~ आम…

 

फलों के राजा आम ने कुछ खास करने का तय किया,

छोड़ा पेड़ और किया प्रस्थान, कर दिया उसने ऐलान

अब आम, आम नहीं रहा वो एकदम खास हो गया,

अब आम, आम नहीं रहा वो वो इलीटक्लास हो गया

शहर के बीचोंबीच उसका अब अपना एस्टेट था,

अपॉइंटमेंट के बाद भी मिलने को करना पड़ता उसका वेट था

 

इन सब आम की किस्मों में एक किस्म पहले से ही थी खास,

मोर इक्वल दैन अदर्स वो, उसके सामने सब इक्वली बकवास

खास एंड प्रीमियम किस्म ने सोचा अब थोड़ा बदलाव लाया जाए,

सबसे उमदा क़िस्म का नाम गुरु, बाक़ियों को भक्त बुलाया जाए

गुरु का काम था देना प्रवचन सुबह और शाम, ले के प्रभु का नाम,

भक्त प्रवचनों पे अमल करते, जो ना ले प्रभु ना नाम उससे लड़ते

 

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ऐलान हुआ सिर्फ़ आम ही पेड़ पर उगेगा और कोई फल नहीं,

पेड़ सारे बाक़ी लिटाए जाने लगे, जो ना लेते कटवाए जाने लगे

बाक़ी फलों को ये बात खलने लगी, बदले की आग जलने लगी,

सब हुए एकजुट, गन्ने को चुना प्रधान, आगे सुनाऊँ या ख़ुद ही लेंगें जान

आम का पलट वॉर, सब गुठली वालों को भाईबहन बना लिया, लगाया घाव,

नफरतों का बो दिया बीज वहां जहाँ बीज ही नहीं थे, खेला कमल का दाँव

 

अब सब गुठलियाँ एक और, दूसरी और बेचारे गिने चुने केले, गन्ने वगैरहा,

यही होता हैं ना खास होने का मज़ा मसल दो पीस दो जो मांगे कोई जगह

वही किस्साहर आम खास होना चाहता है हर खास खास रहना चाहता है,

आम और खास की युगोंयुगों की लड़ाई, हर दौर में जाती है दोहराई

अब फल हटा कर जानवर लगाओ या फूल पत्तों को लड़वाओ,

कुछ ना बदलेगा, खास खास रहेगा और बेमौत हर बार आम ही मरेगा

~ डिवाईडर…

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ये जो शहर कि सड़क है ना, ये हम तुम हैं,

इस सड़क, यानी की हमारे चेहरे की झुर्रियाँ फ़ुटपाथ,

और इस फ़ुटपाथ के होंठ भी हैडिवाईडर,

अक्सर गुलाबी हो जाते हैं ये डिवाईडर,

कभी एक, कभी दो पाँच साल में पक्का नहीं तो,

जब चुनाव आने को होता है

 

साल दर साल हमारी तर्रक्की के निशान, डिवाईडर,

ठीक ठाक दिखते होते नहीं हैं हम,

तोड़े फिर काम चलाऊ जोड़े जाते हम,

आगे बड़ रहे चुनाव के चक्कर में हथोडे पड़ रहे,

हमारी हालत का अंदाज़ा नेता सिर्फ़ डिवाईडर से लगाते,

जो फ़ुटपाथ डिवाईडर सँवर रहे, मतलब नेताजी चुनाव लड़ रहे

 

धूल मिट्टी चाट चाट एक रंग की हो गए,

एक सफ़ेद एक काला फिर एक सफ़ेद फिर एक काला,

कहीं सफ़ेद पिले का जोड़ा कहीं काले पिले का,

वक़्त की धूल सारे भेद भाव मिटाती रहती,

लो फिर जैसे ही हुई घोषणा चुनाव है,

सरकार हमें तोड़ती, फिर बड़े भाव से भेद भाव ओड़ती

 

ना देश बदलता ना बदलते सड़कों के हालात,

डिवाइड एंड रुल बदल डिवाईडर हो गया है,

बार बार बदला जा रहा है,

इसी पैसे से फिर चुनाव लड़ा जा रहा है,

नेताजी के पिताजी के मामाजी के बेटे, कांट्रैक्टर हैं,

पहले कंडक्टर थे और अब सेमीकंडक्टर

 

कल बारिश में मुझमें फिर जगह जगह पानी भर गया,

डिवाईडर जो कल बना था जगह जगह से आज उखड़ गया,

मेरे होठों का काला पीला सफ़ेद जगह जगह से फीका पड़ गया,

नेताजी के पिताजी के मामाजी का बेटा, वही सेमीकंडक्टर,

जगह जगह आज उसका अपना मकान है,

यहाँ हर फ़ुटपाथ शमशान और मेरा भारत महान है

~ आँच…

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सुनो आँच ज़रा धीमी कर दो, चावल देर से पकेंगे,

