~ फंदा…

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~ फंदा…

आज मैंने ख़ुद से अपनी पहचान ले लीमर गया हूँ मैं, मैंने अपनी जान ले ली,

कैसे बताऊँक्यूँ किया, जो भी कियाकैसे बताऊँक्यूँ जिया, जैसे भी जिया

 

वजह तलाशता रहा ज़िंदगी भर जीने कीमिली एक ख़ूबसूरत, मगर बेवजह निकली,

कल रात भर मकान की छत ताकता रहाज़मीन से कितनी ऊपर है ये नापता रहा

 

देखे मैंने अजीबगरीब मंज़र देखे हैंमखमली हाथों में मैंने खंजर देखे हैं

कुछ मीठे पिए, कुछ कड़वे घूंट पीयेजो बचे थे लम्हे, आज मैंने लूट लिए

 

सारा कसूर वसीयत में अपने नाम कर लियाअपनी सारी यादों को तकसीम कर दिया,

रूह को भी अपनी आज नीलाम कर दियाखाली था खालीपन को कुछ ऐसे भर दिया

 

हवा में हूँ अभी, कुछ देर में रेत हो जाऊंगानिकल रहा हूँ, धीरे धीरे फिसल जाऊंगा,

बस यहाँ से छत की दुरी कम ना पड़ेऔर रस्सी ज़रा सी भी कम ना पड़े

~ शमशान…

 

मेरे घर के रास्ते में शमशान है, 

बेदर्द रोज़ लेता किसी की जान है,

आदमी को मिट्टी में मिला देता है,

सबको उनकी औक़ात दिखा देता है…

 

कभी भीड़ तमाम कभी दो चार आदमी,

बता देता है किसकी कितनी जान-पहचान है,

लौट जाते हैं फिर किसी रोज़ लौट आने को,

भूलना ही पड़ता है सच साँस चलाने को…

 

लटका चेहरा, दर्द गहरा, वक़्त ठहरा सा,

दो चार दिन, कुछ और ग़म, हर कोहरा छट जाता है,

आज किसी अपने को, कल किसी के अपने को,

छोड़ना वहाँ आता है, फिर काम में लग जाता है…

 

शमशान की इस बात पर मगर हँसी आती है,

उसके ठीक सामने एक हस्पताल भी हैं,

वहाँ से जान आती है यहाँ से चली जाती है,

ज़माने भर की फ़िक्र, बीच का का सफ़र, गोल सिफ़र…

 

शमशान के बग़ल में मुर्दाघर भी हैं,

दोनों की आपस में अच्छी बनती हैं,

जो एक में जलती है दूसरे में दफ़नायी जाती है,

राख मिट्टी की फिर मिट्टी में मिलायी जाती है…

 

हस्पताल और दोनों के बीच मैं एक सड़क है,

और एक चाय की दुकान, एक स्कूल, एक मयखाना हैं,

तीनों में एक चीज़ बड़ी अच्छी हैं,

देख लगता हैं वहाँ, दुनियाँ में सिर्फ़ ये तीनों सच्ची हैं…

 

सड़क के दूसरी ओर, इबादत और पूजा घर हैं,

आदमी अन्दर कुछ और बाहर कुछ और होता है,

लूटता है किसी को तो कभी खुद लूट जाता है,

फिर सड़क के उस पार जा चैन की साँस सोता है…

 

~ एक BAR…

Twinkle twinkle little stars,

I see, when I walk out of the bar,

All in pair, broken beyond repair,

no-one gives a thought, forget care…

भैया, दीदी, भूख लगी है कुछ खिला दो,

हमने किसी का क्या बिगाड़ा है, बता दो

 

…here he comes…

 

Trying , walking straight, swaying but didn’t fall,

Pushes himself in the car, he’s okay not drunk at all,

पीछे से वो आवाज़ लगाते है, बुलाते है,

आपके तो यहाँ रोज़ आते है, हम रोज़ भूखे सो जाते है

 

His morning is fine, a little head spin,

vomit maybe or a little puke in the bin,

और वो रात की आवाज़ फिर आती है,

तुम्हें प्यास और भूख हमें रोज़ सताती है

 

Nothing much comes to mind for rest of the day,

Evening, drives his car back to the bar…

ये एक-Bar की बात नहीं, हर bar की कुछ ऐसी ही कहानी है,

भूख निगलतेनिगलते भूख निगल जाती है जिनको, कुछ बच्चे ऐसे भी पलते हैं

~ बूढ़ा…

 

बूढ़ा जो देखन मैं चला, बूढ़ा ना मिल्या कोय,

फिर जो देखी अपनी लाठड़ी, रे मुझसे बूढ़ा ना कोय,

इब के, उठायी अपनी लाठड़ी, मैं चल पड़ो

 

