~ Cham Cham Chew…

I chew, chew; Cham Cham chew,

Sometime Cham then squeak, rumble and whomp; yes I chew…

 

I Chewed the nails; while in my deep thoughts,

The  end of a pencil; to solve a puzzle…

 

I Chewed few books ; om nom nom some I tasted,

some swallowed and some I digested…

 

I chewed Tobacco and a pipe;when my world was wild and ripe,

Once I met a whore; chewed her brains as I chewed her soul…

 

I even chewed my thoughts,

Wondered, pondered  till my body soared with adrenaline rush…

 

Next time you find me chewing, remember!

do not chastise me; after all, it is my body at work…

 

Knowing that chewing helps thinking,when the thinking gets hard;

I chew, chew; Cham Cham chew…

I chew my brain…

~ Shhh…

Yellow light, passing through pellucid crystal glass,

the serenity and sound of silence, hallelujah!..the Shhh…

 

Flimsy air, a delicate fondle, touched her hair,

the morning herd, Sunday prayer, mass…the Shhh…

 

Magically orchestrated, brick by brick, her body,

two awning windows, bordered red, lips…the Shhh…

 

An elbow prod, the tingle the prickle, a silent moan,

latched eyes, stripped we canoodled, drip…the Shhh…

 

Hazelnut eyes, fiery touch, cuddled sheets,

light shimmered on her, we screamed, more…and the Shhh…

~ हस्ब-ए-ज़रूरत…

 

भरी महफ़िल में सिर्फ़ मेरा जाम ख़ाली है,
ये कैसी खुन्दक तुमने सरेआम निकाली है…

दो चार को जानता हूँ बाकी चेहरे नए हैं,
बिन बुलाये आये हैं या सब बुलाये गए हैं…

हमको तो लगा घर आना है हम वैसे ही आ गए,
ये कुछ खास हैं जो सब चमक-धमक के आ गए…

अर्रे वाह, वहाँ तो खूब दस्तरख्वान सजाया है,
लगता है तुमने हमें यूँ ही ज़बरदस्ती बुलाया है…

आज देखा दरवाज़े पर तुमने मेहमान-नवाज़ी की,
हमसे क्या खता हुई जो हमसे नज़र-अंदाज़ी की…

सुना था तुम्हारे मेहमानों को कानों-कान फुसफुसाते,
कि दोस्त भी अब तुम बिना मतलब के नहीं बुलाते…

बता देते तो हम गुज़रे सालों के एल्बम उठा लाते,
शायद ऐसे ही हम महफ़िल में तुम से मिल पाते…

सुना था “आप कहें और हम ना आए ऐसे तो हालात नहीं”
लगता गलती से है न्योता भेजा, अब वैसी कोई बात नहीं…

 

~ ज़ोहरा…

 

इक शोख़ हसीना थी, बड़ी पूर-ज़ौक़ हसीना थी,

आँखे मुंदू तो नज़र आती, खोलूँ तो कहीं ना थी…

 

इक हादसा हो जैसे कहीं भी दिख जाती थी,

जो ज़हमत उठा धूँडू तो वो गुज़रा महीना थी…

 

काग़ज़ पे कलम सी बिखरती थी वो बड़ी ही खूब,

वो थी स्याही की बोतल जिसमें जाता था मैं डूब…

 

वो नीचे से ऊपर ज़मीन को आसमान से मिलाती थी,

मैं बैठा पेड़ की छाओ में, वो परछाई मेरी बन जाती थी…

 

वो ज़ेहरा थी, वो ज़ोहरा थी, वो चाँद थी हीरा पन्ना थी,

मुझे मिलती थी मेरे ख़्वाबों में, वो मेरी तमन्ना थी…

 

वो मिली नहीं मुझको वो गुम है, वो गुमशुदा है,

ढूँढो उसे मिलवाओ मुझसे, वो मुझसे जुदा है…

 

मैं हूँ मंतो सा बावरा वो मेरी अल्हड़ इसमत है,

मैं हूँ इक फूटे घड़ा सा वो मेरी मुकम्मल क़िस्मत है…

~ तस्वीर…

माँ कल मुझे इक खिलोना दिला देना,

कल ईद भी है कुछ मीठा भी बना देना

सुबह ठंड भी होती है तुम मुझे अभी नहला देना,

कल भूल गयी थी, जो सोने लगूँ मेरे बालों को सहला देना

और फिर आने को फ़ूफ़ी का निकाह है नयी पोशाक लेनी है,

इस बार ना पहनूँगा वो जो पहले भी पहनी है

एक बात और थी, कुछ पूछना था तुमसे,

सब छेड़ते है मुझको अब्बू का नाम बता दो,

वो जो देख के रोती हो वो तस्वीर दिखा दो

~ ?…

ख़ुश तो बहुत होंगे आज तुम,

मैंने सारे सवाल निकाल दिए,

 

