगे?

गोश्त नया है आया…एकदम गर्म…हज़ार मील का सफर है किया तय…

दो दिन, दो रात लगी यहाँ तक लाने में..सोलह की है…खाली पेट …भरोगे?

बोटी बोटी रसदार है…आप हाँ करते हो नहीं तो मेरे पास दूसरा खरीददार हैं…

साहब, आप तो खिलाड़ी है…वो पहली बार बाजार में आयी है…हम दोनों की ये पहली कमाई है…

और हाँ, अगर हाथ न आये तो प्यार से समझाना…मरोड़ियेगा मत…मरोड़ना पड़े तो तोड़िएगा मत…

थोड़ी ख़ुद पीजिएगा…और बहला फुसला के गर्दन से पकड़ लेना…अकड़ने लगे, तो बाहों में जकड़ लेना…

चीख़ना चिल्लाना बहुत होगा, दिल मज़बूत रखना…तड़पनतो होगी…मुँह अच्छे से ढकना…

ज़रूरी बात, दाम में कोई कमी ना होगी…सस्ता चाहिए तो बाड़े में और बहुत हैं जंजाल…चुन लीजिए हमारी दुकान में एक से बड़कर एक हैं ज़िंदा कंकाल…

~ महाभारत…

~ महाभारत

है कथा संग्राम की

विश्व के कल्याण की

धर्म अधर्म आदि अनंत

सत्य असत्य कलेश कलंक

सार्थ की कथा परमार्थ की |

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महाभारत

शक्ति है भक्ति है

जन्मों की मुक्ति है

जीवन का ये सम्पूर्ण सार है

सत्य,

जन्ममृत्यु है

बीच विघ्न संसार है

वक़्त का चक्र उलट सा गया घूम,

है पृथ्वी खड़ी वहीं और आदमी गया घूम

कर लिया उसने यक़ीन,

कृष्ण नहीं गीता नहीं और ना गीता का सार,

ख़ुद ही करने लगा अपनी महिमा अपरंमपार.

कर ज़मीन को नाम अपने, छू लिया चाँद भी,

करते पूजा पथर की, पथर हो गया आदमी,

खोल हर एक कड़ी उसने सुलझा ली मौत भी,

दिया छोड़ जीना उसने अब

करने मौत को परेशान,

अब वो ढूँढ रहा है, नयी इजाद,

कर रहा है… ना मरने की जिहाद