~ दस नम्बर…

~ दस नम्बर… 

“लीजिए श्रीमान यही वो कालोनी है जिसकी मैं बात कर रहा था, सब कुछ वैसा जैसा आपको सूट करे…सूट नया लिया लगता है अपने, जूता बहुत जच् रहा है साथ में…हाँ तो मैं आपको कालोनी के बारे में बता रहा था – बस स्टॉप गेट से बाहर निकलते ही, १० मिनट चलेंगे तो मेट्रो स्टेशन प्रपोज़द है, अन्दर ही पार्क है, और पूरी तरह सेफ एंड गार्डेड, CCTV और सिक्योरिटी गार्ड भी है” 

“कैसे हो चाचा?”

“कैसा हूँ…बेटा उम्र निकल गयी अब तो बस जान निकलनी बाक़ी है, यहाँ कोई चोर भी तो नहीं आता, आता तो लड़-वड कर मर-वर जाता तो शायद इनाम-विनाम से चार पैसे मिल जाते घर वाली को…छोडो अपनी सुनाओ, कैसा चल रहा है धन्धा?”

“चाचा सब ठीक, भाई साहब को मकान दिखाना था, दस नम्बर की चाबी दो और वो नौ नम्बर खाली हुआ क्या?”

“मर गया, मर गया”

“मर गया… क्या कह रहे हो चाचा?”

“अर्रे…मच्छर मर गया, कब से परेशान कर रहा था, ख़ून पी रखा था, एक घंटे से इस मच्छर ने…और…नौ नम्बर वाली ने तो किराया बड़ा दिया और तीन साल का इक्स्टेन्शन भी ले लिया है…ये लो चाबी”

“चलिए साहब, किराया दस हज़ार, एक महीने का मेरा कमिशन और तीन महीने का अड्वैन्स किराया”

“ये कालोनी यहाँ सबसे ज़्यादा डिमांड में रहती है, कोई आ जाए तो जाता नहीं इतनी जल्दी और पड़ोस तो आपका बहुत ही अच्छा है, सारा मोहल्ला मरता है उसके स्टाइल पर, टी-वी में काम करती है, ज्यादातर चुप रहती है अब, पहले ऐसा नहीं था, लेकिन हाँ पहले कोई था उसका अपना, बहुत चहकते थे नौ और दस नम्बर मिल कर…फिर पता नहीं क्या हुआ एक दिन अचानक ही चला गया, उधर वो निकला और इधर इनकी ख़ुशी, महक और चहक सब कुछ अचानक एक दिन दबे पाँव ये मोहल्ला छोड़ कर चली गयी”

“लेकिन एक बात की तारीफ़ कह लीजिए या यूँ कहे आज भी अपने प्यार पे भरोसा है, सिर्फ़ चाचा से बात करती है कभी कभी…उन्हीं को बता रही थी…वो एक दिन आएगा ज़रूर….और जब भी घर पर होती है बस एक ही गाना गाती और बजाती रहती है….वो क्या है गाना”

“मन कस्तूरी रे…ऐसा कुछ, हाँ आख़िर में…बात हुई ना पूरी रे”

(कोई तो बात है जो शायद अधूरी रह गयी दोनो की, सारा मोहल्ला भी दुआ करता है की वो आ जाए, ना जाने कहाँ गया वो, क्यूँ गया…ब्लडी हेल्ल)


“लिफ़्ट नहीं है, सीड़ियों से जाना पड़ेगा और हाँ जिसको भी पता चलेगा, गिर पड़ेगा की आप दस नम्बर किराये पर ले रहे है” –“सुन रहे है ना आप?”

“हाँ हाँ आप ही को सुन रहा हूँ, १० नम्बर, १० हज़ार, १ महीना आपका, ३ महीना अड्वैन्स और ९ नम्बर में कोई है जो हो के भी नहीं है…ठीक सुना ना मैंने?”

“क्या बात है, आप ने तो कमाल कर दिया, कान नए लगवाए है या आज ही साफ़ करवाए है?”

“चलिए आगे बढ़िये…देख कर सुबह सुबह भीड़ होती है बालकोनी में, यहाँ…ज़िंदगी दरवाज़ों पर जैसे नाच रही हो…ध्यान से आगे काँच टूटा पड़ा है, लग ना जाए”

“कैसे हो भाई, आज गाना नहीं सुनाओगे, सुनाओ और थोड़ा सा रास्ता बनाओ, साहब को मकान दिखाना है, फिर घर जाना है…आज इतवार है और बीवी का जन्मदिन है, भूलने का नाटक करूँगा, और फिर प्यार का इज़हार…चलो गाना गाओ यार”

> “ये लो मेरा सुनते जाओ और बाक़ी दरवाज़ों पे कान लगाओ”…”जब लाइफ़ हो आउट ओफ कंट्रोल होंठों को कर के गोल”

> “पप्पू…होंठ बाद में गोल कर लियो पहले दीवार में होल कर, कील ठोक, कपड़े सुखाने की रस्सी टांगनी है…और बालटी में पानी भर दे”

>”गीज़र ख़राब है, पानी गैस पे गरम होगा आज, और सुनो आज दुकान जाते हुए गैस वाले को सिलेंडर बोल देना, नौ दिन हो गए लिखवाए हुए”

>”आज सुबह से छाती में हल्का सा दर्द हो रहा है, गैस है शायद, थोड़ा टहल लूँ शायद आराम मिले, आज इतवार है क्लिनिक भी बंद होंगे, कल तो बिलकुल समय नहीं होगा, परसों जाऊँगा किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाऊँगा”

>”सुनो परसों क्या है?…परसों, परसों, परसों नौ तारीख़ और शनिवार है…बोलो, क्या मेरा शनि भारी होने वाला है?”

“हाँ हो सकता है, परसों बंटी का रिज़ल्ट जो आना है”

>”रिज़ल्ट रिज़ल्ट, कोई रिज़ल्ट नहीं मिलता तुम्हें समझाने का, अब माँ बाबूजी की तो उम्र निकल गयी, तुम ही प्यार से बात कर लिया करो”

> “सुबह छत पर बुलाया था…आयी नहीं तुम, प्यार को प्यार से देखने का मन था मेरे प्यार, जान आज शाम का क्या प्रोग्राम है, मूवी देखने चलें?”

>”तो ठीक है फिर, शाम को प्रोग्राम पक्का, चिकन हम ले आएँगे, और तू शराब…चखना उसी वक़्त ख़रीद लेंगे, मिलते है ९ बजे हम, तुम और जाम…अच्छा हाँ, बीयर ठंडी मिली तो पकड़ लियो”

>”पराँठे ठंडे खाओगे या गरम?”

“ठंडे कौन खाता है श्रीमती जी?”

