~ सियासत…

~ सियासत…

सियासत में ज़रूरी है ज़रा सा ध्यान रखना,

थोड़ा झुकना ज़रूरी है अगर ऊँचा है उठना…

कोई झुकता कहाँ हैं…

ज़रूरी ये भी ईमान को संभाल रखना,

बिन पैंदे का लोटा बन इधर उधर ना लुढ़कना…

कोई टिकता कहाँ है…

और लाज़मी है ज़ुबान पे मिश्रियाँ रखना,

नफ़रतें दूर रख घोलना मुहब्बत दिलों में…

कोई रखता कहाँ है…

ज़रूरी है समझना और बाँटना दर्द सबका,

सब को साथ लाना सब को साथ रखना…

कोई लाता कहाँ है…

बेहद लाज़मी है बड़ा कर हाथ उठाना,

वादों को याद रखना और उनको निभाना…

कोई निभाता कहाँ है…

सबसे ऊपर है सियासत में रियायत की हिफ़ाज़त,

ना उलझना बेकार बहस में ना आपस में लड़ाना,

कोई सुनता कहाँ है…

सियासत वो है जो दे एक जैसा दर्जा,

असली चौकीदारी और बाद में चाय पे चर्चा,

सब उलटा होता यहाँ है…

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~ चल तू-तू मैं-मैं करते हैं…

~ चल तू-तू मैं-मैं करते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं

फिर धर्म के नाम पर मरते हैं

चल बहस करें बे सिर-पैर की

लाशों के ढेर लगाते हैं

इज़्ज़त की उड़ा धज्जियाँ

कारों और बसो को जलाते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं…

क्या खाया क्या पहना जाए

इसकी एक लिस्ट बनाते हैं

शहरों के नाम बदलते है

कुछ दंगे नए भड़काते है

पड़ोसी को देख जले पड़ोसी

भाई को भाई से लड़ाते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं…

चल देश विदेश की सैर करें

देखें सब आपस में बैर करें

कुछ पुतले नए बनाते है

कुछ बच्चों को भड़काते हैं

चल हरे को भगवा चढ़ाते है

दिलों में आग लगाते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं…

आया है मौसम चुनाव का

अब मुद्दे नए बनाते हैं

ये जनता तो बेचारी है

चल चुना इसे लगाते हैं

बातों में इसे फँसाते है

कुछ सपने नए दिखाते है

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं…

आपस में बिन बात के लड़ते है

छलकपट, दांवपेच लगाते है

माँगें जो पुराना हिसाब कोई

इतिहास में उसे फ़साते हैं

ऐशोआराम से हमको काम,

पहले वोट, फिर जेबों को भरते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं…

~ हुनर…

~ हुनर

इस बलखा के चलती कलम का हुनर तो देखो,

जहाँ कोई ना जाये, ये हर हाल गयी उधर तो देखो,

लोग रहते हैं लगें अख़बार की सुर्ख़ियाँ चाटने,

और ये ख़ुद बन गयी ताज़ा ख़बर तो देखो

हंगामा है चारों ओर ग़ज़ब का शोर है,

जैसे जंगल मस्त होके नाचा कोई मोर है,

ये काग़ज़ पे मचल के ग़ज़ल हो गयी,

भरी महफ़िल में इसका असर तो देखो

आज खुल के कुछ भी खाना दुश्वार है,

हवा में है ज़हर है, घर से निकलना बेकार है,

आदमी को आदमी से आज ईंटपत्थर का प्यार है,

लगी ये फिर से उगलने ज़हर तो देखो

अब ये सोचसोच के कितना कम लिखता हूँ,

सच सहना तो दूर अब कहने की भी मनाही है,

खबरे सब बिकीबिकाई, ये मुफ्त का अख़बार है,

ज़िद्दी है ये, फिर बरपा दिया इसने क़हर तो देखो

चुप चाप चलो और किसी पुल पर ना चढ़ना,

पुराना भूल जाओ नया इतिहास पड़ेगा पड़ना,

बादशाहसलामत आने को है सब सर झुका लो ,

ये फिर चल पड़ी उठा सर उधर तो देखो

~ किताबें…

~ किताबें…

किताबों की चादर किताबों का सिरहाना, किताबें ही ओड़ के सो जाती हूँ,
किताबों की सी दिखती हूँ, किताबों का हुआ जो ज़िक्र फिर उनमें खो जाती हूँ…

कल सुबह एक, दोपहर में दो और रात को देड़ ख़िताब खायी थी,
बीच में जो कहीं लगे भूख तो आधी किताब जेब में भी छुपायी थी…

