~ अपनी तारीफ…

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किसे कैसा लगेगा यह सोच कर लिखता तो मेरी कलम आज तक मेरी तरह ही गूंगी होती, मैं वो लिखता हूँ जो मैं कहना चाहता हूँ…

अब इसके बाद मेरी लिखे को क्या अंजाम नसीब होता है ये मेरी परेशानी नहीं है, होती तब जब मैं अपने लिखे से मुत्तासिर नहीं हो पता हूँ, अगर मेरा लिखा मुझे ही ना हैरान करे तो इसके मायने है की या तो मेरे शब्द कमज़ोर रह गए या मुद्दे पर मेरी पकड़ ढीली रह गयी…

इसके बाद जो भी है वो मेरी भरपूर कोशिश हैं – जिस वक़्त वो लिखी गयी मुझे लगा वो उस वक़्त और मेरे अंदर के हालात को बेहतरीन तरीके से पेश कर पायी, कुछ अज़ीज़ लम्हो की वजह से अज़ीज़ हैं तो कुछ अपने-आप बयां करती हैं अपनी खूबसूरती की वजह…