~ और मैं था दोपहर में…

सारा शहर इश्क़ में था, और मैं शहर में,

रात आखिरी पहर में,

और मैं था दोपहर में

 

चारों ओर फैली थी ख़ामोशी, और मैं ख़बर में,

धूप थी, लू चल रही थी,

और मैं था दोपहर में

 

जमघट में हर कोई तत्पर था, और मैं यमुना तट पर था,

दिन जाने को था शाम आने को थी,

और मैं था दोपहर में

 

कश्तियाँ किनारे पर खड़ी थी, और मैं था लहरों में,

किरणें तैर रही थी पानी में,

और मैं था दोपहर में

 

दुकानें बड़ रही थी, और मैं घाटे में,

मुनाफ़ा था सफ़र में,

और मैं था दोपहर में

 

रात दूध जलेबी सी थी, और मैं खट्टे में,

अँधेरा था शजर पे,

और मैं था दोपहर में

 

अँधेरा दिन निगलता रहा, और मैं पिघलता,

ख़्वाहिशें थी बिस्तर पे,

और मैं था दोपहर में

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~ कहीं सवाल, कहीं जवाब…

हदों से गुज़र रहा हर हद पार कर रहा,

कहीं से बन रहा तो कहीं से उखड़ रहा

इस क़दर अथाह, बेपनाह जैसे आसमान,

दूर कहीं उतर रहा और कहीं चड़ रहा

गहराईओं में लुप्त, अचेत, खाली खंडहर,

शान्त खामोश कहीं तो कहीं से बवंडर

सपाट मीलों तक फैला, अनन्त रेगिस्तां,

सभ्य कहीं से ज़रा, कहींकहीं से शैतान

सूक्ष्म ध्वनि, तीव्र और एकदम सटीक,

जितना ख़राब बिलकुल उतना ठीक

एक सोच, विचारधारा, अद्भुत ख्याल,

कहीं से लगे जवाब तो कहीं से सवाल

भद्र, उदार अलौकिक निरन्तर निर्मणाधीन,

संसार में कभी तो कभी आत्मा में विलीन

गुरु, सिद्ध साधुसंत और पैगंबर पीर,

दास कहीं, भक्त कहीं, कहीं कहीं से कबीर

~ क्रेज…

~ क्रेज…

मेरे मुल्क में एक शहर है

और शहर में एक मकान,

उस मकान में एक जान,

जान में एक रूह है बसी,

उस रूह की ये व्यथा है…

कैसे मैं ये विवरण करूँ,

रात दिन बस तेरा ही स्मरण करूँ,

स्तुति करूँ मैं तेरी हर पल,

तीर्थ को करूँ तेरा ही भ्रमण,

विचारों को मेरे तू देती शक्ति,

कैसे करूँ मैं ये अभिव्यक्ति,

तेरी आस्था में मैं लीन मैं,

तुझमें में ही मैं विलीन हूँ,

देह को तुझपे न्योछावर करूँ,

तू है तो किसी से मैं क्यूँ डरूँ…

तुझमें सूर्य सा तेज है,

हे प्रधानमंत्री की कुर्सी,

मुझको बस तेरा ही क्रेज है…

~ सियासत…

~ सियासत…

सियासत में ज़रूरी है ज़रा सा ध्यान रखना,

थोड़ा झुकना ज़रूरी है अगर ऊँचा है उठना…

कोई झुकता कहाँ हैं…

ज़रूरी ये भी ईमान को संभाल रखना,

बिन पैंदे का लोटा बन इधर उधर ना लुढ़कना…

कोई टिकता कहाँ है…

और लाज़मी है ज़ुबान पे मिश्रियाँ रखना,

नफ़रतें दूर रख घोलना मुहब्बत दिलों में…

कोई रखता कहाँ है…

ज़रूरी है समझना और बाँटना दर्द सबका,

सब को साथ लाना सब को साथ रखना…

कोई लाता कहाँ है…

बेहद लाज़मी है बड़ा कर हाथ उठाना,

वादों को याद रखना और उनको निभाना…

कोई निभाता कहाँ है…

सबसे ऊपर है सियासत में रियायत की हिफ़ाज़त,

ना उलझना बेकार बहस में ना आपस में लड़ाना,

कोई सुनता कहाँ है…

सियासत वो है जो दे एक जैसा दर्जा,

असली चौकीदारी और बाद में चाय पे चर्चा,

सब उलटा होता यहाँ है…

~ पेशा…

~ पेशा… 

जनाब आप काम क्या करते हो?