कुछ किताबें मोटी हैं, कुछ पतली, कुछ लम्बी कुछ छोटी, ना एक खरी ना खोटी,
सब की सब बातूनी हैं, बहुत बोलती है, सब की सब कोई न कोई राज़ खोलती है…

किताबें ये सच में सिर्फ़ काग़ज़ के टुकड़े ही हैं ना, कहीं इनमें सच में तो जान नहीं,
कैसे मुमकिन है की ये सब कुछ जानती हैं, कहीं ये भी तो इंसान नहीं…

मैं भी तो एक किताब ही हूँ, चलता फिरता क़िस्सा हूँ जीती जागती एक कहानी हूँ,
ख़ुद को लिखती हूँ, ख़ुद सहफ़ा पलट ख़ुद को पड़ती, ख़ुद हर कहानी में ख़ुद से लड़ती हूँ…

अपनी इस किताब के चालीस सहफ़े चुकी हूँ पलट, कुछ पलटे आहिस्ता कुछ सरपट,
कुछ पलटते पलटते मुड़ गए, कुछ उधड़े कुछ सीए, चन्द इत्मीनान से जिये…

मैं और मेरी ये खुली किताब, और मेरी किताब में आखिरी हर्फ़ होगा इश्क़, तेरे नाम के साथ,
और जब लिखूंगी आखिरी सहफ़ा होगी आँखों में तस्वीर तेरी, हाथों में जाम के साथ…

~ दोस्त…कहीं खो गए हैं…

मेरे कुछ दोस्त कहीं खो गए हैं,

कुछ हिन्दू तो कुछ मुसलमान हो गए हैं,

बुलाते थे जिन्हें ओये, अबे, साले, गोरे, काले,

कुछ भगवे तो कुछ हरे हो गए हैं,

मेरे कुछ दोस्त कहीं खो गए हैं

 

बड़े प्यारे थे, दो चार नहीं बहुत सारे थे,

दिखाई देते थे सुबह शाम यूँ ही बकबकाते,

किसी काम के नहीं थे आवारा फिरते थे,

कुछ पुजारी तो कुछ मौलवी हो गए हैं,

मेरे कुछ दोस्त कहीं खो गए हैं

 

गली में जम के हुड़दंग मचाते थे,

होली में नहाते, ईद में मीठा खाते थे,

हाथ कंधे पे रख शहर भर घूम आते थे,

कुछ हवनसामग्री तो कुछ हाजी हो गए हैं,

मेरे कुछ दोस्त कहीं खो गए हैं

 

छत पर सब एक साथ सोते थे,

लड़ाईझगडे में पिट एक साथ रोते थे,

मेरे दादादादी, नानानानी उनके भी होते थे,

छोटे थे जो कभी वो सब बड़े हो गए हैं,

मेरे कुछ दोस्त कहीं खो गए हैं

 

मम्मीअम्मी के पूरीपराठें खाते थे,

पापाअब्बू से सब घबराते थे,

रोज़ मिलते हस्ते खिलखिलाते थे,

कुछ जल गए, कुछ दफ़्न हो गए हैं,

मेरे कुछ दोस्त कहीं खो गए हैं

~ काना-फुसियाँ…

~ काना-फुसियाँ…

चल चलें कहीं, फिर करें वही,

काना-फूसियाँ…

मैं दूँ उधेड़ कुछ, देना उसे तू बुन,

हाँ वही, काना-फूसियाँ…

बंद किताब में, सूखे गुलाब सी,

काना-फूसियाँ…

मैं आऊँ देर से, तू लेना मेरा बहाना सुन,

फिर करें काना-फूसियाँ…

हाँ रूठ जाने की, फिर मनाने की,

काना-फूसियाँ…

घड़ी की सुई जैसे, बारह पे जाए अटक,

और करें वही, काना-फूसियाँ…

मौसमी बुखार सी, यूँ ही बेकार सी,

तेरी मेरी काना-फूसियाँ…

यादों को बनाए कड़ी, बातों की पकोड़ियां भरी,

हाँ वही, चटपटी, काना-फुसियाँ…

चल चलें वहीँ, और करें वही,

काना-फूसियाँ…

~ शर्त लगाता हूँ…

ना मालूम वो मंदिर था या मस्जिद जो गिरायी गयी थी,

शर्त लगाता हूँ एक दीवार थी जो हमारे बीच उठायी गयी थी

 

सोची समझी साज़िश थी जम्मू से कश्मीर की दूरी बड़ाने की,

शर्त लगाता हूँ असल बात थी भाई को भाई से लड़वाने की

 

