~ कबूतर…

आज अपनी छत के मैंने सारे कबूतर भगा दिए,

दो चार नहीं थे पुरे साठसत्तर भगा दिये,

उनके घोंसले को भी दूर नदी में बहा आया,

कहीं लौट ना आयें इसलिए फासले बड़ा दिये

 

जगह खाली है अब तो सोच रहा हूँ,

देखभाल के किरायेदार मैं रख लूँ,

किराया कम हो या ना भी दे तो गम नहीं,

नोच के खाने लगे थे जो रिश्तेदार भगा दिये

 

अब छत भी मेरी और पूरा घर भी मेरा है,

अब तो आने वाला हर खत भी मेरा है,

इत्मीनान से बड़ी ही फुरसत में रहता हूँ,

बेवजह मसरूफियत वाले कल मिटा दिए

 

सुबह से शाम फिर रात से अगले सहर तलक,

ना शोर होता है ना घनी ख़ामोशी होती है,

चिकचिक किलकिल मरना तिलतिल,

ज़िन्दगी से मैंने ऐसे सारे पल हटा दिये

 

अब कभी भी बिज़ी कभी भी फ्री हो जाता हूँ,

अपने मन की करता हूँ जो जी में आये खाता हूँ,

घर अब महल सा लगता है खुद को राजा बताता हूँ,

अब खुद गलती करता हूँ और खुद को सज़ा सुनाता हूँ

 

अकेलापन मुझे चाहने लगा है अब खुद से ही बतियाता हूँ,

जो भरी भीड़ हूँ कभी, तो भी अकेला खुद को पाता हूँ,

बैठा सोच रहा हूँ खिड़कियां बंद कर दूँ दरवाज़े भी चूनवा दूँ,

दिन को रात में बदल लूँ कुछ ऐसी अपनी दुनिया बना दूँ

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