~ दिवाली…

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अभीअभी गयी दिवाली है

दिए जलें और लोग गले मिलें,

घरो में खुशियों की मन्नते मांगी गयी,

तर्रक्की और धन की वर्षा हो,

ये सोच हुआ घमासान पूजा पाठ,

उनके यहाँ जिनके है मस्त ठाठ

 

देख ये सब मातालक्ष्मी हुई कुछ हैरान,

और निकाला बहीखाता, हिसाब किताब देख गयी चौंक,

जो दिए बेच रहा था, वो जलाता नहीं,

जो मिठाई बना रहा था, वो खाता नहीं,

जो बेच रहा था पटाखे लड़िया, अँधेरी थी उसकी गलियाँ,

मोमबत्ती सा दिल, गया पिघल और सोच को उनकी लगा धक्का

 

कौन खरीद रहा था दिये, मिठाई और पटाखे ?

कौन बुला रहा था मुझे पूजा पाठ करवाके ?

सब कुछ तो है इनके पासऔरका क्या करेंगें ?

घोर अन्याय, सोचने लगी इसका क्या उपाय है,

 

लगाया ध्यान तो जली बत्ती

 

ये तो निचे बैठे बस लकीरें खींचते ही रहेंगे,

और मांगते रहेंगे – “और” “थोड़ा और” “थोड़ा बहुत और“,

सोच समझ कर विचार, किया तय,

इस दिवाली जिसे असल में है मेरी ज़रूरत, वहीँ जाउंगी,

ये ऊंचनीच का फ़ासला मेरी ही वजह से है,

इसे मैं ही मिटाऊँगी

 

Disclaimer >>

ये पुलाव सिर्फ ख़याली हैंअगले साल फिर दिवाली हैहोना फिर यही सब हर साल हैसोचने को अच्छा मगर ख्याल है… 

~ इत्तफ़ाक़…

Coincidence

Picture Credit : Google Images

 

पड़ गया मेरे आराम में आज फिर खलल पड़ गयाफिर बैठे बैठे हुआ खड़ा आज फिर मन बदल गया,

चलने ही वाला था पर जैसे ही उठाया पहला कदमपिछले वाला अगले वाले से बेवजह ही लड़ गया

 

नीली पतलून, पिली क़मीज़ अंदर सफ़ेद बनियानजूता पहना भुला जुराब, साली किस्मत है ही ख़राब,

घुमा, मुड़ा और जैसे तैसे चल पड़ा देखा बटुआ पड़ाकिसका है ? मेरा तो हैं नहीं, बटुआ था तस्वीरों भरा

 

कल ली थी रेल की टिकट घूमने जाने को कहींजाने क्यों अब कहीं जाने का बिलकुल मन नहीं,

क्या करूँ, क्या नहीं, फाड़ा टिकट उतारी जैकेट,  उतारा जैसे ही जैकेट गिरा उसमें से एक पैकेट

 

पैकेट में थी नाटक की टिकट, नाटकइत्तफ़ाक़”, डिरेक्टर बेबाक़, ऐक्टर तपाक, क्रू फटफट फ़टाक,

ऑडीयन्स में भी जोश था, बस, दरबान ख़ामोश थापूछा तो बोला, बेटा था ना रहा, तस्वीरें थी अब वो भी नहीं

 

याद है ? बटुआ तस्वीरों से भरा, उठाया था, बताना भुल गयाउसकी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा, होश था अब जोश था,

बेटा, उसका लड़खडाता था, ठीक से चल ना पाता थाशौंक उसे सिर्फ़ तस्वीरों का था, “इत्तफ़ाक़ये तक़दीरों का था