~ थोड़ा अलग पेशा है मेरा, यूँ समझो मैं लाश के मुँह से क़फ़न का कपड़ा उठाने का काम करता हूँ…

ये कैसा काम हुआ जनाब…क्या आप लावारिस या गुमशुदगी वाली लाशों की शिनाख्त करवाते हो?

~ कुछ यूँ ही समझ लो…मगर शिनाख्त अक्सर मुकम्मल नहीं होती,  मैं तो क्या दुनियाँ जानती है मगर जिसकी लाश होती है वो मुकर जाता है…

वो क्यूँ भला जनाब, जब सब जानते हैं तो जिसकी है वो क्यूँ मुकर जाता है, कहीं आप चोर-उचक्कों की लाशों के मुंशी तो नहीं हो?

~ मुंशी, हाँ कुछ वैसा ही पेशा है, हिसाब किताब का…

जनाब, मिट्टी डालिये ऐसे वाहियत काम पर ये तो कोई भी ऐरा-ग़ैरा अनपड़ कर लेगा, आप तो खासे पड़े लिखे लगते है…

~ पड़ा लिखा हूँ इसीलिए तो करता हूँ…

जनाब मैं कुछ समझा नहीं, लाश के मुँह से कफ़न का कपड़ा ही तो हटाना है, कोई भी हटा लेगा…

~ लेकिन हटाता कहाँ है कोई, और मुझे भी कहाँ हटाने देते है, आए दिन इक नया इल्ज़ाम मेरे बारे में आम करते रहते हैं, चाहते हैं मैं ख़ौफज़्दा हो ये काम छोड़ दूँगा, लेकिन मैं अपने पेशा-ए-वजूद से धोखा नहीं कर सकता, यही तो आता है मुझे…”लाशों के मुँह से कफ़न का कपड़ा हटाने का”…

जनाब कौन सी लाशों के मुँह से कपड़ा उठाते हैं आप?

~ सच की लाश से…अक्सर सच ही तो मरता है, लावारिस…

~ चल तू-तू मैं-मैं करते हैं…

~ चल तू-तू मैं-मैं करते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं

फिर धर्म के नाम पर मरते हैं

चल बहस करें बे सिर-पैर की

लाशों के ढेर लगाते हैं

इज़्ज़त की उड़ा धज्जियाँ

कारों और बसो को जलाते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं…

क्या खाया क्या पहना जाए

इसकी एक लिस्ट बनाते हैं

शहरों के नाम बदलते है

कुछ दंगे नए भड़काते है

पड़ोसी को देख जले पड़ोसी

भाई को भाई से लड़ाते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं…

चल देश विदेश की सैर करें

देखें सब आपस में बैर करें

कुछ पुतले नए बनाते है

कुछ बच्चों को भड़काते हैं

चल हरे को भगवा चढ़ाते है

दिलों में आग लगाते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं…

आया है मौसम चुनाव का

अब मुद्दे नए बनाते हैं

ये जनता तो बेचारी है

चल चुना इसे लगाते हैं

बातों में इसे फँसाते है

कुछ सपने नए दिखाते है

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं…

आपस में बिन बात के लड़ते है

छलकपट, दांवपेच लगाते है

माँगें जो पुराना हिसाब कोई

इतिहास में उसे फ़साते हैं

ऐशोआराम से हमको काम,

पहले वोट, फिर जेबों को भरते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं

