~ हस्ब-ए-ज़रूरत…

 

भरी महफ़िल में सिर्फ़ मेरा जाम ख़ाली है,
ये कैसी खुन्दक तुमने सरेआम निकाली है…

दो चार को जानता हूँ बाकी चेहरे नए हैं,
बिन बुलाये आये हैं या सब बुलाये गए हैं…

हमको तो लगा घर आना है हम वैसे ही आ गए,
ये कुछ खास हैं जो सब चमक-धमक के आ गए…

अर्रे वाह, वहाँ तो खूब दस्तरख्वान सजाया है,
लगता है तुमने हमें यूँ ही ज़बरदस्ती बुलाया है…

आज देखा दरवाज़े पर तुमने मेहमान-नवाज़ी की,
हमसे क्या खता हुई जो हमसे नज़र-अंदाज़ी की…

सुना था तुम्हारे मेहमानों को कानों-कान फुसफुसाते,
कि दोस्त भी अब तुम बिना मतलब के नहीं बुलाते…

बता देते तो हम गुज़रे सालों के एल्बम उठा लाते,
शायद ऐसे ही हम महफ़िल में तुम से मिल पाते…

सुना था “आप कहें और हम ना आए ऐसे तो हालात नहीं”
लगता गलती से है न्योता भेजा, अब वैसी कोई बात नहीं…

 

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