~ दिवाली…

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अभीअभी गयी दिवाली है

दिए जलें और लोग गले मिलें,

घरो में खुशियों की मन्नते मांगी गयी,

तर्रक्की और धन की वर्षा हो,

ये सोच हुआ घमासान पूजा पाठ,

उनके यहाँ जिनके है मस्त ठाठ

 

देख ये सब मातालक्ष्मी हुई कुछ हैरान,

और निकाला बहीखाता, हिसाब किताब देख गयी चौंक,

जो दिए बेच रहा था, वो जलाता नहीं,

जो मिठाई बना रहा था, वो खाता नहीं,

जो बेच रहा था पटाखे लड़िया, अँधेरी थी उसकी गलियाँ,

मोमबत्ती सा दिल, गया पिघल और सोच को उनकी लगा धक्का

 

कौन खरीद रहा था दिये, मिठाई और पटाखे ?

कौन बुला रहा था मुझे पूजा पाठ करवाके ?

सब कुछ तो है इनके पासऔरका क्या करेंगें ?

घोर अन्याय, सोचने लगी इसका क्या उपाय है,

 

लगाया ध्यान तो जली बत्ती

 

ये तो निचे बैठे बस लकीरें खींचते ही रहेंगे,

और मांगते रहेंगे – “और” “थोड़ा और” “थोड़ा बहुत और“,

सोच समझ कर विचार, किया तय,

इस दिवाली जिसे असल में है मेरी ज़रूरत, वहीँ जाउंगी,

ये ऊंचनीच का फ़ासला मेरी ही वजह से है,

इसे मैं ही मिटाऊँगी

 

Disclaimer >>

ये पुलाव सिर्फ ख़याली हैंअगले साल फिर दिवाली हैहोना फिर यही सब हर साल हैसोचने को अच्छा मगर ख्याल है… 

~ साये…

 

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साये ये रात के साये,

कहाँ ले आए हमें ये रात के साये,

घनेरे कलेरे डरे डरे से ये घबराये,

ओड़ चादर फटी ये ठुकराये,

ये साये रात के

 

बिना बात कभी पीछे पड़े,

धुआँ उड़ाते, चेहरा छुपाते, लड़खड़ाते,

गिरते गिरते से, सम्भलते से, डगमगाते,

दूर से झाँकते, क़रीब आ सो जाते,

हाय ये राते के साये

 

एक सच को छिपाए हुए,

बिन बुलाये ये आये हुए,

एक मरियल लकीर से, फ़क़ीर से,

भूख से लिपटे, कालिख से चिपटे,

ये काले काले साये

 

आमने, सामने, घूमते गोल गोल,

कभी बैठे, कभी खड़े, मुँह खोल,

जैसे अभी ये जाएँगें निगल,

वो पहली किरण, इनका आख़िरी शंड़,

और रह जाती ना जाने वाली, काली रात

 

हाय, ये काली के रात के साये

~ इत्तफ़ाक़…

Coincidence

Picture Credit : Google Images

 

पड़ गया मेरे आराम में आज फिर खलल पड़ गयाफिर बैठे बैठे हुआ खड़ा आज फिर मन बदल गया,

चलने ही वाला था पर जैसे ही उठाया पहला कदमपिछले वाला अगले वाले से बेवजह ही लड़ गया

 

नीली पतलून, पिली क़मीज़ अंदर सफ़ेद बनियानजूता पहना भुला जुराब, साली किस्मत है ही ख़राब,

घुमा, मुड़ा और जैसे तैसे चल पड़ा देखा बटुआ पड़ाकिसका है ? मेरा तो हैं नहीं, बटुआ था तस्वीरों भरा

 

कल ली थी रेल की टिकट घूमने जाने को कहींजाने क्यों अब कहीं जाने का बिलकुल मन नहीं,

क्या करूँ, क्या नहीं, फाड़ा टिकट उतारी जैकेट,  उतारा जैसे ही जैकेट गिरा उसमें से एक पैकेट

 

पैकेट में थी नाटक की टिकट, नाटकइत्तफ़ाक़”, डिरेक्टर बेबाक़, ऐक्टर तपाक, क्रू फटफट फ़टाक,

ऑडीयन्स में भी जोश था, बस, दरबान ख़ामोश थापूछा तो बोला, बेटा था ना रहा, तस्वीरें थी अब वो भी नहीं

 

याद है ? बटुआ तस्वीरों से भरा, उठाया था, बताना भुल गयाउसकी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा, होश था अब जोश था,

बेटा, उसका लड़खडाता था, ठीक से चल ना पाता थाशौंक उसे सिर्फ़ तस्वीरों का था, “इत्तफ़ाक़ये तक़दीरों का था

