~ पेशा…

~ पेशा… 

जनाब आप काम क्या करते हो?

~ थोड़ा अलग पेशा है मेरा, यूँ समझो मैं लाश के मुँह से क़फ़न का कपड़ा उठाने का काम करता हूँ…

ये कैसा काम हुआ जनाब…क्या आप लावारिस या गुमशुदगी वाली लाशों की शिनाख्त करवाते हो?

~ कुछ यूँ ही समझ लो…मगर शिनाख्त अक्सर मुकम्मल नहीं होती,  मैं तो क्या दुनियाँ जानती है मगर जिसकी लाश होती है वो मुकर जाता है…

वो क्यूँ भला जनाब, जब सब जानते हैं तो जिसकी है वो क्यूँ मुकर जाता है, कहीं आप चोर-उचक्कों की लाशों के मुंशी तो नहीं हो?

~ मुंशी, हाँ कुछ वैसा ही पेशा है, हिसाब किताब का…

जनाब, मिट्टी डालिये ऐसे वाहियत काम पर ये तो कोई भी ऐरा-ग़ैरा अनपड़ कर लेगा, आप तो खासे पड़े लिखे लगते है…

~ पड़ा लिखा हूँ इसीलिए तो करता हूँ…

जनाब मैं कुछ समझा नहीं, लाश के मुँह से कफ़न का कपड़ा ही तो हटाना है, कोई भी हटा लेगा…

~ लेकिन हटाता कहाँ है कोई, और मुझे भी कहाँ हटाने देते है, आए दिन इक नया इल्ज़ाम मेरे बारे में आम करते रहते हैं, चाहते हैं मैं ख़ौफज़्दा हो ये काम छोड़ दूँगा, लेकिन मैं अपने पेशा-ए-वजूद से धोखा नहीं कर सकता, यही तो आता है मुझे…”लाशों के मुँह से कफ़न का कपड़ा हटाने का”…

जनाब कौन सी लाशों के मुँह से कपड़ा उठाते हैं आप?

~ सच की लाश से…अक्सर सच ही तो मरता है, लावारिस…

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