~ चश्मा…

सारा आसमान सर पर उठा रखा है,

ना मालूम मैंने चश्मा कहाँ रखा है,

दो आँखों से ज़माना बहुत देख लिया,

दो और लगा ताज़ा नज़र को रखा है…

 

काश दिल भी दूसरा लगा सकता मैं,

पहले वाला तो टूट के बिखर रखा है,

एक तकिया इधर एक उधर लगाया है,

तुम नहीं हो तुम्हारी याद पे सर रखा है…

 

तुमने जाते जाते जो बात कही थी मुझसे,

अब तलक उसी बात को पकड़ रखा है,

तुम्हें याद है तुमने जो बीज बोए थे,

फूलों ने उनकी की सारा शहर महका रखा है…

 

रात अंधेरी में कोई भटक ना जाए कहीं,

इसलिए चाँद को दिया बना रखा है,

और तो ओर तुम्हें सुन के हैरानी होगी,

तुमको चाँद, ख़ुद को दाग़ बना रखा है…

 

कहने वाले तो यहाँ तक कहते है,

मैंने ये ख़ुद को क्या बना रखा है,

अब उन्हें कैसे बताऊँ, समझाऊँ क्या,

मैंने तुममें ख़ुद को सजा रखा है…

 

मिल गया चश्मा सर पे लगा रखा था,

यूँ ही सारा आसमान सिर पे उठा रखा था,

नज़रें ज़मीन पर, चश्मा तुम्हें तारों में धूँड रहा था,

मैंने तुममें अपना सारा जहाँ रखा था…

~ नाम में क्या रखा है…

सोचो जो कोई नाम ना होता,

कोई बद कोई बदनाम ना होता…

 

यहाँ सारे गुनाह और क़त्ल खुलेआम ही होते,

पकड़ता कौन और किसको, की किसने कर दिया गुनाह,

लेके शक्ल नुमा तस्वीर, ढूँढता किसको कौन यहाँ…

 

बेजान सी होती यहाँ वो बेनाम सी होती,

हर क़िस्सा कहानी भी बिना नाम की होती…

 

नो होते शक्ल के ना बड़ी अक़्ल के कोई माने,

कोई जाता कहाँ किसी को यहाँ कैसे बुलाने…

 

शायद ऐसे से होते शहरो के नाम भी,

वो गली शराफ़त, ये नेक मोहल्ला,

और घरों में लगती यूँ आवाज़, बड़ी, छोटी, ये निक्का वो झल्ला…

 

किसी के आने और चले जाने का कोई हिसाब ना होता,

बस करते, कराते, कुछ लिखते लिखाते, और बनते, बनाते,

सभी आते सभी जाते…

 

ये किया किसने लिखा और है ये किसने बनाया,

करने को यहाँ कोई ख़ुद पे कोई गुमान ना होता,

कोई हस्ती नहीं बड़ा किसी नाम ना होता…

 

बस होती जहाँ में बात अच्छी बड़ी ही एक,

होता खुदा भी एक, बंदे भी उसके एक,

होता यहाँ इस दुनियाँ में सब कुछ बड़ा ही नेक,

ना होता खुदा, भगवान ना नानक ना ही कोई ईसा,

ना जाता मंदिर, मदिनों, मैं यहाँ इंसान को पीसा…

 

एक ही होते भले एक जैसे ना होते,

हँसते सभी सब संग, साथ में सभी रोते..

 

ना होते ज़मीनो के भी कोई नाम, कोई लकीर ना होती,

आज़ादी के बाद की वो तस्वीर ना होती,

ना मरता कभी कोई हिंदू या मुस्सलमान,

होता असल में अमनो-चैन इस जहॉन…

 

करने को कर लेता हूँ एक शुरुआत यहाँ से,

मेरे रहते ही मिटा दो मेरा नाम इस जहॉन से…

~ तबरेज़…

 

नज़र हम रख लेते है, नज़रिया तुम रख लो,
हमें बस बूँद से मतलब, ये दरिया तुम रख लो,
जो दरिया भी लगे थोड़ा, सारा जहाँ तुम्हारा…

हमें दिल का कोई कोना किनारा बहुत है,
वहाँ चुप चाप, ख़ामोशी से रह लूंगा,
तुम रख लेना ख़ुशी, मैं ग़म रखूँगा, किसी से कुछ ना कहूँगा…

अभी बह रहा हूँ, मुझे चुप-चाप बहने दो,
उतरना मत, रात भर, पहन कर सोया तुम्हें,
खिसको ज़रा मेरी ओर, सर्दी सी है, ज़रा आग जला दो…

और हाँ, एक उम्मीद है, अगर कर सको जो तुम पूरी,
अपना वादा निभाना…वो वादा याद हैं ना,
हमेशा प्यार करने का, तुम्हारा मुझसे ही…

जो नहीं मुमकिन, तो मुश्किल आसान कर देता हूँ,
मिटा कर मिट्टी में भर दो, तुम ज़िंदा रहो मैं मरूँगा,
फिर, दफ़ना या जला देना, लगे तुम्हें जो भी सही…

हाथ में आ जाऊँगा, हथेली में समा जाऊँगा,
बहा देना, मिटा देना, भूलना मत, मैं चैन से सो ना पाऊँगा,
ज़रा आओ क़रीब, पास खिसको , सवाल रहने दो…

समाँ जाओ, ना मैं रहूँ ना तुम रहो,
छुपा लो मुझ को ख़ुद में, फिर हम-तुम बहें,
देखो, सवाल बिखेरे पड़े हैं यहाँ वहाँ,
तुम्हारे बालों की तरह, हर जगह…

~ 3 Pounds…

Of-course you have to use one,

It isn’t safe my dear, otherwise,

I wouldn’t have bothered if you had none,

Since I know, you have to use one…

 