और हम कुछ और देर तलक साथ लिपट लेंगे

कुछ कहना नहीं, आज तुमने फिर पाज़ेब को पहना नहीं,

चावलों को धीरेधीरे पकने दो, कुछ और देर सर रखने दो

थोड़ा सा होंठों में फाँसला करो, जो जगह मिलेगी,

आज कच्चे चावल खिला देना, मेरे होठों को चबा देना

बीचबीच में आँखें मुँदना, आज चावलों का पानी पिला देना,

तुम कूदना और मुझे फाँदने की वजह देना

आज ख़्वाब सज़ा लेते है, रहने दो चावल, रात भर पका लेते है,

पकने दो उन्हें भी, जगने दो हमें भीसहर तक, दोपहर तक

 

~ घुसपैठिया…

~ घुसपैठिया…

मेरे दिल को वो अपना है घर कर बैठा,
सामान मेरा सब इधर उधर कर बैठा,
ना चाबी लगायी ना तोड़ा उसने ताला ,
ना जाने कैसे है वो बसर कर बैठा…
घुसपैठिया…

ना उठाया मुझे ना मुझको जगाया मुझे,
ना चीख़ा पुकारा, ना आवाज़ लगायी,
ना जाने कैसे तय वो ये सफ़र कर बैठा,
वो रुख़ कैसे अपना इधर कर बैठा है…
घुसपैठिया…

मेरे तकिए पे वो अपना सर कर बैठा,
अलमारी में मेरी अपनी बुशर्रत टाँग के,
पतलून को मेरे कुर्ते की नज़र कर बैठा,
कैसे वो इस घर को अपना घर कर बैठा…
घुसपैठिया…

मेरे पसीने को अपना इत्र बनाके, उसको लगाके,
वो ख़ुशबू को मेरी है अपनी ईत्र कर बैठा है,
बरामदे में मेरे उसने अपनी चारपायी बिछायी,
मेरी रातों की नींद में अपनी वो सहर कर बैठा…
घुसपैठिया…

मेरी माँ को वो अम्मी है कह कर बुलाता,
मेरे डैडी को अपना फ़ॉदर कर बैठा है,
ख़ुद मेरी जान मुझको जानेजिगर कर बैठा,
मेरी कश्ती में तैर वो सारा सफ़र कर बैठा…
घुसपैठिया…

वो बारिश में अपनी मुझे तर-बतर कर बैठा,
वो आलू और मुझको है मटर कर बैठा ,
मैं बिखरी हुई थी वो मुझको बाहों में लेके,
गुम थी कहीं मैं, मुझको वो ताज़ा ख़बर कर बैठा…
घुसपैठिया…

~ जिस्म-फरोशी…

 

दुश्मनों को भी दोस्त बना देती है,

राजनीती है ये कुछ भी करा देती है,

भाई को भाई से दरकार नहीं होती,

ये आम आदमी की सरकार नहीं होती

 

यहाँ गरीब ही आना, गरीब रहना पड़ता है,

बदनसीबों का बन के नसीब रहना पड़ता है,

और जिन के भरोसें इनकी गाडी चलती है,

छुपछुप के उनके करीब रहना पड़ता है

 

नयेनवेलों को परवाज़ की हिदायत नहीं होती,

आचरण में दाग ना हो तो कोई इनायत नहीं होती,

पर्दा है, परहेज़ है, सफ़ेद कुर्ता शराफत का दस्तावेज़ है,

काले को सफ़ेद बनाती है, राजनीती सब को कहाँ आती है

 

खाने के खिलाने के पुख्ता इंतज़ामात होते है,

शराफत सड़क पर नंगी सोती रौनक महलों में होती है,

यहाँ ना भाई भाई का हुआ बाप को बेटे से खतरा होता है,

राजनीती जिस्मफरोशी है कोई किसी के साथ भी सोता है

~ हुजूम…

बेहोशी के आलम में आज सारी आवाम हैहुकूमत किसीकी भी हो, ये सत्ता की गुलाम है,

ये अंधी, ये बेहरी है, और हाल जो हो, जैसा होआना इसी पर इल्जाम है, हुजूम इसका नाम है

 

आलम ये है अब के अव्वल तो सब डिजिटल है, और बैठ बंद कमरों डीजीटाइज़ेशन भी कमाल का,

वो कमरे अफवाहों के मैन्युफैक्चरिंग प्लांट बने बैठे हैंअफवाहे बनायीं, उड़ाई और आखिर में ख़बरे बन आती हैं

 

मुद्दों से मुख्तलिफ है मगर हुजूम में अक्ल की कमी नहींहुजूम बेरोज़गार है, कहीं भूखा कहीं बेघर है ये हुजूम,

कहीं अनपढ़, सरकार का खरीदा कारीगर कहीं हुजूमइस कमअक्ल हुजूम को सरकारी कारें चलाती हैं

 

इसलिए शायद ये वो भीड़ है जो मौकापरस्त हैमारकाट, पथराव तो कभी बलात्कार में मस्त है

हुजूम का ना कोई वजूद है ना है इसका कोई जूनूनउसके नाम पर कुछ भी लूट लो, क्या कर लेगा कानून