~ सहेली…

~ सहेली

~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~

मोहे इश्क़ हुआ ज़रा धीरे से,

धीरे धीरे से तेरे वीरे से,

इक काम करा दे मेरा,

ले चल कल उसे तू मेले में,

मिलवा दे मुझे तू अकेले में,

तू है ना मेरी पक्की वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

मेरा दिल अब ना मेरे क़ाबू में,

नैन मेरे, रस्ते पे अड़े,

थक गयी अब मैं खड़े खड़े,

इक बार मुझे मिलवा दे ना,

नाल उसदे मुझे बिठा दे ना,

ओ मेरी पक्की वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

मैं रात से बुझी बुझी सी हूँ,

ना भूख मुझे ना प्यास लगे,

कभी दिल अटके कभी साँस रुके,

अंकल को ससुर बनवा दे ना,

मम्मी को सास बनवा दे ना,

ओ तू मेरी पक्की वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

मैं बावरी हो के नचड़ा

मैं हुँड नहीयो है बचना,

जग झूठा लगे वो सच-ना,

तेरा वीरे विच दिखे मुझे सजना,

मैं बस उस वास्ते है सजना,

हायों मेरी पक्की वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

तू मेरी पक्की वाली सहेली है,

बचपन से साथ तू खेली है,

मेरी डोली घर बुलवा दे ना,

अपड़े वीरे से अन्ख लड़वा दे,

अपने घर मेरा घर वसावा दे,

ओ मेरी सच्ची वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

~ फंदा…

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~ फंदा…

आज मैंने ख़ुद से अपनी पहचान ले लीमर गया हूँ मैं, मैंने अपनी जान ले ली,

कैसे बताऊँक्यूँ किया, जो भी कियाकैसे बताऊँक्यूँ जिया, जैसे भी जिया

 

वजह तलाशता रहा ज़िंदगी भर जीने कीमिली एक ख़ूबसूरत, मगर बेवजह निकली,

कल रात भर मकान की छत ताकता रहाज़मीन से कितनी ऊपर है ये नापता रहा

 

देखे मैंने अजीबगरीब मंज़र देखे हैंमखमली हाथों में मैंने खंजर देखे हैं

कुछ मीठे पिए, कुछ कड़वे घूंट पीयेजो बचे थे लम्हे, आज मैंने लूट लिए

 

सारा कसूर वसीयत में अपने नाम कर लियाअपनी सारी यादों को तकसीम कर दिया,

रूह को भी अपनी आज नीलाम कर दियाखाली था खालीपन को कुछ ऐसे भर दिया

 

हवा में हूँ अभी, कुछ देर में रेत हो जाऊंगानिकल रहा हूँ, धीरे धीरे फिसल जाऊंगा,

बस यहाँ से छत की दुरी कम ना पड़ेऔर रस्सी ज़रा सी भी कम ना पड़े

~ Ecliptic…

~ Ecliptic…

 

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Let’s meet in Autumn,

When the leaves are leaving home…

Or let’s meet soon after that;

When the trees are naked…

Or may be a further after;

When they play a snowman wearing a white blanket…

Or how about one more step ahead;

When they are covered with glittery green colours…

 

But why do we need a season?

 

let’s just meet without any reason…

Let’s follow the ecliptic path;

perfectly like Sun follows Earths spark…

You and me, we should just meet,

to create memories in every season, let that be the reason…

Let’s live moments and memories;

and create a lore, let’s just meet more, more and more…

~ आलोचना…

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~ आलोचना

जब करो तुम कोई वजह से किसी की भी आलोचना,

रोक लेना जिह्वा को अपनी और दिल से इतना सोचना

 

की तुम में कितनी खूबियां है तुम में कितने दोष हैं,

लेना पकड़ कोना कोई और आँखों को अपनी मूँद कर,

अपनी सिमटी समझ की खिड़कियों को देना खोल तुम,

और सोचना, उठा भी पाओगे क्या अपनी कमीयों का तोल तुम

 

कितना आसान चीनीनुक्ता और अपनी कथनी को कहना पुख्ता,

है बड़ा कठिन सुनना लगा कान और अपनी गलती को लेना मान,

इक धक्का सा लग जाता है जब दोष कोई गिनवाता है,

अपने दोषों की गठरी छुपाने को अफवाहें फिर फैलाता हैं

 

ये अफवाहेंसुखी, तीखी, लाल मिर्च सी होती है,

और हवा का रुख जब पलटता अपनी ही आँखें रोती हैं,

तेरा जायेगा तेरे संग और तू अपने करम की ही खायेगा,

कर के दूजों की बुरीभली तू किसी की आँख ना भायेगा

 

वो जो इधर उधर की खाता है और अफवाहें फैलाता है,

वो किसी का कैसे हो सकता हैं जो बातों की आग लगाता हैं,

ये जिव्हा, गुड़मिश्री की ढेली हैं ये तेज़तीखी तलवार भी है,

ये कड़वा ज़हर का घूँट कभी और करोड़ों का व्यापार भी हैं

 

रोक लेना जिह्वा को अपनी बस दिल से इतना सोचना,

करने लगो आलोचना, अब जो करने लगो आलोचना…

 

Picture : Google Images

~ शमशान…

 

