~ शोरबा…

~ शोरबा…

बचपन की हसीन यादों की खोल पोटली और आवाज़ कर के तोतली बैठे बैठे मुँह से निकल गया, ज़बान से फ़िसल गया….अम्मी आज शोरबा नहीं बनाया…

रमज़ान बस मोड़ पर ही था, जब उसने मुँह मोड़ लिया था और फिर कभी नहीं दिखाया, उसके हाथ का सा शोरबा फिर ना खाने मिला, ना ही स्वाद आया…

सही कहा गया है, सामान सब वोही होता है, प्यार कितना डालना है बस वहीं चूक हो जाती है, माँ प्यार कहाँ तोल-मोल के डालती है…

हर ईद को अम्मी शोरबा पकाती थी, और उसकी ख़ुशबू से पूरी गली महक उठती थी, इत्र भी हौला था उसकी ख़ुशबू को…हर घर में सजते थे दस्तर-ख़्वान और एक हमारा घर था जहाँ सारी दुनिया की ख़ुशी और ख़ुशबू एक डोंगे में भर जाती थी…

थोड़ा तो जलती थी सारी गली उस खुशबु-ऐ-खास से की मिठास से, सब आते थे, थोड़ा थोड़ा कर बहुत सा तो वो ही पी जाते थे…बच्चे हाथ चूमते थे माँ का और बड़े माथा मेरा, खिल-खिलता सा था कुछ ऐसा छुटपन, शोरबे सा महकता और चिड़ियों सा चहकता…

अब्बू का मनी-ऑर्डर ही आता था हर महीने की ३ तारीख़ को, अब्बू की नौकरी भी बड़ी अजीब थी, ट्रेन चलाते थे दुनिया भर के लोगों को यहाँ-वहाँ ना जाने कहाँ कहाँ पहुँचाया किया करते बस अपने घर तक की पटरी शायद उतरी हुई थी…

३ साल में शायद दिन भर के लिए एक ही बार आते थे, और तब चाय नाश्ते से लेकर रात का खाना क्या ख़ूब सजता था…लेकिन अब्बू को शोरबा बिलकुल पसंद नहीं था, कहते थे अमीरों के चोंचलें है, उनको गोश्त बहुत पसंद था, ठंडा भी…

१३ साल का था, जब पहली बार मनी-ऑर्डर नहीं आया, हाँ एक टेलेग्रैम ज़रूर आया था, कुछ तो था लिखा उसमें जिसने अम्मी को सारी रात सोने ना दिया, वो आख़री बार डाक चाचा को घर के दरवाज़े पर देखा था…

अम्मी चुप चाप ज़्यादा रहती थी…

शोरबा अब हमारे घर अक्सर बनने लगा, जैसे की ईद हफ्ते में ही चार बार हो…

अम्मी अब घर में कम नज़र आती थी, और उन्हें नज़र भी कम आने लगा था…सारा दिन सुई में धागा डालते डालते सब ठीक से दिख रहा है इसका दिखावा करती थी…और सीती रहती थी कुछ तो था जो अंदर उधड़ा हुआ था…

कभी कभार बीच बीच में मुस्कुराती थी, और वो हँसी कुछ बूँदो सी छलक आती थी, लोगों के नए कपड़े बनाती थी, और मेरे लिए नए कुर्ते और नयी कतरन से ही अपनी शलवार भी…ईद को…

वक़्त बीत रहा था, और क़द बड़ रहा था मेरा, दिखने में थोड़ा साँवला था शुरू से, हाँ काग़ज़ काले करता था बचपन से…पड़ते पड़ते मेरा बचपन लड़कपन में और पड़ाते पड़ाते अम्मी की उम्र उस मोड़ पर आ गए जहाँ उन्हें मेरी ज़रूरत थी…

और मुझे शहर बुला रहा था, हमारे गाँव में स्कूल तो था पर कॉलेज का नामों-निशान नहीं, अम्मी ने अपनी कमज़ोर नज़र से मेरा आने वाला वक़्त देख लिया और पोटली बाँध मुझे शहर को चलता किया, सब कुछ भरा था उसमें, और आवाज़ भारी…