बूढ़ा जो देखन मैं चला, बूढ़ा ना मिल्या कोई,

दो क़दम भी ना चला गयो, रे मुझसे बूढ़ा ना कोई,

लाठड़ी ने किया किनारे, मैं बैठ गयो,

इब के, मँगायी पहियों वाली कुर्सी, मैं रिडक पड़ो

 

बूढ़ा जो देखन मैं चला, बूढ़ा ना मिल्या कोई,

रे पहियों मुझसे ना हिलो, रे मुझसे बूढ़ा ना कोई,

चकराया, सब छोड़ के इब मैं चिल्लाया,

इब के, चारपायी ने मँगवाया, मैं लेट गया

 

चारों बेटन नू किया जमा, लेटे लेटे आँखंन ने मूँद लिया,

ना हाथा मैं ना टांगा में मेरे जान, रे ठीक ठाक सै माहरे कान,

यो ना कहना था, यो कह दिया, बुड़े कानन ने यो सुन लियो,

बूढ़े तू मरता काहे नी, तू मरे ज़मीना बाँटेंगे

 

इब के, चारों लौंडन नू किया जमा, गिरते पड़ते मैं खड़ा हुआ

रे सालों तुमको बड़ा किया, अपने पैरन पे खड़ा किया,

इब बूढ़ा हूँ तो के हुआ, समसान ते लेके जाओं इब,

इस बूढ़े ने तुम जलाओ इब

फिर बैठ ज़मीना लेना बाँट, और मेरी राख ने लेना चाट

~ मरकज़-ए-जाँ…

 

किताबें चारों ओर और बीच में हूँ मैं,

जैसे लहलहाते खेतों में इकलौता पेड़,

जैसे तैरती पतंग तारों के बीचों बीच,

गोल सब, किस तारें से हूँ दूर किसके करीब,

दुनियाँ अजीबो-गरीब और बीच में हूँ मैं…

 

हर पन्ना फड़फड़ा रहा बहती हवा के साथ

मैं किताबों से और किताबें मुझसे करती बात,

हर हर्फ़ उछल उछल बना रहा अपनी ही तान,

कभी किस्सा कभी कहानी सुनते मेरे कान, 

कितने सारे हिस्से मेरे और बीच में हूँ मैं…

 

इधर उधर सीधे खड़े कुछ लेटे, भरे हुए पेन,

कुछ सच्ची कहानियाँ, बाकी कुछ तो हैं वहम,

कुछ आप बीती हैं कुछ जैसे सुनी सुनायीं हैं,

कुछ किताबें पड़ ली हैं कुछ यूँ ही सजायी हैं,

बनावट की सजावट और बीच में हूँ मैं…

 

कुछ किस्से कहानियाँ लिखनी बाक़ी हैं अभी,

दर्द और अभी झेलने होंगे कह पाएंगे तभी,

कुछ टूटे कुछ बिखरे अल्फ़ाज़ समेटने भी हैं, 

कुछ बातें किस्से-कहानी की माला में पिरोनी हैं,

वो एक आखिरी क़िस्सा जिसके बीच में हूँ मैं…

 

~ अख़बार…

 

सुबह की गरम चाय ने आज जैसे ही तलूये को छूआ, इक हलकी सी जलन का एहसास हुआ…

ठीक उतना ही…

जितना दिल का टुकड़ा बचा है, बाक़ी तो सब जला दिया था तुमने…
उतनी जितनी आस बाक़ी छोड़ी थी तुमने, सब उम्मीदें मिटा देने के बाद…

ठीक उतना ही…
जितनी ख़ुशी रह गयी थी यादों में लिपटी, बाक़ी सब तुम्हारे साथ लपेट भेजी थी…
जितना तल्ख़ पर रह गया था स्वाद तुम्हारे होंठों का, बाक़ी सुखी छोड़ दी थी तुमने ज़मीन…

ठीक उतना ही…
जितना सपनों में तुम्हें देखना बाक़ी रहा, तस्वीर तक तो कोई नहीं छोड़ी तुमने…
जितनी फ़िक्र रही तुम्हें मेरी, अपनी सारी फ़िक्र तुम छोड़ गए थे मेरे पास…

बस एक ख़लिश ही मेरी पूरी रही, बाक़ी की ठंडी चाय की तरह, जिसे बड़े ही आराम से सुबह के अख़बार के साथ रोज़ पीती हूँ…

 

~ घड़ी…

 

ये लाज़मी नहीं मेरी हर शय तुमको पसंद आए,

ज़रूरी ये भी नहीं तुम बुलाओ और हम आए,

कुछ ग़म हो कम और ख़ुशियाँ टिके चार दिन,

तुम करों, हम भी करे दुआ की ऐसा भी मौसम आए,

अँधेरें कोने में किसी ऊँची दीवार के मकड़ी का जाल हो,

और उलझनें हमारी उस जाल में जा पकड़ जाए,

इस गए साल में एक आध बार एक बात अच्छी हुई,

कभी तुम हमको, कभी हम तुमको, बेवजह नज़र आये,

याद है तुमने मुझे जो घड़ी दी थी, कब से बंद है पड़ी,

सोच रहा हूँ नए सेल डलवा लूँ, शायद ऐसे ये वक़्त बदल जाये

 