“वोही जो बाज़ार से गरम लस्सी लाता है श्रीमान”

“कोई मौक़ा ना छोड़ना ताना देने को”

लो फिर, एक और…तैयार हूँ आज लेट आने का बहाना अभी लेने को…रहने दो चलो जाओ, प्याज़ के पकोड़े बनाए है, ख़ुद खाना सेक्रेटेरी’ को मत खिलाना” 

>”बाबूजी प्याज़ ख़त्म हैं, शाम को सैर करने मण्डी चले जाना, प्याज़ और कोई दो चार सब्ज़ी पकड़ लाना”

“ले आऊँगा बहू”…

(सारी उम्र निकाल दी कमाने, पड़ाने में, बची खुची सब्ज़ी लाने में निकाल दूँगा, ना जाने कन्धा मिलेगा या पैदल ही जाऊँगा वहाँ भी)

>”पैदल चलिए, अब मार्केट यहीं तो है, गाड़ी क्या करनी है, थोड़ा पैदल भी चल लिया करो, अदरक हो गए हो, जहाँ देखो वहीं से बड़ रहे हो, थोड़ा कंट्रोल करो नहीं तो टेम्पो ख़रीदना पड़ेगा”

>”और मत करो तुम कंट्रोल, तुम्हारा क्या…कुछ हो गया तो पापा मुझे मार देंगे”

> “छोटे देंगें दो कान के नीचे, कह रहे है, आज के बाद अगर हमसे ऊँची आवाज़ में बात की तो”

>”ऊँची है बिल्डिंग लिफ़्ट मेरी बंद है…अब गाओ तुम <ह> से गाओ”

“हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते”…”अब तुम <ए> से गाओ”

“एक मैं और एक तू है”

>”तू नहीं बोलते बेटा, बोलो आप कैसे हो…तू गंदे बच्चे बोलते है”

>”गंदे कपड़े वॉशिंग मशीन में डाल दिया करो, दो ही हाथ हैं मेरे…सब कुछ नहीं कर सकती, कुछ तो काम अपने आप भी कर लिया करो”

>”आज अपने आप, बिना अलार्म, बिना किसी के उठाए उठ गए जनाब, सब ठीक तो है, तबियत ठीक है ना…१३ साल का रीकॉर्ड तोड़ दिया आपने तो” 

>”और ये लगा छक्का…इसी के साथ ये शृंखला जीत कर भारत ने एक नया रेकॉर्ड क़ायम किया है…भारत लगातार ११ मैंचों में  जीत हासिल करने वाला पहला देश बन गया है”

>”देश भर में सिर्फ़ एक ही सवाल उठ रहा है, क्या कभी सच का पता चलेगा या इस बार भी हिरन ने ख़ुद को गोली मार ली… शायद ग़रीब और जानवर में कोई फ़र्क़ नहीं है, दोनो का अपनी ज़िंदगी पे इख़्तियार है और ना मौत पर…खाने के खोज में सारी उम्र निकल देते है और फिर एक दिन किसी का भोजन बन जाते है…कहीं जाना नहीं मिलते है एक छोटे से ब्रेक के बाद”

>”ब्रेक मारी, लगी नहीं, सड़क गिली थी और शायद ब्रेक ढीली और गया मेरा स्कूटर शर्मा जी की गाड़ी में…वो तो अच्छा हुआ शर्मा जी स्टेशन जाने को लेट हो रहे थे, बाल बाल बचा, लगा था हुआ सुबह सुबह महाभारत का पाठ आज तो”

>”आज से शाम को लेट आऊँगा, एक और टयूशन मिल गयी है, और जाना भी थोड़ा दूर है, लंच के साथ रात का खाना भी पैक कर देना, ट्रेन में ही खा लूँगा, पैसे और वक़्त दोनो बचेंगे…जो बचेगा काम आएगा, छोटी की टयूशन फ़ीस के लिए”…

(अजीब मज़ाक़ करती है ज़िंदगी सारी दुनिया को पड़ाता हूँ और अपनी बेटी को समय नहीं दे पता हूँ….चलो हलवाई अपनी मिठाई ख़ुद कहाँ खाता है)

>”खाना खाता नहीं, शराब छोड़ता नहीं, समझ में नहीं आता क्या करूँ मैं तेरा, मैं कमा कमा के थक गयी हूँ और तुझे कोई मतलब नहीं की तेरी माँ जिये या मरे…बस और बस पीने से मतलब”

“पड़ोसी कैसे लगे आपको?…कहे देता हूँ इस कालोनी की बात ही अलग है”

“लीजिए यही है आपका दस नम्बर…एक बात तो मैं आपको पूछना ही भूल गया, आप खाने और कमाने के लिए क्या करते हैं?…शक्ल सूरत से तो आप भी किसी मॉडल से कम नहीं लगते, पहले भी कितने आए, लेकिन हमने किसी को दस नम्बर दिखाया नहीं, हम भी चाहते है की कोई सिंगल हैंडसम सा लड़का ही रहे वहाँ, शायद ख़ुशी लौट आएं”

“कहानियाँ लिखता हूँ”

“अच्छा, फिर तो मज़ा आ जाएगा, मुझे कहानियों का बचपन से बहुत शौक है…लेकिन सिर्फ सुनने का, पड़ा लिखा थोड़ा कम हूँ ना…कभी सुनाओ अपनी लिखी कोई अच्छी सी कहानी…शुरू से अंत तक”

“बिलकुल, शुरुआत तो तुम सुना ही चुके हो, अंत सुन लो…सच्ची कहानी है, आपबीती”

“नौ नम्बर वाला मेरा छोटा भाई था, परसों कैन्सर से लड़ते लड़ते हार गया, नहीं चाहता था कि आपकी मैडम की ज़िंदगी ख़राब हो, इसलिए चला गया, एक दिन, चुपचाप, अचानक, दबे पाँव, अकेला, अकेले मरने के लिए”…चार पैसे भी जोड़े थे उसने, अपने सपनो को पूरा करने के लिए…मरने से पहले…सपना तो कोई पूरा ना हुआ, अपना ही पूरा हो गया” 

“मैं आया था, कुछ दिन बग़ल में रह जान पहचान कर उसे ये बात बताने की हिम्मत जुटाऊँगा…अब ना होगा मुझसे, आप दे दीजिएगा खबर और कह दीजिएगा, वो उसकी आँखो में देख कर मर नहीं पाता, हो सके तो माफ़ कर देगी और अपनी बची हुई उम्मीद आज साफ़ कर देगी”

“और उससे मेरे बारे में कुछ ना कहना, कोई कहानी बना लेना और मेरा नम्बर प्लीज़ अपने मोबाइल से हटा देना”

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~ गिलास की कहानी…

~ गिलास की कहानी…

छोटा था मैं, बहुत छोटा, बस भूख से रोता था, और बाक़ी सोता था, सोने नहीं देता था किसी को खुद से पहले…कभी कभी तो सबसे पहले उठता भी था…एक ही काम और एक ही खिलोना था मेरा, कुछ खाता नहीं बस पीता था…और मेरा खिलोना था, मेरी बोतल जो जल्द ही गिलासी में बदल गयी…