~ सहेली…

~ सहेली

~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~

मोहे इश्क़ हुआ ज़रा धीरे से,

धीरे धीरे से तेरे वीरे से,

इक काम करा दे मेरा,

ले चल कल उसे तू मेले में,

मिलवा दे मुझे तू अकेले में,

तू है ना मेरी पक्की वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

मेरा दिल अब ना मेरे क़ाबू में,

नैन मेरे, रस्ते पे अड़े,

थक गयी अब मैं खड़े खड़े,

इक बार मुझे मिलवा दे ना,

नाल उसदे मुझे बिठा दे ना,

ओ मेरी पक्की वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

मैं रात से बुझी बुझी सी हूँ,

ना भूख मुझे ना प्यास लगे,

कभी दिल अटके कभी साँस रुके,

अंकल को ससुर बनवा दे ना,

मम्मी को सास बनवा दे ना,

ओ तू मेरी पक्की वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

मैं बावरी हो के नचड़ा

मैं हुँड नहीयो है बचना,

जग झूठा लगे वो सच-ना,

तेरा वीरे विच दिखे मुझे सजना,

मैं बस उस वास्ते है सजना,

हायों मेरी पक्की वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

तू मेरी पक्की वाली सहेली है,

बचपन से साथ तू खेली है,

मेरी डोली घर बुलवा दे ना,

अपड़े वीरे से अन्ख लड़वा दे,

अपने घर मेरा घर वसावा दे,

ओ मेरी सच्ची वाली सहेली, सुलझा दे मेरे दिल की पहेली,

मिलवा दे ना, मिलवा दे ना…

~ फंदा…

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~ फंदा…

आज मैंने ख़ुद से अपनी पहचान ले लीमर गया हूँ मैं, मैंने अपनी जान ले ली,

कैसे बताऊँक्यूँ किया, जो भी कियाकैसे बताऊँक्यूँ जिया, जैसे भी जिया

 

वजह तलाशता रहा ज़िंदगी भर जीने कीमिली एक ख़ूबसूरत, मगर बेवजह निकली,

कल रात भर मकान की छत ताकता रहाज़मीन से कितनी ऊपर है ये नापता रहा

 

देखे मैंने अजीबगरीब मंज़र देखे हैंमखमली हाथों में मैंने खंजर देखे हैं

कुछ मीठे पिए, कुछ कड़वे घूंट पीयेजो बचे थे लम्हे, आज मैंने लूट लिए

 

सारा कसूर वसीयत में अपने नाम कर लियाअपनी सारी यादों को तकसीम कर दिया,

रूह को भी अपनी आज नीलाम कर दियाखाली था खालीपन को कुछ ऐसे भर दिया

 

हवा में हूँ अभी, कुछ देर में रेत हो जाऊंगानिकल रहा हूँ, धीरे धीरे फिसल जाऊंगा,

बस यहाँ से छत की दुरी कम ना पड़ेऔर रस्सी ज़रा सी भी कम ना पड़े

~ Ecliptic…

~ Ecliptic…

 

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Let’s meet in Autumn,

When the leaves are leaving home…

Or let’s meet soon after that;

When the trees are naked…

Or may be a further after;

When they play a snowman wearing a white blanket…

Or how about one more step ahead;

When they are covered with glittery green colours…

 

But why do we need a season?

 

let’s just meet without any reason…

Let’s follow the ecliptic path;

perfectly like Sun follows Earths spark…

You and me, we should just meet,

to create memories in every season, let that be the reason…

Let’s live moments and memories;

and create a lore, let’s just meet more, more and more…

~ आलोचना…

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~ आलोचना

जब करो तुम कोई वजह से किसी की भी आलोचना,

रोक लेना जिह्वा को अपनी और दिल से इतना सोचना

 

की तुम में कितनी खूबियां है तुम में कितने दोष हैं,

लेना पकड़ कोना कोई और आँखों को अपनी मूँद कर,

अपनी सिमटी समझ की खिड़कियों को देना खोल तुम,

और सोचना, उठा भी पाओगे क्या अपनी कमीयों का तोल तुम

 

कितना आसान चीनीनुक्ता और अपनी कथनी को कहना पुख्ता,

है बड़ा कठिन सुनना लगा कान और अपनी गलती को लेना मान,

इक धक्का सा लग जाता है जब दोष कोई गिनवाता है,

अपने दोषों की गठरी छुपाने को अफवाहें फिर फैलाता हैं

 

ये अफवाहेंसुखी, तीखी, लाल मिर्च सी होती है,

और हवा का रुख जब पलटता अपनी ही आँखें रोती हैं,

तेरा जायेगा तेरे संग और तू अपने करम की ही खायेगा,

कर के दूजों की बुरीभली तू किसी की आँख ना भायेगा

 

वो जो इधर उधर की खाता है और अफवाहें फैलाता है,

वो किसी का कैसे हो सकता हैं जो बातों की आग लगाता हैं,

ये जिव्हा, गुड़मिश्री की ढेली हैं ये तेज़तीखी तलवार भी है,

ये कड़वा ज़हर का घूँट कभी और करोड़ों का व्यापार भी हैं

 

रोक लेना जिह्वा को अपनी बस दिल से इतना सोचना,

करने लगो आलोचना, अब जो करने लगो आलोचना…

 

