~ न्यूटनस लॉ…

 

मैं, मेरा पजामा और उसका नाड़ा,
सोच रहें हैं चारों ओर क्यूँ है इतना कबाड़ा,
नाड़ा कहीं पजामे में गुम है,
ठीक वैसे, जैसे हर शक्स यहाँ इस कबाड़े में…

और इस कबाड़ के ऊँचे ढेर में जो बैठे हैं,
वो लगे हैं इल्ज़ाम लगाने,
ये कबाड़ मेरा नहीं हैं, गुनगुना रहे हैं,
मैं साफ़ हूँ, अत्यंत स्पष्टता से उलझा रहें हैं…

और मैं, जी हाँ मैं, अब मैं कैसे आयींने से झूठ बोलूँ,
ये सोच मैं यहाँ ख़ुद को आईने में झाँक रहा हूँ,
मैं भी इस कबाड़ का हिस्सा हूँ, स्पश्टता से भाँप रहाँ हूँ,
नामंज़ूर हैं, मगर क़बूल करता हूँ, इस कबाड़ में मैं भी हूँ…

नाड़ा सख़्त हैं, पजामा ढीला,
अक्स-दर-अक्स सब का सब गीला,
सुखाता हूँ जो तो नाड़े से पहले पजामा सुख जाता है,
दोनो एक हैं, ना जाने ख़ुद का ख़ुद से ये कैसा नाता है…

अब कुछ गीला है कुछ सुखा है,
कबाड़ में होना और कबाड़ होना, कितना रूखा है,
और उस पर होना अहसास,
खुद से आने लगती है बास…

कबाड़ भी अजीब है, बहुत ग़रीब हैं
हाय रे हाय ये कैसा नसीब है
बाक़ी सब साफ हैं, अमीरों की अमीरी की तरह,
वयथा यह बेहीसाब हैं,

ये कबाड़ किसी का नहीं है,
यतीम हैं, जी हाँ कबाड़ यतीम है,
अफ़ीम के नशे में हैं, यहाँ वहाँ, गिरा पड़ा फैला हुआ
बिखरा हुआ, क़ूड़ा-कचरा-कबाड़, एक बाढ़…

क्या ये खिंच के आया है…शायद बह के ही आया है,
कबाड़, क़ूड़ा, कचरा, अगर बह के आया है
तो क्या ज़ाहिर नहीं, ये ऊपर से आया है,
नीचे से ऊपर बहने की व्यवस्था धरती पर नहीं है…

न्यूटन का फर्स्ट लॉ आज फिर काम आया,
यह कबाड़ा यक़ीनन ऊपर से आया हैं
व्यवस्था क़ूड़ा है, सब उसका हिस्सा,
मैं मेरा पजामा और नाड़ा सुना रहे आपको ये क़िस्सा…

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