छोटा सा, मेरे जैसा मेरा गिलासी सा मेरा गिलास, एक वो ही समझता, जानता और सबसे ज़्यादा प्यार करता था मुझे, जितना मर्ज़ी उठा-पटक, फैंकता उसे और वो सब सहता और कुछ ना कहता, और बीच बीच में बुझाता था मेरी भूख, मेरी प्यास, मेरा प्यारा गिलास…

पानी से दूध तक का सफ़र तय किया और छोटा बचपन हम दोनो नें साथ साथ पिया , सुबह मुझ से पहले उठ के भर जाता था, कभी कभी हाथ धुलवाता पर अक्सर दूध ही पिलाता था…दोपहर, शाम, हर रात फिर भर जाता था, मेरा ख़याल रखता था, मेरा छोटा भीम था, मेरा दोस्त…मेरा गिलास…

छोटा बचपन जल्द बड़े बचपन में तब्दील हो गया, गिलास मेरा अब रूह-ए-गुलाब था, सफ़ेद दूध से नाक चिढ़ाता था, पानी बोतल या नल से ही पी जाता था, गिलास बड़ा हो गया था, कभी एक आध बार चाय काफ़ी भी पी लेता था, मेरे बिना अब वो जी लेता था, मेरे भी नए दोस्त बन गए थे, छोटे कप, अक्सर चाय-काफ़ी पिलाते थे, बचपन के दोस्त चुराते थे…

वक़्त बीतने लगा और अब घर के गिलास के ख़िलाफ़ होने लगा, बाहर का गिलास अब रास आने लगा था और वो भी मिलती थी तो अक्सर हम एक ही गिलास में पिते थे, आख़िरी बूँद तक सुड़क जाने लगे, गिलास नहीं हिलता था, ना ही गर्दन भी उठती थी, गिलास वही खड़ा रहता था, हमारे जाने के बाद पड़ा रहता था…

शामें होने लगी गीली साथ जेब ढीली, शुरू शुरू में बोतल को मुँह लगाने लगे, गर्दन ऊँची कर कुछ घूँट लगा चिल्लाने लगे, नाचने गाने लगे, गिलास अकेला रह गया, और बोतल शाम को खुल के नाचने, गिलास करता था इंतज़ार…हम जिसे और जो हमें करता था प्यार, वो छोटा गिलास अब रहता था उदास…

बड़ने लगा वक़्त भी और उम्र भी, दोस्त भी-माहौल भी, गिलास जो कभी पानी और दूध पिलाता था, अब वो शराब में कभी सोडा या पानी मिलाता था, गिलास अब फिर से प्यार था, गिलास मेरा यार था, हम नशे में रहते और गिलास से गिलास टकरा के कहते…

सुबह तक बार बार, लगा मुँह हम गिलास, ना जाने कितनी बार, एक ही बात कहते-कहते लड़खड़ाते बार से घर को जाते थे, और घर जा के और बनाते थे, गिलास अब सफ़ेद कुछ ना पीता था, कड़वाहट थी उसकी नयी मिठास थी, छोटी गिलासी अब थी पटयाला गिलास …

सही लग गयी या ग़लत लग गयी, ए-गिलास मुझे तो तेरी लत लग गयी…शरीर मेरा अब बूढ़ा ढोने लगा, गिलास पकड़ना मुश्किल होने लगा, काँपता था हाथ मेरा और अक्सर छूट जाता था गिलास और दूध मेरा जाता था बिखर…


बचपन में भी पकड़ नहीं पता था, दूध तब भी गिराता था, प्यार और पुचकार से फिर मिल जाता था, 

…वक़्त बदला और बदले हालात, घर में आया एक नया बचपन और साथ में ला-ल-ला-लला…नया “गिलास”…

पोता…ठीक मुझ जैसा था वो रोता, उसकी भी अपनी इक गिलासी थी, जो उसके प्यार की प्यासी थी…

आज आख़िरी शाम है, बुढ़ापा मेरा सजा धजा सोया है लकड़ी के सेज पे, और बूँद-बूँद से भरा गिलास अब इक छोटा सा मटका है, जो एक और बस एक छेद से चटका है, और आग लगी है चारों ओर…

~ उड़दाँ पंजाब…

~ उड़दाँ पंजाब…

ज़िंदगी दे क़िस्से, आए सारयाँ दे हिस्से,

किसे नू दीस्से, किसे नू नयि दीस्से…

एन्ना जया बोल की बीजी फिर हल्के-फुल्के बानांण लग्ग पयी…     

हैप्पी ओय हैप्पी

उठ वी जा हुन, अद्दी रात्ती बड़ा शोर पाया फेर तू,

हैपी सद्दा, “उड़दा पंजाब”, उड़ सकदा सी उठ नयी…

हैप्पी दा वड्डा भ्ररा सी अपणा काला,

काला नां हैं जी काले दा, ते उसनु हर चीज़ काली पसंद सी…

रोटी दे नाल – काली दाल,

चावलॉ दे नाल – काले चने,

काली पैंट, काली क़मीज़, नाल काला चश्मा,

काली बुलट ते काली पग्ग,

पीनी उस, काली रम नाले ब्लैक पेप्पर चिकन,

फ़ेवरेट पिक्चर “ब्लैक”…

एक्को चीज़ सफ़ेद सी उस दे कोल, चिटा दिल,

हिक़दम साफ़, नियत सुफेद कोई काली हरकत बर्दाश्त ना सिगी उसनु,

ना करदाँ ना सेहँदा…

वेख्या, काले दी तरीफा ख़त्म ही ना होन कदें…

हैप्पी नू बस पीनी शराब ते करना पिंड दा महोल ख़राब

जमया ठीक सी, नौ साल दा सी, जद्दो बाऊजी नू परमवीर चक्र मिलया,

लोकॉ दे लेयी कश्मीर जन्नत है, इस घर दी जन्नत लूट लयी कश्मीर ने…

बस उस तो बाद ते, हर वक़त नशा,

कहंदाँ है, पाकस्तान तो ज़िन्दा बच के आए हिंदुस्तान, मरण वास्ते…

डरदाँ है होर मरदा है ते बस काले ते, काला है ही सोना, पिंड दी जान…

“बीजी, मेरी रोटी … फ़सल किहोजी है वेख आवाँ”

बुलेट नू मारी किक, जाँदें जाँदें इक लत हैप्पी नू वी, ते काला फुर्र…

“बीजी भूख लगी है, परोंठे ला दे चार नाले दे देयी अचार”

“आज तो शराब बंद”

ख़बर पड़ के अख़बार विच, “हैप्पी” ते उसदी भूख दोनो रफ़ूचक्कर…

“शराब बंद, सरकार दा दिमाग़ ख़राब हो गया हेगा, शराब ते टैक्स मिलदा है, उसनु बंद करता, स्मैक वेचड़-गे सारे” – हैप्पी बड़बड़ान्दा भज्या…   

खेत विच काला पहुंच्या ही सी,ते…

“काला भैया, काला भैया, आज हरिया फिर नहीं आया, आप बताओ इतनी फ़सल का ध्यान हम नौ लोग कैसे करेंगे?”