मेरे घर के रास्ते में शमशान है, 

बेदर्द रोज़ लेता किसी की जान है,

आदमी को मिट्टी में मिला देता है,

सबको उनकी औक़ात दिखा देता है…

 

कभी भीड़ तमाम कभी दो चार आदमी,

बता देता है किसकी कितनी जान-पहचान है,

लौट जाते हैं फिर किसी रोज़ लौट आने को,

भूलना ही पड़ता है सच साँस चलाने को…

 

लटका चेहरा, दर्द गहरा, वक़्त ठहरा सा,

दो चार दिन, कुछ और ग़म, हर कोहरा छट जाता है,

आज किसी अपने को, कल किसी के अपने को,

छोड़ना वहाँ आता है, फिर काम में लग जाता है…

 

शमशान की इस बात पर मगर हँसी आती है,

उसके ठीक सामने एक हस्पताल भी हैं,

वहाँ से जान आती है यहाँ से चली जाती है,

ज़माने भर की फ़िक्र, बीच का का सफ़र, गोल सिफ़र…

 

शमशान के बग़ल में मुर्दाघर भी हैं,

दोनों की आपस में अच्छी बनती हैं,

जो एक में जलती है दूसरे में दफ़नायी जाती है,

राख मिट्टी की फिर मिट्टी में मिलायी जाती है…

 

हस्पताल और दोनों के बीच मैं एक सड़क है,

और एक चाय की दुकान, एक स्कूल, एक मयखाना हैं,

तीनों में एक चीज़ बड़ी अच्छी हैं,

देख लगता हैं वहाँ, दुनियाँ में सिर्फ़ ये तीनों सच्ची हैं…

 

सड़क के दूसरी ओर, इबादत और पूजा घर हैं,

आदमी अन्दर कुछ और बाहर कुछ और होता है,

लूटता है किसी को तो कभी खुद लूट जाता है,

फिर सड़क के उस पार जा चैन की साँस सोता है…

 

~ तज़रबा…

 

बात निकली है जो तज़रबे की,
मेरा भी है तज़रबा ज़िंदगी जीने का,
ख़ून रगों में कुछ ऐसे भी सुख जाता है,
जिनको तज़रबा है ख़ून का घूँट पीने का…

मैं कोई ज़रूरत तो नहीं जो पूरी हो जाऊँगा,
तज़रबा हूँ, और वक़्त के साथ ही आऊँगा,
जो दो पल में ज़िंदगी भर का तज़रबा माँगों,
रात ख़्वाब में आऊँगा, सुबह फुर्र हो जाऊँगा…

कभी बेअदबी, कभी बड़े अदब से आता हूँ,
तज़र्बा हूँ, और बड़ा ही तज़रबेदार तज़र्बा हूँ,
और इस बात का, मुझमें कोई गुमान नहीं है,
अपने सयानेपन का ढोल नहीं बजाता हूँ…

सुनता हूँ रोज़ न मालूम कितनो से, की,
सालों का तज़र्बा है, सालों का तज़र्बा हैं,
जाके कहदो कोई ऐसे सालों से, बवालों से,
मैं सालों का मोहताज नहीं, जो कल था वो आज नहीं हैं…

वो चूल्हा ना रहा जो कल रोटी पकाता था,
वो कल भी ना रहा, जब कोई घर मिलने आता था,
बूढ़े अब बाइक चला रहे हैं, और आपके “RIP” पर लाइक्स आ रहे हैं,
मश्वरा हैं, अपने तजर्बे का आप अचार डालें और खुद ही खालें…

…मेरे तजर्बे से बस इतना सा कहना है…

तज़र्बा हैं तो जी लें खुद, और औरों को भी जीने दें,
आप नहीं पीते तो जिसको पीनी है पिने दें,
किसे के आचरण का विवरण आपका काम नहीं हैं,
आदमी हैं आदमी ही रहें आप भगवान नहीं हैं…

 

 

~ एक BAR…

Twinkle twinkle little stars,

I see, when I walk out of the bar,

All in pair, broken beyond repair,

no-one gives a thought, forget care…

भैया, दीदी, भूख लगी है कुछ खिला दो,

हमने किसी का क्या बिगाड़ा है, बता दो

 

…here he comes…

 

Trying , walking straight, swaying but didn’t fall,

Pushes himself in the car, he’s okay not drunk at all,

पीछे से वो आवाज़ लगाते है, बुलाते है,

आपके तो यहाँ रोज़ आते है, हम रोज़ भूखे सो जाते है

 

His morning is fine, a little head spin,

vomit maybe or a little puke in the bin,

और वो रात की आवाज़ फिर आती है,

तुम्हें प्यास और भूख हमें रोज़ सताती है

 

Nothing much comes to mind for rest of the day,

Evening, drives his car back to the bar…

ये एक-Bar की बात नहीं, हर bar की कुछ ऐसी ही कहानी है,

भूख निगलतेनिगलते भूख निगल जाती है जिनको, कुछ बच्चे ऐसे भी पलते हैं