मगर तुमने जवाब किसी एक का भी नहीं दिया,

वैसे, अच्छा ही किया जो तुमने जवाब नहीं निकाले,

निकाल देते तो ख़ाली हो जाता रिश्ता हमारा…

 

मेरे ख़याल से,  तुम जवाब किसी काग़ज़ पे लिख दो,

और रोज़ सिर्फ़ एक जवाब पड़ना, देखना ज़रा कैसा लगता है?

कुछ हो, तो समझ लेना जवाब सच्चा था,

नहीं तो, समझ जाना तुम्हारी सच चुराने की आदत अभी भी गयी नहीं है…

 

और, मेरी फ़िक्र ना करना, मेरा किसी से ज़िक्र ना करना,

मैं तो ख़ाली भी हो चुका हूँ,

और को भरने के लिए एक ही काम करता हूँ,

याद है हमारे दो गिलास, अब…मैं दोनों अपने लिए भरता हूँ…

 

कल जब मैं अपना गिलास और ख़ुद को भर रहा था,  तो एक सवाल ना जाने कहाँ से तैरता हुआ उभर आया, शायद रह गया था  ज़हन के किसी कोने डुबा हुआ…

मैं भी हँसा शायद आज गिलास ज़्यादा भर लिया है, सवाल उठ कर ऊपर तक जो आ पहुँचा जो था…

और सवाल था…वक़्त क्या है?

तुम तो बहुत पड़ते हो, तुमने ज़रूर पड़ा होगा, शायद तुम पहले से ही जानते भी होंगे…

 

तुम्हारे मेरे साथ होने ओर ना होने के बीच में जो गुज़रता नहीं है ना…वो वक़्त है…

~ तहखाना…

जो हमसे मिलना है तो कभी तहखाने में आओ, आओ कभी मेरे मयखाने में आओ,

वहाँ सूरज की रोशनी नहीं हैं, तीन चराग हैं, आओ एक और चराग जलाओ,

शब्रात में चार चाँद लगाओ, तुम आओ तो सही, चले आओ

 

और हाँशर्म, हया का कुर्ता बाहर ही टाँग आना, हम ख़ुशी से ढक देंगे,

ना झिकको आजाओ, तहखाने की हालत यूँ तो ख़राब रहती है,

और न बिगड़े इसिलए वहाँ शराब रहती है, लड़खड़ाते चले आओ

 

घना, घुप्प अँधेरा रौशनी खा जाता है, बस भूख वहाँ बेहिसाब रहती है

इधर उधर बिखरे है कईं किस्से, लिपटे हुए कागज़ के टुकड़ो में,

एक संदूक, एक रजाई, एक कम्बल, दो सिरहाने हैं, चारपाई वहाँ अकेली सोती है

 

न ज्यादा सर्दी होती है, न गर्मी वहाँ और ना ही बाहर की हवा आतीजाती है,

ना शोर है ना ख़ामोशी, एक अनोखी सी जगह है वो दो गज़ ज़मीन तले,

गिरते पड़ते, चार कंधो पे हो के सवार, कब्र में मेरी लुढ़क जाओ, चले आओ

 

जो हमसे मिलना है तो कभी तहखाने में आओ, आओ कभी मेरे मयखाने में आओ

~ न्यूटनस लॉ…

 

मैं, मेरा पजामा और उसका नाड़ा,
सोच रहें हैं चारों ओर क्यूँ है इतना कबाड़ा,
नाड़ा कहीं पजामे में गुम है,
ठीक वैसे, जैसे हर शक्स यहाँ इस कबाड़े में…

और इस कबाड़ के ऊँचे ढेर में जो बैठे हैं,
वो लगे हैं इल्ज़ाम लगाने,
ये कबाड़ मेरा नहीं हैं, गुनगुना रहे हैं,
मैं साफ़ हूँ, अत्यंत स्पष्टता से उलझा रहें हैं…