~ शायद, यक़ीनन…

 

एक ज़मीन का टुकड़ा कुछ उखड़ा, था, शायद

दो गज़ लम्बाई, दो हाथ भर चौड़ाई, यक़ीनन

 

बदमस्त हो वहां ज़िन्दगी सो रही थी, शायद

मौत चेहरों पे सिरहाने उसके रो रही थी, यक़ीनन

 

दूर से लगा, कुछ ऐसा वो मंज़र था, शायद

मिटटी में जा मिला मिटटी से वो बना था, यक़ीनन

 

भीड़ थी और कुछ चेहरों पे गीली लकीर थी, शायद,

बाकी रौनक आजा रही, रस्म निभा रही थी, यक़ीनन   

 

ताबूत में अब बस होने को वो बंद था, शायद

आज़ाद छंद था अब वो आज़ाद छंद था, यक़ीनन

~ ग़लतफ़हमी…

 

एक आमलेट और एक चाय, वहाँ सामने बैठा हूँ, वहीं ले आए, अगर कहें तो आकर ले जाऊँ, थका हूँ थोड़ा हो सके तो वहीं पहुँचाए, चाय अच्छे से उबालना और हाँ कभी कोई ग़लतफ़हमी ना पालना…

कल दुकान नहीं खोली थी, सब ठीक है या तबियत ढीली थी, ये क्या चाय के दाम बड़ा दिए, पराँठा तो बड़ा ही छोटा बनाया है, उसका दाम शायद इसीलिए नहीं बढ़ाया है, निम्बू पानी बंद कर दिया लग रहा है, निम्बू महंगे हो गए या कोई पीता नहीं, ग़लतफ़हमी पाल कोई ज़्यादा जीता नहीं…

आज गरमी भी बहुत है, शायद बरसात भी होगी, दिन में काली सी जैसे रात भी होगी, दूध उबल रहा है, आँच धीमी कर दो और नमक का डिब्बा ख़ाली है भर दो, धनिया सूख रहा है, पानी छिड़क दो, तवा भी काला हो गया है, रगड़ देना जब धोने लगो, वो गिलास टूटा है जो सामने रखा है, ग़लतफ़हमी से हर रिश्ता बीच राह ही छूटा है…

कितना हुआ पूछूँगा नहीं, जितना है लिख लो हिसाब में, अपनी लाल किताब में, पिछले महीने एक हज़ार दिए थे उसमें से १३० रुपए निकलते हैं, इस महीने हिसाब में कम कर लेना उतना, बात करने से कम होती है ग़लतफ़हमी बस समझो इतना…

 

 

~ कालविस्र्द्ध…

 

एक हुजूम का हिस्सा है; आदमी नहीं जैसे कोई किस्सा हैं

टेबल का टुटा पैर या कुर्सी की टूटी हुई बाँह,

अखबार का अनपड़ा इश्तहार या जगह भरती खबर बेकार,

घड़ी की सबसे लम्बी सुई या पुरानी रजाई की रुई जैसे,

टूटे मुँह वाले चाय का गिलास या बीते फैशन का लिबास,

खुद से भी कितना दूर है, ना जाने किसके पास हैं… 

 

भरी कॉपी है कोई या किताब के आखिरी पन्ने में रखा बुकमार्क,

सर्दियों में फ्रिज में बेकार जमी बर्फ या बड़े चेक वाला स्कार्फ़,

पुराने पर्स में रखा फटा हुआ नोट या पुरानी चोट का निशान,

ज़मीन जिसकी सारी बिक गयी खोखली ज़मींदारी की शान,

सोलह अगस्त की जैसे पतंग, सोच सोच कर हूँ मैं दंग

 

मोटी निब का पेन जैसा कोई या खाली लाल रिफिल सा है,

वो चश्मा है गोल सा जिसकी उम्र आँखों से भी हो बड़ी,

तीन पहिये वाली साईकिल जैसे बच्चे से छोटी हो, कोने में पड़ी,

बची हुई उन का ज़रा सा गोला कोई और कोई बड़ा ही भोला यहाँ,

बेज़ार कहो, बेकार कहो, उसे अपनी ही हालत का शिकार कहो

 

दादी की सफ़ेद चीनी वाली कटोरी कोई, कोई बिना धार की छुरी,

साठ मिनट की ऑडियो कैसेट कोई और कोई टेप रिकॉर्डर सा है,

बिन पानी के सूखा नल सा तो कोई भुलाबिसरा कल सा है,

ब्लैक एंड वाइट कैमरा कोई और कोई धूल चढ़ी तस्वीर,

वक़्त का चक्र पीस देता हर सब्र

सब हुजूम का हिस्से है; जो गयी बीत उस ज़रूरत के किस्से हैं