जैसे ही मेरी पढ़ाई पूरी हुई नौकरी लग गयी… इस बीच ना जाने कितनी बार मैंने अम्मी को अपने पास बुलाने की कोशिश की, उनका वही दोहराना हर बार…ठीक से पड़ ले और जब अच्छी सी नौकरी लग जाएगी तो मुझे भी अपने पास बुला लियो…

नौकरी लगते ही अगले हफ़्ते की टिकट करवा ली थी मैंने, सोचा था ख़ुद जा कर ले कर आऊँगा, लेकिन नयी नौकरी की पहली शर्त एक हफ़्ते में जोयनिंग और ३ महीने कोई छुट्टी नहीं…

अब मैं तो नहीं जा सकता था मगर अम्मी की टिकट करवा दी, रहा नहीं जा रहा था, रोज़ होटल का खाना और ख़ाली घर में ख़ुद से गुनगुनाना अब बंद…

आते ही मेरी पहली फ़रमाइश शोरबा होगा, वो ही जो पूरी मोहल्ला महका दे…ऐसा ही किया मैंने…

माँ के आते ही मेरी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा, गले लग के ना जाने कितना तो हम ने अरमानो को बहाया, माँ दुबली भी बहुत हो गयी थी, लेकिन आते ही सबसे पहले मुझे सुनने को मिला, क्या यहाँ कुछ खाने को नहीं मिलता, माँ को बच्चे हमेशा दुबले पतले ही लगते है, मैंने भी कह दिया, अब तू आ गयी है ना अब रोज़ शोरबा बनाना और जी भर के खिलाना…

ना जाने ऐसा क्या बोल दिया, अम्मी के आँसू रुकने को ना हुए, उस पूरा दिन अम्मी ने कोई बात नहीं की, चुप चाप एक कोने में बैठी, कभी उठती थी और फिर लेट जाती, मैंने बहुत कोशिश की पूछने की, ज़रा सा मुस्कुरा देती पर कुछ ना बोलती, सब ठीक है और कुछ याद आ गया बोल के, चुप हो जाती…

अगले दिन, सुबह मैं ज्यूँ ही मैंने दफ़्तर का रूख किया, उसने आवाज़ दी, और सिर्फ़ इतना कहा आज आते समय गोश्त लेता आइयो…आज कुछ ख़ास बनाऊँगी तेरे लिए, ख़ुश था माँ ने कुछ बात तो की, शाम को उनके पास ही बैठा रहा जब उन्होंने तैयारी शुरू की, ऐसा लगा ज़िंदगी संभल सी गयी…

अम्मी ने गोश्त से हड्डीयां अलग की, गोश्त ऐसे रखा की वो कुछ है ही नहीं…और बोला के ले जा, यह सामने जो भीड़ लगी है, उनको बाँट दे, आज मैंने भी तय किया था, चुप चाप हुक्म-ए-तामील होगी, की भी…

माँ फिर तैयारी में लग गयी, ठीक वैसे ही जैसे वो शोरबा बनाती थी बचपन में..इत्मीनान से लगातार हांडी में हाथ चल रहा था, नज़र पड़ी तो देखा जहाँ एक ओर हड्डियाँ उबल रही थी नमक के पानी में, और आँख से भी वही नमक मिला पानी बह रहा है…

ना जाने क्यूँ पर पूछने भर की हिम्मत ना जुटा पाया, ऐसे जैसे कोई रोक रहा था मुझको, कुछ देर अभी बीती ही थी की ख़ुशबू से सारा घर महक उठा और अब ना रहा गया और वही ज़बान जो कुछ देर पहले चुप रहने की क़सम खा बैठी थी, फ़िसली और सिर्फ़ इतना ही बोल पायी, ये तो शोरबे की महक है, लेकिन जितना ख़ुश था उतना ही हैरान भी, बिना गोश्त के कैसे…और पूछ बैठा…

जवाब सादा था, पका हुआ भी, महक मीठी थी चारों ओर, वो बोली…

जितना तुझे शोरबे से प्यार था, इसको बनाना मेरे लिए उतना ही दर्द भरा था, जितने पैसे होते थे, उतने में बाज़ार से सिर्फ़ हड्डियों पर ज़रा सा चिपका हुआ गोश्त मिलता था, पानी में पका वही बनाती थी, सोचा था कि कभी वो दिन आएगा जब मैं इसे आख़री बार बनाऊँगी…आज वो दिन है…

इतना बोल वो हमेशा के लिए चुप हो गयी…

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