~ ?…

ख़ुश तो बहुत होंगे आज तुम,

मैंने सारे सवाल निकाल दिए,

 

मगर तुमने जवाब किसी एक का भी नहीं दिया,

वैसे, अच्छा ही किया जो तुमने जवाब नहीं निकाले,

निकाल देते तो ख़ाली हो जाता रिश्ता हमारा…

 

मेरे ख़याल से,  तुम जवाब किसी काग़ज़ पे लिख दो,

और रोज़ सिर्फ़ एक जवाब पड़ना, देखना ज़रा कैसा लगता है?

कुछ हो, तो समझ लेना जवाब सच्चा था,

नहीं तो, समझ जाना तुम्हारी सच चुराने की आदत अभी भी गयी नहीं है…

 

और, मेरी फ़िक्र ना करना, मेरा किसी से ज़िक्र ना करना,

मैं तो ख़ाली भी हो चुका हूँ,

और को भरने के लिए एक ही काम करता हूँ,

याद है हमारे दो गिलास, अब…मैं दोनों अपने लिए भरता हूँ…

 

कल जब मैं अपना गिलास और ख़ुद को भर रहा था,  तो एक सवाल ना जाने कहाँ से तैरता हुआ उभर आया, शायद रह गया था  ज़हन के किसी कोने डुबा हुआ…

मैं भी हँसा शायद आज गिलास ज़्यादा भर लिया है, सवाल उठ कर ऊपर तक जो आ पहुँचा जो था…

और सवाल था…वक़्त क्या है?

तुम तो बहुत पड़ते हो, तुमने ज़रूर पड़ा होगा, शायद तुम पहले से ही जानते भी होंगे…

 

तुम्हारे मेरे साथ होने ओर ना होने के बीच में जो गुज़रता नहीं है ना…वो वक़्त है…

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