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~ कान्हा…

~ कान्हा

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“केवल कर्म करना ही मनुष्य के वश में है, कर्मफल नहीं”

मैय्या मोरी मैं नहीं माखन खायो

मैय्या मोरी मैं नहीं माखन खायो

सच बोलूँ  हूँ,

सब सखा गवाल रै मिलके मोहे सताए,

सब बोलें, तू गोपियाँ का प्यारा,

वो तेरे कहें से आएँ, तेरे ही कहें से जाए

ले मान ज़रा हमरा कहना, दे गोपियाँ ने ज़रा बुलायें,

वो जाती राधा के संग, उम्मे एक आध हमें भी भा जाए,

तेरा क्या जाए, चल दे तू उन्हें बुलाये

जे तू करदे इत्ता सा काम, हम तोहरा ना नाम लगायें,

जो तू मुकरे, ना सुने हमरी, सब मिलके तोहे फंसाये,

सब तोहरा ही नाम लगायें, के कान्हा ही माखन खाये

हम पकड़ तुझे सब मिल जुल के, तोरे मुख पे माखन लगायें,

और फोड़ के माखन के मटकी, सब मिल के शोर मचाएँ,

कान्हा ही माखन खाये, कृष्णा ही माखन खाये

मय्या सच बोलूँ हूँ, तोसे झूठ ना बोला जाए,

हम ना गोपियाँ ने बुलाये, मैय्या हम ना नार सताये,

जो लगे तो हमपे लग जाये, कोई झूठा इल्ज़ाम लगाये,

मैय्या हम ना नार सताये,

मैय्या हम ना माखन खाए,

सच-मुच् हम नहीं माखन खायो,

मैय्या मोरी मैं नहीं माखन खायो…

~ ऐब…

~ ऐब…

चलो आपबीती सुनाता हूँ तुम्हारा दिल बहलाता हूँ,
ऐसे वैसे जला हूँ मैं तो थोड़ा तुम्हें भी जलाता हूँ…

मेरे सपनों में रोज़ाना एक कली खिला है करती,
तुम ज़रा मुस्कुराओ तो मैं इक गुलाब खिलाता हूँ…

निकल जाना तो है आसान मैं थोड़ा और उलझाता हूँ,
तुम ठुकराओ चलो मुझको तुम्हें मैं फिर मुँह लगाता हूँ…

तुम्हारे बालों का ये गुच्छा तुम्हारे गालों की लाली,
कभी बालों को सहलाऊँ कभी गालों से गाल लगाता हूँ…

तुम कंधे पे रखना सिर मैं सिर से सिर मिलाता हूँ,
जो लगे जहान है सुना-सुना रुको मैं कुछ गुनगुनाता हूँ…
“के तू किसी रेल सी गुज़रती है…”

और उसपर…
आधी रात हो झमाझम बरसात हो पानी पानी चारों ओर,
तुम हिलना मत तुम्हें बाहों में ले के मैं तुम्हारे संग नहाता हूँ…

मुझे तुम याद रखना बस जैसे भी तुम्हें मैं याद आता हूँ,
शराफ़त छोड़ दो अब तुम मैं तुम्हारा ऐब बन जाता हूँ…

~ आँच…

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सुनो आँच ज़रा धीमी कर दो, चावल देर से पकेंगे,

और हम कुछ और देर तलक साथ लिपट लेंगे

कुछ कहना नहीं, आज तुमने फिर पाज़ेब को पहना नहीं,

चावलों को धीरेधीरे पकने दो, कुछ और देर सर रखने दो

थोड़ा सा होंठों में फाँसला करो, जो जगह मिलेगी,

आज कच्चे चावल खिला देना, मेरे होठों को चबा देना

बीचबीच में आँखें मुँदना, आज चावलों का पानी पिला देना,

तुम कूदना और मुझे फाँदने की वजह देना

आज ख़्वाब सज़ा लेते है, रहने दो चावल, रात भर पका लेते है,

पकने दो उन्हें भी, जगने दो हमें भीसहर तक, दोपहर तक

 

~ 377…

 

The rights of minority have been, since long, in the hands of majority. And then consciousness sweeps in and comes the change, roles reverse and a new majority is formed, things get repeated. Lectures of morality are given to a new minority. Humans, the thinking brains are tamed and controlled.

Nature, which has been there since time immortal has sustained untamed and it does not discriminate between the majority or the minority.

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