उस हादसे ने हलवेसेंवई की अदला बदली पर पाबंदी लगा दी,

शर्त लगाता हूँ बिना पड़े उन्होंने रामायण से क़ुरान भिड़वा दी

 

सब हट्टेकट्टे है और एक ही थाली के चट्टेबट्टे हैं,

शर्त लगाता हूँ ये वो अंगूर हैं जो एकदम खट्टे हैं

 

ग़रीबी हटाएँगे”, “लोकपाल लाएँगें”, “मंदिर वहीँ बनायेंगे”,

शर्त लगाता ये सालों तक ऐसे ही हमें चूना लगायेंगें

 

राजनीती के चक्कर में ये आज भी नफरत का सीड बो रहें हैं,

शर्त लगाता हूँ राम और अल्लाह अपना सर पकड़ के रो रहें हैं…. 

~ श्याम रंग…

~ श्याम रंग…

मोहें श्याम रंग ढल दे,

इतना सा तू बदल दे,

जो चलूँ मैं चाल आधी,

बाक़ी की चल तू चल दे,

मोहें श्याम रंग ढल दे…

है कहानी मेरी अधूरी,

पूरी उसे तू कर दे,

मोहें श्याम रंग ढल दे…

मैं रहूँगी की तेरी प्यासी,

जो तू मुझे ना जल दे,

ये तरसते मेरे नयना,

एक नज़र इधर तू कर दे,

मोहें श्याम रंग ढल दे…

ये ज़मीन है सुखी सुखी,

बादल कोई इधर दे,

मेरे ख़्वाब ख़ाली ख़ाली,

मेरी नींदों को तू भर दे,

मोहें श्याम रंग ढल दे…

मेरी नगरी में मेरा ना कोई,

मेरी गगरी फूटी क़िस्मत,

तू तो सबकी सुनने वाला,

मुझको इक नया तू कल दे,

मोहें श्याम रंग ढल दे…

~ प्रयागराज एक्सप्रेस…

~ प्रयागराज एक्सप्रेस... 

"यात्रीगण कृपया ध्यान दें"

मैं हूँ चलती हुई ट्रेन की ऊपर वाली खाली बर्थ, 
मेरा पेसेंजर सामने वाली सीट से ले रहा है मज़ा, 
खाली बर्थ का होना ठीक वैसा है, 
जैसे ट्रैन के लम्बे सफर में सवार “एक अकेली जवान लड़की”

हर आता जाता उसे भूख भरी निगाहों से देख रहा है, 
काश मुझे मिल जाये यह सोच आँखें सेक रहा है,
पड़ी टी-टी की नज़र तो उसके मुँह में पानी से भर गया,
बेचने उसे ग्राहक की खोज में उसका चेहरा निखर गया...
 
सफर रात का था मैंने भी बगल से पड़दा खोला ज़रा,
और अपनी हसीन बर्थ की बत्ती जलती ही रहने दी,
पहली ही नज़र में उसका जादू चल गया,
सामने वाले जनाब का पैर उसपर फिसल गया...

इधर बाथरूम का रुख करते दूसरे ने तो हद्द ही कर दी,
खींच के दो चादर में से एक, बर्थ को लूटना शुरू किया,
गया सिरहाना, फिर कम्बल और फिर आखिरी चादर भी,
चुप चाप देख रहा था अब धैर्य ने मेरे टूटना शुरू किया...

असल तमाशा तो जब शुरू हुआ...

टी-टी साहब मौका देख पहला ग्राहक ले आये, 
दो-सो में दो स्टेशन का किये वादा और दिए उसपे चढ़ाये,
और नहीं, खोला पड़दा हम चिल्लाये कहाँ-किधर हमारी है,
बड़बड़ाये - तो हक़ काहे नहीं जताते खुद बैठ क्यों नहीं जाते...

बस क्या था - सब तरसती नज़रों को जैसे सांप सूंघ गया,
अब हर आता-जाता हमें ऐसे घूर रहा था,
जैसे उनकी गर्लफ्रेंड को हम ब्याह लिए हों,
टी-टी तो ऐसे सड़े जैसे उनकी नौकरी हम खा लिए हों...

बहुत कठिन है भाई ट्रेन में खाली बर्थ का सफर करना,
इज्जत सुरक्षित रहती नहीं और भाव लगा सो अलग,
सब का सब अइसे उस पर अपना हक़ जताता हैं,
जैसे बाप ज़मीन छोड़ दिया उनके नाम और बर्थ उनकी माता हैं...