~ नन्द लाला…

~ नन्द लाला…
मईया
सुन मोरी मईया
देखो द्वार खरे नन्द लाला
देखो द्वार खरे नन्द लाला…
बोले भूख से सूख के नीले भये है
पर मुँह पर कुछ सुफेद है झागा
और जब मैं बोला कान्हा
तोहरे मुँह पे माखन लागा
तब ना पोंछ के मुँह वो बोले
चल पगले
ये तो सुफेद है धागा
कित्ता चतुर है नन्द लाला
मईया बरा चतुर नन्द लाला
इक बात बता तू मईया
तू गोरी तो कान्हा है क्यूँ काला…
ठीक कहे नन्द लाला
तू पगला का पगला
वो रूप बदरने वाला
वो सब दुःख हरने वाला
वो किसी आँख को गोरा
वो किसी आँख को काला…

~ पैदल ही…

Picture: Google Images Image Credits – Altaf Qadri, API

~ तीली…

तेरी चाल हुबहू शेर ग़ज़ल का,

जब रुके तो ठहरे बादल सी,

दीवानी है तू, ओ दीवानी तू,

तू है पूरी की पूरी पागल भी…


भूरे अंगूरों से दो नयन तेरे,

कानों में चिड़ियाँ के पंख लगे,

चलती फिरती करती घायल तू,

तू…बिरयानी के पीले चावल सी…

मिश्री के दानों जैसे दाँत तेरे,

दो लब जैसे संतरे की फाड़ियाँ,

तू लहलहाती खेतों में सरसों सी,  

लहरों सी तेरी अंगड़ाई है…

बस किशमिश तू अब बन जा,

तुझे दाँतों तले दबा लूँ मैं,

या माचीस की तीली तू बन,

और खुदको तुझसे जला लूँ मैं…

~ चाहत…

फिर तुम्हें मैं याद करना चाहता हूँ,
फिर से ख़ुद को भूल जाना चाहता हूँ…

वक़्त यूँ सबको बदल देता है, पर मैं,
वक़्त से पहले बदलना चाहता हूँ…