~ कबूतर…

आज अपनी छत के मैंने सारे कबूतर भगा दिए,

दो चार नहीं थे पुरे साठसत्तर भगा दिये,

उनके घोंसले को भी दूर नदी में बहा आया,

कहीं लौट ना आयें इसलिए फासले बड़ा दिये

 

जगह खाली है अब तो सोच रहा हूँ,

देखभाल के किरायेदार मैं रख लूँ,

किराया कम हो या ना भी दे तो गम नहीं,

नोच के खाने लगे थे जो रिश्तेदार भगा दिये

 

अब छत भी मेरी और पूरा घर भी मेरा है,

अब तो आने वाला हर खत भी मेरा है,

इत्मीनान से बड़ी ही फुरसत में रहता हूँ,

बेवजह मसरूफियत वाले कल मिटा दिए

 

सुबह से शाम फिर रात से अगले सहर तलक,

ना शोर होता है ना घनी ख़ामोशी होती है,

चिकचिक किलकिल मरना तिलतिल,

ज़िन्दगी से मैंने ऐसे सारे पल हटा दिये

 

अब कभी भी बिज़ी कभी भी फ्री हो जाता हूँ,

अपने मन की करता हूँ जो जी में आये खाता हूँ,

घर अब महल सा लगता है खुद को राजा बताता हूँ,

अब खुद गलती करता हूँ और खुद को सज़ा सुनाता हूँ

 

अकेलापन मुझे चाहने लगा है अब खुद से ही बतियाता हूँ,

जो भरी भीड़ हूँ कभी, तो भी अकेला खुद को पाता हूँ,

बैठा सोच रहा हूँ खिड़कियां बंद कर दूँ दरवाज़े भी चूनवा दूँ,

दिन को रात में बदल लूँ कुछ ऐसी अपनी दुनिया बना दूँ

~ हस्ब-ए-ज़रूरत…

 

भरी महफ़िल में सिर्फ़ मेरा जाम ख़ाली है,
ये कैसी खुन्दक तुमने सरेआम निकाली है…

दो चार को जानता हूँ बाकी चेहरे नए हैं,
बिन बुलाये आये हैं या सब बुलाये गए हैं…

हमको तो लगा घर आना है हम वैसे ही आ गए,
ये कुछ खास हैं जो सब चमक-धमक के आ गए…

अर्रे वाह, वहाँ तो खूब दस्तरख्वान सजाया है,
लगता है तुमने हमें यूँ ही ज़बरदस्ती बुलाया है…

आज देखा दरवाज़े पर तुमने मेहमान-नवाज़ी की,
हमसे क्या खता हुई जो हमसे नज़र-अंदाज़ी की…

सुना था तुम्हारे मेहमानों को कानों-कान फुसफुसाते,
कि दोस्त भी अब तुम बिना मतलब के नहीं बुलाते…

बता देते तो हम गुज़रे सालों के एल्बम उठा लाते,
शायद ऐसे ही हम महफ़िल में तुम से मिल पाते…

सुना था “आप कहें और हम ना आए ऐसे तो हालात नहीं”
लगता गलती से है न्योता भेजा, अब वैसी कोई बात नहीं…

 

~ ज़ोहरा…

 

इक शोख़ हसीना थी, बड़ी पूर-ज़ौक़ हसीना थी,

आँखे मुंदू तो नज़र आती, खोलूँ तो कहीं ना थी…

 

इक हादसा हो जैसे कहीं भी दिख जाती थी,

जो ज़हमत उठा धूँडू तो वो गुज़रा महीना थी…

 

काग़ज़ पे कलम सी बिखरती थी वो बड़ी ही खूब,

वो थी स्याही की बोतल जिसमें जाता था मैं डूब…

 

वो नीचे से ऊपर ज़मीन को आसमान से मिलाती थी,

मैं बैठा पेड़ की छाओ में, वो परछाई मेरी बन जाती थी…

 

वो ज़ेहरा थी, वो ज़ोहरा थी, वो चाँद थी हीरा पन्ना थी,

मुझे मिलती थी मेरे ख़्वाबों में, वो मेरी तमन्ना थी…

 

वो मिली नहीं मुझको वो गुम है, वो गुमशुदा है,

ढूँढो उसे मिलवाओ मुझसे, वो मुझसे जुदा है…

 

मैं हूँ मंतो सा बावरा वो मेरी अल्हड़ इसमत है,

मैं हूँ इक फूटे घड़ा सा वो मेरी मुकम्मल क़िस्मत है…

~ तस्वीर…

माँ कल मुझे इक खिलोना दिला देना,

कल ईद भी है कुछ मीठा भी बना देना

सुबह ठंड भी होती है तुम मुझे अभी नहला देना,

कल भूल गयी थी, जो सोने लगूँ मेरे बालों को सहला देना

और फिर आने को फ़ूफ़ी का निकाह है नयी पोशाक लेनी है,

इस बार ना पहनूँगा वो जो पहले भी पहनी है

एक बात और थी, कुछ पूछना था तुमसे,

सब छेड़ते है मुझको अब्बू का नाम बता दो,

वो जो देख के रोती हो वो तस्वीर दिखा दो