“साला बुरबक कहने लगा, हमहु नहीं डरत काउन काला गोरा से”

“हम आपका खिलाप किछऊ नाहीं सुन सकत, खींच कान का नीचे चार लगा दिया, सारा विचार ठिकाने आ गया”

“ओय ठंड रख ठंड, भोला है, बोलया ही ते है, कुछ उखड़ाया ते नहीं, कल लें आयी नाल अपने” – काला बोल्या…

“भैया, ई-तो हैप्पी भैया का जीप है” – हीरा बोला…

  

“कीथे, ओय हाँ, चल तू कम कर, हीरे नू ले आयीं सवेरे…

किक, स्टार्ट, चलया जट विदआउट फ़ियर…

“ओ निक्के, रुक कीथे भजदा पया हैं?”

“फ़ौज भर्ती होंन, मैं वी परमवीर जितना हैं…वीरे शराब ते बैन लग गया है, कठि करण झल्ला फिरदा हाँ” – हैप्पी सिद्दा जवाब दे ही नहीं सकदा सी…

“चंगा…ओदे नाल की होना, तू ते स्मैक पी लयी” – काले ने वि मज़ाक कित्ता…

“ना ओ वीरे ना…नशे दी लत्त है बस पागल नहीं हाँ मैं, मरना नी मैं स्मैक पी…शराब ते चल जाऊँ, स्मैक पी मैं आप ते आप पूरा घर मार देनॉ”

“सरकार दा चक्कर होर हेगा, सरकारी नशा बैन कर ऐसने अपने घर दी स्मैक दी सप्लाई वदाँ देनी है”

“पीन आड़े ने शराब बंद होयी ते, फिर स्मैक ही मारनी है”

“आ सरकार दी चाल हैं, सोचया उना की स्मैक विकेगी ते पोलिटिशिअन दे घर डिरेक्ट्ली इनकम”

काला चुप, सोंच विच,

…आदम होश विच वोट दे अन्दाँ है, ए नशे विच उड़दाँ पंजाब की समझा गया…

~ शोरबा…

~ शोरबा…

बचपन की हसीन यादों की खोल पोटली और आवाज़ कर के तोतली बैठे बैठे मुँह से निकल गया, ज़बान से फ़िसल गया….अम्मी आज शोरबा नहीं बनाया…

रमज़ान बस मोड़ पर ही था, जब उसने मुँह मोड़ लिया था और फिर कभी नहीं दिखाया, उसके हाथ का सा शोरबा फिर ना खाने मिला, ना ही स्वाद आया…

सही कहा गया है, सामान सब वोही होता है, प्यार कितना डालना है बस वहीं चूक हो जाती है, माँ प्यार कहाँ तोल-मोल के डालती है…

हर ईद को अम्मी शोरबा पकाती थी, और उसकी ख़ुशबू से पूरी गली महक उठती थी, इत्र भी हौला था उसकी ख़ुशबू को…हर घर में सजते थे दस्तर-ख़्वान और एक हमारा घर था जहाँ सारी दुनिया की ख़ुशी और ख़ुशबू एक डोंगे में भर जाती थी…

थोड़ा तो जलती थी सारी गली उस खुशबु-ऐ-खास से की मिठास से, सब आते थे, थोड़ा थोड़ा कर बहुत सा तो वो ही पी जाते थे…बच्चे हाथ चूमते थे माँ का और बड़े माथा मेरा, खिल-खिलता सा था कुछ ऐसा छुटपन, शोरबे सा महकता और चिड़ियों सा चहकता…

अब्बू का मनी-ऑर्डर ही आता था हर महीने की ३ तारीख़ को, अब्बू की नौकरी भी बड़ी अजीब थी, ट्रेन चलाते थे दुनिया भर के लोगों को यहाँ-वहाँ ना जाने कहाँ कहाँ पहुँचाया किया करते बस अपने घर तक की पटरी शायद उतरी हुई थी…

३ साल में शायद दिन भर के लिए एक ही बार आते थे, और तब चाय नाश्ते से लेकर रात का खाना क्या ख़ूब सजता था…लेकिन अब्बू को शोरबा बिलकुल पसंद नहीं था, कहते थे अमीरों के चोंचलें है, उनको गोश्त बहुत पसंद था, ठंडा भी…

१३ साल का था, जब पहली बार मनी-ऑर्डर नहीं आया, हाँ एक टेलेग्रैम ज़रूर आया था, कुछ तो था लिखा उसमें जिसने अम्मी को सारी रात सोने ना दिया, वो आख़री बार डाक चाचा को घर के दरवाज़े पर देखा था…

अम्मी चुप चाप ज़्यादा रहती थी…

शोरबा अब हमारे घर अक्सर बनने लगा, जैसे की ईद हफ्ते में ही चार बार हो…

अम्मी अब घर में कम नज़र आती थी, और उन्हें नज़र भी कम आने लगा था…सारा दिन सुई में धागा डालते डालते सब ठीक से दिख रहा है इसका दिखावा करती थी…और सीती रहती थी कुछ तो था जो अंदर उधड़ा हुआ था…

कभी कभार बीच बीच में मुस्कुराती थी, और वो हँसी कुछ बूँदो सी छलक आती थी, लोगों के नए कपड़े बनाती थी, और मेरे लिए नए कुर्ते और नयी कतरन से ही अपनी शलवार भी…ईद को…

वक़्त बीत रहा था, और क़द बड़ रहा था मेरा, दिखने में थोड़ा साँवला था शुरू से, हाँ काग़ज़ काले करता था बचपन से…पड़ते पड़ते मेरा बचपन लड़कपन में और पड़ाते पड़ाते अम्मी की उम्र उस मोड़ पर आ गए जहाँ उन्हें मेरी ज़रूरत थी…

और मुझे शहर बुला रहा था, हमारे गाँव में स्कूल तो था पर कॉलेज का नामों-निशान नहीं, अम्मी ने अपनी कमज़ोर नज़र से मेरा आने वाला वक़्त देख लिया और पोटली बाँध मुझे शहर को चलता किया, सब कुछ भरा था उसमें, और आवाज़ भारी…

जैसे ही मेरी पढ़ाई पूरी हुई नौकरी लग गयी… इस बीच ना जाने कितनी बार मैंने अम्मी को अपने पास बुलाने की कोशिश की, उनका वही दोहराना हर बार…ठीक से पड़ ले और जब अच्छी सी नौकरी लग जाएगी तो मुझे भी अपने पास बुला लियो…