चल तू-तू मैं-मैं करते हैं…

~ हुनर…

~ हुनर

इस बलखा के चलती कलम का हुनर तो देखो,

जहाँ कोई ना जाये, ये हर हाल गयी उधर तो देखो,

लोग रहते हैं लगें अख़बार की सुर्ख़ियाँ चाटने,

और ये ख़ुद बन गयी ताज़ा ख़बर तो देखो

हंगामा है चारों ओर ग़ज़ब का शोर है,

जैसे जंगल मस्त होके नाचा कोई मोर है,

ये काग़ज़ पे मचल के ग़ज़ल हो गयी,

भरी महफ़िल में इसका असर तो देखो

आज खुल के कुछ भी खाना दुश्वार है,

हवा में है ज़हर है, घर से निकलना बेकार है,

आदमी को आदमी से आज ईंटपत्थर का प्यार है,

लगी ये फिर से उगलने ज़हर तो देखो

अब ये सोचसोच के कितना कम लिखता हूँ,

सच सहना तो दूर अब कहने की भी मनाही है,

खबरे सब बिकीबिकाई, ये मुफ्त का अख़बार है,

ज़िद्दी है ये, फिर बरपा दिया इसने क़हर तो देखो

चुप चाप चलो और किसी पुल पर ना चढ़ना,

पुराना भूल जाओ नया इतिहास पड़ेगा पड़ना,

बादशाहसलामत आने को है सब सर झुका लो ,

ये फिर चल पड़ी उठा सर उधर तो देखो

~ किताबें…

~ किताबें…

किताबों की चादर किताबों का सिरहाना, किताबें ही ओड़ के सो जाती हूँ,
किताबों की सी दिखती हूँ, किताबों का हुआ जो ज़िक्र फिर उनमें खो जाती हूँ…

कल सुबह एक, दोपहर में दो और रात को देड़ ख़िताब खायी थी,
बीच में जो कहीं लगे भूख तो आधी किताब जेब में भी छुपायी थी…

कुछ किताबें मोटी हैं, कुछ पतली, कुछ लम्बी कुछ छोटी, ना एक खरी ना खोटी,
सब की सब बातूनी हैं, बहुत बोलती है, सब की सब कोई न कोई राज़ खोलती है…

किताबें ये सच में सिर्फ़ काग़ज़ के टुकड़े ही हैं ना, कहीं इनमें सच में तो जान नहीं,
कैसे मुमकिन है की ये सब कुछ जानती हैं, कहीं ये भी तो इंसान नहीं…

मैं भी तो एक किताब ही हूँ, चलता फिरता क़िस्सा हूँ जीती जागती एक कहानी हूँ,
ख़ुद को लिखती हूँ, ख़ुद सहफ़ा पलट ख़ुद को पड़ती, ख़ुद हर कहानी में ख़ुद से लड़ती हूँ…

अपनी इस किताब के चालीस सहफ़े चुकी हूँ पलट, कुछ पलटे आहिस्ता कुछ सरपट,
कुछ पलटते पलटते मुड़ गए, कुछ उधड़े कुछ सीए, चन्द इत्मीनान से जिये…

मैं और मेरी ये खुली किताब, और मेरी किताब में आखिरी हर्फ़ होगा इश्क़, तेरे नाम के साथ,
और जब लिखूंगी आखिरी सहफ़ा होगी आँखों में तस्वीर तेरी, हाथों में जाम के साथ…

~ दोस्त…कहीं खो गए हैं…

मेरे कुछ दोस्त कहीं खो गए हैं,

कुछ हिन्दू तो कुछ मुसलमान हो गए हैं,

बुलाते थे जिन्हें ओये, अबे, साले, गोरे, काले,

कुछ भगवे तो कुछ हरे हो गए हैं,

मेरे कुछ दोस्त कहीं खो गए हैं

 

बड़े प्यारे थे, दो चार नहीं बहुत सारे थे,

दिखाई देते थे सुबह शाम यूँ ही बकबकाते,

किसी काम के नहीं थे आवारा फिरते थे,

कुछ पुजारी तो कुछ मौलवी हो गए हैं,

मेरे कुछ दोस्त कहीं खो गए हैं

 

गली में जम के हुड़दंग मचाते थे,

होली में नहाते, ईद में मीठा खाते थे,

हाथ कंधे पे रख शहर भर घूम आते थे,

कुछ हवनसामग्री तो कुछ हाजी हो गए हैं,

मेरे कुछ दोस्त कहीं खो गए हैं

 

छत पर सब एक साथ सोते थे,

लड़ाईझगडे में पिट एक साथ रोते थे,

मेरे दादादादी, नानानानी उनके भी होते थे,

छोटे थे जो कभी वो सब बड़े हो गए हैं,

मेरे कुछ दोस्त कहीं खो गए हैं

 

मम्मीअम्मी के पूरीपराठें खाते थे,

पापाअब्बू से सब घबराते थे,

रोज़ मिलते हस्ते खिलखिलाते थे,

कुछ जल गए, कुछ दफ़्न हो गए हैं,

मेरे कुछ दोस्त कहीं खो गए हैं