और मैं, जी हाँ मैं, अब मैं कैसे आयींने से झूठ बोलूँ,
ये सोच मैं यहाँ ख़ुद को आईने में झाँक रहा हूँ,
मैं भी इस कबाड़ का हिस्सा हूँ, स्पश्टता से भाँप रहाँ हूँ,
नामंज़ूर हैं, मगर क़बूल करता हूँ, इस कबाड़ में मैं भी हूँ…

नाड़ा सख़्त हैं, पजामा ढीला,
अक्स-दर-अक्स सब का सब गीला,
सुखाता हूँ जो तो नाड़े से पहले पजामा सुख जाता है,
दोनो एक हैं, ना जाने ख़ुद का ख़ुद से ये कैसा नाता है…

अब कुछ गीला है कुछ सुखा है,
कबाड़ में होना और कबाड़ होना, कितना रूखा है,
और उस पर होना अहसास,
खुद से आने लगती है बास…

कबाड़ भी अजीब है, बहुत ग़रीब हैं
हाय रे हाय ये कैसा नसीब है
बाक़ी सब साफ हैं, अमीरों की अमीरी की तरह,
वयथा यह बेहीसाब हैं,

ये कबाड़ किसी का नहीं है,
यतीम हैं, जी हाँ कबाड़ यतीम है,
अफ़ीम के नशे में हैं, यहाँ वहाँ, गिरा पड़ा फैला हुआ
बिखरा हुआ, क़ूड़ा-कचरा-कबाड़, एक बाढ़…

क्या ये खिंच के आया है…शायद बह के ही आया है,
कबाड़, क़ूड़ा, कचरा, अगर बह के आया है
तो क्या ज़ाहिर नहीं, ये ऊपर से आया है,
नीचे से ऊपर बहने की व्यवस्था धरती पर नहीं है…

न्यूटन का फर्स्ट लॉ आज फिर काम आया,
यह कबाड़ा यक़ीनन ऊपर से आया हैं
व्यवस्था क़ूड़ा है, सब उसका हिस्सा,
मैं मेरा पजामा और नाड़ा सुना रहे आपको ये क़िस्सा…

~ उड़ान…

 

चुप चाप से आवाज़ लगायी होगी,
बंद आँखों से एक बार देखा भी होगा,
बिना पंखो के ली होगी उसने वो उड़ान,
आखिरी बार खोली होगी गुज़रे लम्हों की दुकान…

कुछ धुँधली कुछ साफ़ नज़र आयी होंगी,
जब उतारी होगी उसने ग़मों की वो मोटी परत,
उसकी तस्वीर साफ़ नज़र आयी होगी,
और बोला भी होगा वो दबें होठों से…

किसी तरह ये पल यूँही यहीं ठहर जाए,
ना जाऊँ मैं कहीं ना ही यें कहीं जाएँ ,
बस एक आख़िरी बार इतना सा हो जाए,
सामने हो उसे देखूँ एक बार, फिर जान निकल जाए…

जाते जाते कुछ ऐसा ही हुआ होगा,
ठीक ऐसा ना सही, इस जैसा ही हुआ होगा…

~ चश्मा…

सारा आसमान सर पर उठा रखा है,

ना मालूम मैंने चश्मा कहाँ रखा है,

दो आँखों से ज़माना बहुत देख लिया,

दो और लगा ताज़ा नज़र को रखा है…

 

काश दिल भी दूसरा लगा सकता मैं,

पहले वाला तो टूट के बिखर रखा है,

एक तकिया इधर एक उधर लगाया है,

तुम नहीं हो तुम्हारी याद पे सर रखा है…

 

तुमने जाते जाते जो बात कही थी मुझसे,

अब तलक उसी बात को पकड़ रखा है,

तुम्हें याद है तुमने जो बीज बोए थे,

फूलों ने उनकी की सारा शहर महका रखा है…

 

रात अंधेरी में कोई भटक ना जाए कहीं,

इसलिए चाँद को दिया बना रखा है,

और तो ओर तुम्हें सुन के हैरानी होगी,

तुमको चाँद, ख़ुद को दाग़ बना रखा है…

 

कहने वाले तो यहाँ तक कहते है,

मैंने ये ख़ुद को क्या बना रखा है,

अब उन्हें कैसे बताऊँ, समझाऊँ क्या,

मैंने तुममें ख़ुद को सजा रखा है…

 

मिल गया चश्मा सर पे लगा रखा था,

यूँ ही सारा आसमान सिर पे उठा रखा था,

नज़रें ज़मीन पर, चश्मा तुम्हें तारों में धूँड रहा था,

मैंने तुममें अपना सारा जहाँ रखा था…