नौकरी लगते ही अगले हफ़्ते की टिकट करवा ली थी मैंने, सोचा था ख़ुद जा कर ले कर आऊँगा, लेकिन नयी नौकरी की पहली शर्त एक हफ़्ते में जोयनिंग और ३ महीने कोई छुट्टी नहीं…

अब मैं तो नहीं जा सकता था मगर अम्मी की टिकट करवा दी, रहा नहीं जा रहा था, रोज़ होटल का खाना और ख़ाली घर में ख़ुद से गुनगुनाना अब बंद…

आते ही मेरी पहली फ़रमाइश शोरबा होगा, वो ही जो पूरी मोहल्ला महका दे…ऐसा ही किया मैंने…

माँ के आते ही मेरी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा, गले लग के ना जाने कितना तो हम ने अरमानो को बहाया, माँ दुबली भी बहुत हो गयी थी, लेकिन आते ही सबसे पहले मुझे सुनने को मिला, क्या यहाँ कुछ खाने को नहीं मिलता, माँ को बच्चे हमेशा दुबले पतले ही लगते है, मैंने भी कह दिया, अब तू आ गयी है ना अब रोज़ शोरबा बनाना और जी भर के खिलाना…

ना जाने ऐसा क्या बोल दिया, अम्मी के आँसू रुकने को ना हुए, उस पूरा दिन अम्मी ने कोई बात नहीं की, चुप चाप एक कोने में बैठी, कभी उठती थी और फिर लेट जाती, मैंने बहुत कोशिश की पूछने की, ज़रा सा मुस्कुरा देती पर कुछ ना बोलती, सब ठीक है और कुछ याद आ गया बोल के, चुप हो जाती…

अगले दिन, सुबह मैं ज्यूँ ही मैंने दफ़्तर का रूख किया, उसने आवाज़ दी, और सिर्फ़ इतना कहा आज आते समय गोश्त लेता आइयो…आज कुछ ख़ास बनाऊँगी तेरे लिए, ख़ुश था माँ ने कुछ बात तो की, शाम को उनके पास ही बैठा रहा जब उन्होंने तैयारी शुरू की, ऐसा लगा ज़िंदगी संभल सी गयी…

अम्मी ने गोश्त से हड्डीयां अलग की, गोश्त ऐसे रखा की वो कुछ है ही नहीं…और बोला के ले जा, यह सामने जो भीड़ लगी है, उनको बाँट दे, आज मैंने भी तय किया था, चुप चाप हुक्म-ए-तामील होगी, की भी…

माँ फिर तैयारी में लग गयी, ठीक वैसे ही जैसे वो शोरबा बनाती थी बचपन में..इत्मीनान से लगातार हांडी में हाथ चल रहा था, नज़र पड़ी तो देखा जहाँ एक ओर हड्डियाँ उबल रही थी नमक के पानी में, और आँख से भी वही नमक मिला पानी बह रहा है…

ना जाने क्यूँ पर पूछने भर की हिम्मत ना जुटा पाया, ऐसे जैसे कोई रोक रहा था मुझको, कुछ देर अभी बीती ही थी की ख़ुशबू से सारा घर महक उठा और अब ना रहा गया और वही ज़बान जो कुछ देर पहले चुप रहने की क़सम खा बैठी थी, फ़िसली और सिर्फ़ इतना ही बोल पायी, ये तो शोरबे की महक है, लेकिन जितना ख़ुश था उतना ही हैरान भी, बिना गोश्त के कैसे…और पूछ बैठा…

जवाब सादा था, पका हुआ भी, महक मीठी थी चारों ओर, वो बोली…

जितना तुझे शोरबे से प्यार था, इसको बनाना मेरे लिए उतना ही दर्द भरा था, जितने पैसे होते थे, उतने में बाज़ार से सिर्फ़ हड्डियों पर ज़रा सा चिपका हुआ गोश्त मिलता था, पानी में पका वही बनाती थी, सोचा था कि कभी वो दिन आएगा जब मैं इसे आख़री बार बनाऊँगी…आज वो दिन है…

इतना बोल वो हमेशा के लिए चुप हो गयी…

~ पेशा…

~ पेशा… 

जनाब आप काम क्या करते हो?

~ थोड़ा अलग पेशा है मेरा, यूँ समझो मैं लाश के मुँह से क़फ़न का कपड़ा उठाने का काम करता हूँ…

ये कैसा काम हुआ जनाब…क्या आप लावारिस या गुमशुदगी वाली लाशों की शिनाख्त करवाते हो?

~ कुछ यूँ ही समझ लो…मगर शिनाख्त अक्सर मुकम्मल नहीं होती,  मैं तो क्या दुनियाँ जानती है मगर जिसकी लाश होती है वो मुकर जाता है…

वो क्यूँ भला जनाब, जब सब जानते हैं तो जिसकी है वो क्यूँ मुकर जाता है, कहीं आप चोर-उचक्कों की लाशों के मुंशी तो नहीं हो?

~ मुंशी, हाँ कुछ वैसा ही पेशा है, हिसाब किताब का…

जनाब, मिट्टी डालिये ऐसे वाहियत काम पर ये तो कोई भी ऐरा-ग़ैरा अनपड़ कर लेगा, आप तो खासे पड़े लिखे लगते है…

~ पड़ा लिखा हूँ इसीलिए तो करता हूँ…

जनाब मैं कुछ समझा नहीं, लाश के मुँह से कफ़न का कपड़ा ही तो हटाना है, कोई भी हटा लेगा…

~ लेकिन हटाता कहाँ है कोई, और मुझे भी कहाँ हटाने देते है, आए दिन इक नया इल्ज़ाम मेरे बारे में आम करते रहते हैं, चाहते हैं मैं ख़ौफज़्दा हो ये काम छोड़ दूँगा, लेकिन मैं अपने पेशा-ए-वजूद से धोखा नहीं कर सकता, यही तो आता है मुझे…”लाशों के मुँह से कफ़न का कपड़ा हटाने का”…

जनाब कौन सी लाशों के मुँह से कपड़ा उठाते हैं आप?

