~ तज़रबा…

 

बात निकली है जो तज़रबे की,
मेरा भी है तज़रबा ज़िंदगी जीने का,
ख़ून रगों में कुछ ऐसे भी सुख जाता है,
जिनको तज़रबा है ख़ून का घूँट पीने का…

मैं कोई ज़रूरत तो नहीं जो पूरी हो जाऊँगा,
तज़रबा हूँ, और वक़्त के साथ ही आऊँगा,
जो दो पल में ज़िंदगी भर का तज़रबा माँगों,
रात ख़्वाब में आऊँगा, सुबह फुर्र हो जाऊँगा…

कभी बेअदबी, कभी बड़े अदब से आता हूँ,
तज़र्बा हूँ, और बड़ा ही तज़रबेदार तज़र्बा हूँ,
और इस बात का, मुझमें कोई गुमान नहीं है,
अपने सयानेपन का ढोल नहीं बजाता हूँ…

सुनता हूँ रोज़ न मालूम कितनो से, की,
सालों का तज़र्बा है, सालों का तज़र्बा हैं,
जाके कहदो कोई ऐसे सालों से, बवालों से,
मैं सालों का मोहताज नहीं, जो कल था वो आज नहीं हैं…

वो चूल्हा ना रहा जो कल रोटी पकाता था,
वो कल भी ना रहा, जब कोई घर मिलने आता था,
बूढ़े अब बाइक चला रहे हैं, और आपके “RIP” पर लाइक्स आ रहे हैं,
मश्वरा हैं, अपने तजर्बे का आप अचार डालें और खुद ही खालें…

…मेरे तजर्बे से बस इतना सा कहना है…

तज़र्बा हैं तो जी लें खुद, और औरों को भी जीने दें,
आप नहीं पीते तो जिसको पीनी है पिने दें,
किसे के आचरण का विवरण आपका काम नहीं हैं,
आदमी हैं आदमी ही रहें आप भगवान नहीं हैं…

 

 

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