~ सच की लाश से…अक्सर सच ही तो मरता है, लावारिस…

~ मैं हूँ – मंटो पसंद…

अक्सर बेहतरीन क़िस्से चालीस पार करते ही ख़त्म हो जाते हैं, तो अगर आप चालीस पार कर पचास को छूने वाले हैं तो अपने आपको ख़ुशनसीब समझें, खुदा का करम है आपपर अभी आपने बहुत कुछ देखना है…

लेकिन हाँ ख़ुशनसीब ही समझें, आप बेहतरीन नहीं हैं और ना ही कभी होंगें, बेहतरीन होना और ख़ुशनसीब होना दोनो मुख़्तलिफ़ बातें हैं, बेहतरीन होना है तो ये तय कर लें जो भी आपका हुनर है उसे चालीस तक तराश कर उस मुक़ाम तक ले जाएँ, की खुदा का पैगाम आये…बंदे तेरा काम हो गया है, अब “तू आजा”…

वापसी के माने, दूर, ज़मीन से दूर, पानीयों से दूर, पहाड़ों से दूर, काले सफ़ेद बादलों को चीरता, कभी मिट्टी तो कभी आग के ज़रिए सबकी आँखों में धूल या धुआँ झोंकता हुआ, “तू आजा”…

तेरा वजूद उस स्कूल टीचर जैसा हैं, जो पहले समझने के लिए पड़ता है और फिर ताउम्र समझाने के लिए पड़ता है, और ऐसे शकसियतें बहुत ही कम होती है जो समझ और समझा दोनों सकें…

अक्सर पाला ऐसे समझदारों से ही पड़ता है जिन्होंने “समझने के वक़्त” को एक ऐसी दौड़ समझा की जिसमें अव्वल आना ही इकलौता मक़सद रहा, और हक़ीक़त का इस दौड़ से दूर दूर तक कोई तरजुमा नहीं है – जनाब आप मुझे ही ले लें… 

हर वो ऐब जो मौजूद है या सोचा भी जा सकता है, उन सभी ऐबों की वजह से मैं हूँ, मेरा वजूद बरक़रार है और मेरे ऐब भी…ऐब भी ऐसे जो मेरे अकेले के वफ़ादार नहीं, हर शक्स कोई ना कोई ऐब ले के घूमता है लेकिन मेरा वजूद ख़तरे में तब होता जब हर शक्स ऐब के साथ कोई हुनर भी पाल लेता, हुनर झूठे नहीं होते…लोग मुझे पड़ते हैं, कोई मेरे अफ़सानों से इखलाक रखता है तो कोई ख़िलाफ़त, मगर पड़ते हैं…

और मेरा मक़सद? 

मेरा तो शायद कोई मक़सद था ही नहीं, मैं पड़ता रहा, लेकिन मैंने कभी पड़ाया नहीं, हाँ मैंने लिखा ज़रूर है, और मेरा लिखा वो आयिना है जिसे लोग देखते हैं, मुझे पड़ कर पढ़ाते हैं…

मैंने अपना लिखा अफ़साना या कहानी आप उसे जो भी समझें या ना भी समझें, काग़ज़ पर उतार देने के बाद उसे फिर नहीं पड़ा…शायद पसन्द नहीं…

मैं…

“ना मैं तरक़्क़ी पसन्द हूँ, ना जिद्दत पसन्द, ना रजत पसन्द और ना ही तज़रीबियत पसन्द…मैं तो बस मंटो पसन्द हूँ”…

~ कोड 05278 आगे 06121992…

Think out of the box!

Cogito, ergo sum

नाई और कसाई
दो दुकाने आमने सामने,
~
और ~
इतिहास में दर्ज एक शर्मनाक तारीख

राम राम भाई जान, आज बहुत लेट खोली दुकानचाचा सलाम, हाँ आजकल सुबह सुबह कम होता है काम

राम राम वाले भैया हमारे गाँव के एकलौते नाई है, वैसे वो ३ बहनों के भी इकलौते भाई हैं

सलाम चाचा, पेशे से कसाई है, आगे पीछे कोई नहीं,  पूरा गाँव है उनका और वो गाँव के, इसलिए अकेलापन नहीं खलता,  लेकिन भाई साहब, क्या काटते है जनाब, एक एक पीस, इसलिए धन्धा उनका ख़ूब चलता

 

अच्छे दोस्त मिलते नहीं आजकलचल भाई मेरे बाल ही सज़ा देख़ाली है तो कर ले अब थोड़ा काममेरा क्या है, बकरा कटा पड़ा हैकोई आएगा तो दुकान खोल दूंगा और पिस तोल दूंगा

आओ बैठो चाचा, नया चल रहा है, स्पाइक बना दूँ,  ३ बाल हैं, अच्छे लगेंगे, कम पड़े तो बोलो, बकरे की पूँछ लगा दूँ, और किसी को नहीं बताऊँगा, राज़ को राज़ रखूँगा पसीने में दबाकर

कर लो भाईजान, उड़ा लो आप भी खिल्ली, लो रास्ता काट गयी बिल्ली

भाइयों तुम दोनो का हो गया तो मेरा काम भी कर दो,  दाड़ी बनवाने आया हूँ, शाम को मटन खाने का मन भी हैचाचा जाओ दुकान खोलो और 1 किलो बाँते तोलोमेरा मतलब किलो भर चाँपे तोलो

भगाओ मत हट रहा हूँ भाई, बाल तो सजवा लूँ, तुम्हारा क्या है घूमते हो और खाते होकाम धाम कोई तुम्हें है नहीं, ना मिली तुम्हे छोकरी, ना नौकरीखाओ मटन पर पहले कमीज के बंद कर लो बटन

बटन नहीं हैचेन हैआज मन बड़ा बैचैन हैचाकरी नहीं करते हम किसी की, पैसा इतना है, क्यूँ करनी, धन्धा हमसे होगा नहीं, बाँध लेता है,  शादी कर के, शराब की दुकान की सेल बड़ाने का भी मेरा कोई विचार नहीं हैयाद आया घर में अचार नहीं है

अचार भी रखा है दुकान पर, ले लेनाखुलवा ही दोगे शटर तुमबड़े ही बेग़ैरत क़िस्म के इंसान हो के नहीं,

खोलता हूँ और तोलता हूँबातेतुम्हारी

बोलो बड़बोले भाई, मेरी मानो दाड़ी भी कलर करवा लोसफ़ेदी की चमकार के चक्कर में कहीं रिन वाले ले ना जाए आपको इशतहार के चक्कर मेंआपके, मुँह पर वैसे फ़्रेंच कट अच्छी लगेगीबना दूँ

ये क्या फिर से वही फटी क़मीज़, कितनी बार पहनोगे जनाब, अब कंधा देदो इसे भाई साहब

 

रुको रुको भाईऐसी वैसी कमीज नहीं है,इस क़मीज़ से प्यार है मुझे,  बाबूजी ने मेरे जन्मदिन वाले दिन, रात को ९ बजे दुकान खुलवा कर ख़रीदी थी मेरे लियेआज रेडीओ के मुँह पर ताला क्यूँ लगाया हुआ हैचलाओ इसे या बेच दो

 

भैया साइकिल की चेन उतर गयी है ज़रा खेंच दो

 

यह लो नवाब साहबबोलो तो पंक्चर भी कर दूँ, लगा दूंगानाइ गिरी कुछ ख़ास ना चल रहीसाइकिले ही बना दूंगाजैसे ठाकुर साहब, वैसे साहबजादे

 

ये लो, चला दिया बाजा, तुम्हें देख लिया था आते हुए, इसीलिये बंद किया था, एक ही राग चले सोचा था,

अब आपके लिए पेश है, भूले बिखरे गीत, इसकी फ़रमाइश की है, नाम गली के, गुमनाम भाई ने,

लग जा गले की फिर ये हसीं रात हो ना हो, शायद फिर इस जन्म में मुलाकात हो ना हो

 

कहानी ले लो, कहानी ले लो, मुझसे मेरी जवानी ले लो

 

लो आ गया, पगला यहीं काकहने को पागल है, बातें इसकी किसी स्कूल मास्टर से कम नहीं… 

कैसे दी कहानी?

अभी कहाँ दी, तुमने माँगी नहींकौनसी लोगेआज वाली या कल वाली

कल वाली

कल आ जाना दुकान पे, आज लिखूँगा, रात को पड़ूँगा, सुबह ले लेना

वाह, ठीक है, कल ले लूँगा,

भैया ये पागल है, या बनता है?

ये तो नहीं मालूम, एक बार पूछा तो, बड़बड़ाने लगा,

कुछ दोस्त बनाए थे हमने हम उनसे प्यार किया करके

वो मुस्कुरा के मिला करें और सीने पे वार दे जी भर के…”

 

सच कहा, फ़्रेंच कट काली दाड़ी पर जमेगीएकदम मस्त लगेगी, बना दोरुको यह क्या यह क्या दाम बड़ा दिए, कल तक तो ३० रुपए लिखे थे, आज ३३ कर दिए

 

हाँ भाई, काम कम है, सोचा दाम बड़ा देता हूँ,  तुम मटन के साथ खाते हो, मैं प्याज़ के साथचला लेता हूँ

वाह, शायरी सूझ रही है

लगता है कल वाला दर्द फिर उठा है, मेरी दाड़ सूज रही हैचलता हूँ, फिर मिलता हूँ

ये लो १०१० के ३ और ११ के तीन, पूरे ३३

 

शुक्र है, बातो का गोदाम गया, अब गाने सुनता हूँ और ताने बुनता हूँ

 

चाचा, किस विचार में खोए हो, अचार डाल दिया या आँखे खोल सोए हो….मुफ़्त में लूँगा और रुपया १ ना दूँगाअच्छा राम रामकल परसों आऊँगा करने दुआ सलामआम के आम और गुठलियों के दाम

 

चाचा चलो आओ खाना खा लेआज मैं मटन लाया हूँऔर तुम तो वही लाए होगे, जली कटी रोटी और अचारकितना अचार खाते होघर पर ही बनाते होअचार से याद आयाआज वार क्या है?

आज सोमवार हैकल मंगलजय हनुमान !!

मेरा बूंदी प्रशाद ले आना जब जाना, सारा ख़ुद ही मत खाना,  पिछली दफ़ा का इस बार ना चलेगा बहाना

वार पूछा क्योंकि मैं तो तुम्हें बताना भूल ही गयारात को बॉम्बे जा रहा हूँछोटी से मिलने

वहाँ से दिल्ली६ जाऊँगा बड़ी से भी मिल आऊँगा,  दिल्ली का मौसम सुना है इस बार दिसम्बर में भी गरम है

कल ट्रेन पकड़नी है… रेज़र्वेशन भी नहीं हुआ,  RAC में जाना पड़ेगा… टी टी तो अपने शर्मा जी हैप्रशाद ले जाऊंगा प्यार बढेगा..

अच्छा विचार हैऔर मेरी ओर से तुम छोटी और बड़ी के लिए ले जाओइस बार बहुत अच्छा बना है अचार ले जाओपैक करता हूँ

और मेरी भी दुआए ले जानामेरा फ़ोन नम्बर बदल गया है लिख लोकोड वही – 05278 आगे – 06121992

राज़ी ख़ुशी जाओ, और जल्दी लौट के आओहाल चाल बाँटते रहनाअच्छे दोस्त मिलते नहीं आजकल

मैं रहूँ या ना रहूँ, तुम मुझ में कहीं बाकी रहना, बस इतना है तुमसे कहना

यह फ़रमाइश की है चाचा ने राम भूमि से

चाचा, ये तुम ही हो ना, मुझे पता है तुम्हें ये गाना बहुत पसंद है, ना जाने क्या चला गया कान में सुबह से नाक बंद है

ये लो, बीच वाले जीजाजी का फ़ोन भी आ गया,

हेलो जीजा जी कैसे हो आज कैसे याद कियाक्या, कल आ रहे होलो और मैं दिल्ली जा रहा हूँ सुबह की गाडी सेअब तुम्हारा इस्तक़बाल चाचा करेंगेठीक है बोल देता हूँनमाज़ के बाद मस्जिद के सामने ही मिलेंगेरखता हूँ

चाचा कल जीजा जी आ रहे है, कार से, सेवा करने… अब तुम ही करना उनका स्वागतमटन बहुत शौक़ से खाते हैरोटी जलाना मतमैं शाम में पहुँच के फ़ोन करूँगानम्बर लिख लिया है मैंनेआज जल्दी जाऊँगा, खाऊँगासुबह की गाड़ी हैअभी बनानी ख़ुद की भी दाड़ी है, रात में ही बनाऊँगापहले जाते ही गरम पानी से नहाऊँगासर्दी बड़ी है

वर्दी छोटी पहन के आये हो दरोगा साहबबैठो खाना खाओगे या कुछ और

हाँ तो चाचा और तुम अपना ध्यान रखनाजुम्मे की नमाज़ में दुआ करनाबूंदी मैं ले आऊंगाजल्दी वापस आऊंगाखाने का भी रखना ध्यानजली कटी सुनाने वाला नहीं है कोईजली कटी रोटी से ही काम चलाते होबड़ी जल्दी जल्दी खाते हो

लो आ गया तुम्हारा चहेता ग्राहक

हाथ धोलो और ९ किलो मटन तोलोअभी भी ९ किलो ही लेता है या बड़ा दियाहोटल इसने अच्छा चला दियाएक बार ही खाया थालेकिन ज़ुबान पे आज भी स्वाद है

बैठिये दरोगा साहब..बाल कटवाओगे या शेव कर दूँऔर कुछ नहीं तो जेब ही भर दूँ

क्या बोलते रहते होतुमसे पैसे लेंगे, शेव करो हम तुम्हे कुछ नहीं देंगे

 

चाचाचाचाक्या इरादा हैअँधेरा होगा थोड़ी देर मेंआज दुकान बढ़ानी है या रात यही बितानी है… चलो चलेफ़ोन कर देना पहुँच करखुदाहाफिज

राम राम चाचाकर दूंगा उतरते ही

 

हे भगवान् ६ बज गएअर्रेलौंडे रिक्शा निकाल और सीधा प्लेटफार्म में डालभगवन तेरा भला करेले किराया और पकड़ अगली सवारीआ गयी गाड़ी हमारी

सफ़र बहुत लम्बा था, आराम से कट गया फिर भी… बॉम्बे की बात ही कुछ और हैसमंदर भी है, सितारे भी, मिलते यहाँ किनारे भीपर घर की बात ही कुछ और है… भैया एक चाय देना, और रेडीओ की आवाज़ बड़ा लेना

यह लो भाई सुन लो

तेरा शहर जो पीछे छूट रहा..कुछ अन्दर अन्दर टूट रहा

 

भैयाजी यहाँ फ़ोन कहाँ है, STD करनी है

आगे, सीधा जा के उलटा हो जायिएऔर कटिंग चाय के ३ रुपये लायिए

लीजिये १० का है

दिए और खयालो में चल पड़ास्टेशन देख हैरान..इतना बड़ा

चल बेटा, गाड़ी गयी, अगली की तैयारी कर,

और नाश्ता लगा दे, मेरे लिए १ वड़ापाव सजा दे

 

ये गया सीधा, हुआ उलटा, और झट से पलटा, बाक़ी पैसे लेना जो भूल गया था

सीधा, उलटा, वापस दुकान पेआया और धीरे से चिल्लाया, भाईजीएक फ़ोन मिलाना है, मिला दो, और वो स्टूल इधर खिसका दो

नम्बर बताइए

स्टूल क्या करेंगे, मेरी कुर्सी पे आ जायिए

हँसते हँसते, मेरी हँसी छूट गयीऔर दरवाज़े में अटक घड़ी टूट गयी, देखा तो टाइम ९ बता रही थीअब तक तो चाचा नमाज़ पढ़ के, मस्जिद के सामने अड़ के खड़े होंगेजीजा भी पहुँच गए होंगे, रुकता हूँ १० मिनट बाद करता हूँ

आज की ताज़ा ख़बर, आज की ताज़ा ख़बर

क्या ताज़ा होगा, सब वही होगा सोच के मुस्कुरा दिया और नम्बर बता दिया

कोड 05278 आगे 06121992….घंटी बज रही है,

उठा नहीं रहे

सेठजी सुनिये आप पकड़िएबाजू वाली दुकान का महूरत हैहवन हो रहा हैमैं अटेंड कर के आता हूँअंदर आईये और आराम से मिलाइए, मैं जा के आता हूँ, आप बैठ जायिए

चाचा तो एक ही घंटी में ही उठा लेते है फ़ोनकभी कभी तो बजता हैहमारे सिवा उन्हें करता है कौन

नम्बर चेक कर लेता हूँ..कोड 05278 आगे 06121992…सही है, मिलाया और घंटी ही जा रही है

फिर जवाब नहीं आया..और जैसे ही अखबार की आज की ताज़ा ख़बर पर पड़ी मेरी नज़र

 

उधर हवन हुआ सम्पन

ॐ भूर्भुवः स्वः

और इधर मैं

~ सरहद…

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बहुत पानी बरसा उस रात,  हर आँख नम और सैकड़ों दिलो में था ग़म,

फिर दो चार दोपहर बाद ढल गयी होंगी यादें, सैकड़ों के ज़हन से

बाक़ी जो बुझे थे दिये, आज भी इक आग बन दिलों में जल रहे है,

सूरज ढल गए थे जिनके अब बस दिन निकल रहे हैं

१० बरसख़ौफ़नाक और दर्दनाक

 

सर, मे आय टेक योर ऑर्डर प्लीज़

Sure, जूस

गोली ख़ून गयी चूस

 

सर, फ़ोर यू all…

ओमलेट…and ब्रेड slices

उन ३ को भी बेड ही नसीब हुआ, हमेशा के लिए

 

मैडम,  how may I help यू

उसने, उसकी मदद की, जान पर खेल कर, सीना बच गया उसका पर पीछे से हुआ वार

हौसला दमदार था और दुश्मन कमज़ोर

सुबह का समय था, बचा ले गया फिर भी किचन से

help किए बिना नहीं जाना चाहता था वो

 

ये तो बस ३ क़िस्से थेशायद ३ हज़ार परिवार मरें होंगे उन ३ रातों में

अगर और भी जाते तो क्या होता?

क्या छोड़ा क्या सँवार दिया बँटवारे नें?

वही टुकड़ा अब बाहर है जो कभी अंदर था,

एक थाबाँट लिया, काट लिया,

राज करने को, हुकूमत बनाने को,

ज़मीन बाँट ली अपनी अपनी सरकार चलाने को

 

घर छोड़, कहीं और जा बसे, घर के साथ ख़ुद को खो दिया… 

ग़ुलामी थमा दी हुजूम को, कहने को आज़ादी का बीज बो दिया

हम ना समझ पाय पर शायद सत्ता ने गुथी सुलझा ली थी,

कभी एक कहानी कभी क्या क़िस्सा सुनाते रहे,

और हमें उल्लूकापट्ठा बनाते रहे

 

यही हुआ था, सुबह का कोई ऑर्डर वैसा ना पूरा हुआ जैसा मँगा था,

हर ऑर्डर एकदम एक जैसा था, ख़ौफ़नाक और दर्दनाक

सुना है मौत पानी के रास्ते सरहद पार से आयी थी,

आदमी, तूने पानी में भी बनायी थी

~ ?…

ख़ुश तो बहुत होंगे आज तुम,

मैंने सारे सवाल निकाल दिए,

 

मगर तुमने जवाब किसी एक का भी नहीं दिया,

वैसे, अच्छा ही किया जो तुमने जवाब नहीं निकाले,

निकाल देते तो ख़ाली हो जाता रिश्ता हमारा…

 

मेरे ख़याल से,  तुम जवाब किसी काग़ज़ पे लिख दो,

और रोज़ सिर्फ़ एक जवाब पड़ना, देखना ज़रा कैसा लगता है?

कुछ हो, तो समझ लेना जवाब सच्चा था,

नहीं तो, समझ जाना तुम्हारी सच चुराने की आदत अभी भी गयी नहीं है…

 

और, मेरी फ़िक्र ना करना, मेरा किसी से ज़िक्र ना करना,

मैं तो ख़ाली भी हो चुका हूँ,

और को भरने के लिए एक ही काम करता हूँ,

याद है हमारे दो गिलास, अब…मैं दोनों अपने लिए भरता हूँ…

 

कल जब मैं अपना गिलास और ख़ुद को भर रहा था,  तो एक सवाल ना जाने कहाँ से तैरता हुआ उभर आया, शायद रह गया था  ज़हन के किसी कोने डुबा हुआ…

मैं भी हँसा शायद आज गिलास ज़्यादा भर लिया है, सवाल उठ कर ऊपर तक जो आ पहुँचा जो था…

और सवाल था…वक़्त क्या है?

तुम तो बहुत पड़ते हो, तुमने ज़रूर पड़ा होगा, शायद तुम पहले से ही जानते भी होंगे…

 

तुम्हारे मेरे साथ होने ओर ना होने के बीच में जो गुज़रता नहीं है ना…वो वक़्त है…