Hey, don’t be a lazy bum,

What’s the matter with you, catch a breath,

Count until ten, fine, only until three,

It isn’t going to cost you anything, it’s free…

 

Don’t rush, no, you won’t do without, use it,

It’s right up there, don’t mess with your hair,

Will you please stop, please, hold it right there,

Let me help you, come here, bare…

 

You know what’s the problem, we avoid an effort,

It may seem brave in haste, it’s nasty,

Why to later regret, make choices that are sane,

You have one, use it, I’m talking about your…brain…

~ अर्ज़ियाँ…

 

बड़े अख़बार में छोटी सी ख़बर बन के आ,

कुछ इस तरह खुलेआम नज़र बचा के,

आ तू भरे बाज़ार की तंग गली से गुज़र के आ,

आज इतवार है, स्कूल के सामने से मत आना,

तू फ़िल्मों के इशतहार के सामने से चल के आ…

 

गुलाब के सबसे अंदर वाली पंखुड़ी बन के आ,

शहर में कर्फ़्यू है लगा, तू फ़ौज के जैसे तन के आ,

हो बारात वहाँ, उस भरी भीड़ में तू मौज जैसे बन के आ,

अमावस की अंधेरी रात में तू दिये की लौ बन आ,

घर में हो मेहमान और तू नंगे बच्चे की हौ बन के आ…

 

चारों ओर मातम की सफ़ेदी है, तू थोड़ा भड़क के आ,

पतझड़ का हो मौसम, तू अकेला पत्ता पेड़ पे लटका जैसे,

सब इक लाइन में सीधे चलें, तू सर के बल चल के आ,

जमी हो बर्फ़ और हवाएँ सर्द हो, तो तू पिघल के आ,

दिलों में ख़ुशक़ियाँ हो जब जहाँ भर में, तो तू जल के आ…

 

सब छेड़ रहें हो कोई तार-तराना, तू चुप-चाप आ जाना,

सब जो धुँड रहे हो बहाना, तो तू सच ही ये बताना,

तुझे मुझसे मिलना है, इस बात का कर देना ख़ुलासा,

जो रूठें तो रूठने देना, तू ज़रा ना घबराना, ना शर्माना,

तू हवा है, मैं रेत, मुझे चल चल के उड़ाना…

 

मुझसे मिलने तू आना…

~ एक कश तेरे लिए…

हेलो इसमत, मंतो

तुम्हारी आख़िरी कहानी पड़ी, क्याक्या लिखती रहती हो, इस बार अगर कोई भी शोर हुआ, मैं नहीं आने वाला तुम्हारे साथ, लाहोर

अच्छा, पहली बात वो आख़िरी कहानी नहीं है, मन किया तो और लिखूँगी, और दूसरी, ठीक है मत आना, मैं भी देखती हूँ कैसे रह लेते हो

अच्छा, कहाँ हो अभी

अभी, चारपाई पे, उलटी लेट कर, कहानी को सीधा कर रही हूँ, कुछ ज़्यादा ही टेडी हैं, इससे अच्छा तो खीर बना लेती, तुम पहले कहते तो तुम्हें भी बुला लेती, मिल के दोनो कहानी और खीर दोनो सीधी कर लेते

उफ़्फ़, बातों में तुमसे कोई नहीं जीत सकता, मेरे सिवाआ रहा हूँ, इस गरम हवा में ठंडी खीर खाएँगे और कहानी का उल्लू सीधा कर लेंगे

(ठकठक करते ही दरवाज़ा चर्र कर के खुला, और मुँह से निकला)

दरवाज़ा लगवाया ही क्यूँ है जब बंद करना ही नहीं होता

लगवाया था, की कोई आए तो अंदर से बंद कर लूँगी और आया भी कौन, मंतोतुम्हारे ही नाम पर कहावत बनी है, बिन बुलाए मेहमान

हँस लो, हँस लोऐसी ना जाने कितनी है जिन्हें इन्तज़ार ही सिर्फ़ मेरा रहता है

रहने भी दो हुज़ूर, ऐसा तुम्हारा दिल कहता हैतुम्हारा इन्तज़ार तो खुदा भी ना करे

कुछ खिलाओगी, पिलाओगी भी या सिर्फ़ खुदा का ख़ौफ़ दिखा के डराओगी, खीर कहाँ है और वो टेढ़ी कहानी

मुझे देखो, मैं सीधी हो गयी तो कहानी भी सीधी हो गयी, कुछ पका लिया था, पकने से पहले ही खा लिया था, कहानी क्या थी, बला थी, तुम देख लेते तो लट्टू हो जाते

फिर वही बातों की जलेबी पका गोल गोल घुमा रही हो, सब छोड़ो क्या खिला रही हो, बाक़ी समझ गया, कहानी पूरी हो गई और भूख उसी के साथ मर गयी तुम्हारी, सब अकेले अकेले ही कर लिया, मुझे सिर्फ़ सताने के लिए बुलाया है क्या

अब कुछ पिलाओ, गिलास कहाँ रखें है

पुराने गिलास, घर पर ही होंगे कहीं, नए चाहिए, तो नहीं है, बाज़ार से ले आओशराब तुम्हें पता है कहाँ रखी हैनिकाल लोमेरी सिगरेट नहीं मिल रही, सब हो गया तो, वहाँ से लिहाफ़ हटा बैठिए जनाब, चियर्स

उफ़्फ़ तुम और तुम्हारी बातें, ये लो सिगरेट, जलाओ और एक मेरे लिए भी

शुक्रिया जनाब, ये लीजिये और आख़िरी कश ना पीजिएगा, कहानियाँ और लिखूँगी पर आरज़ू इतनी की आख़िरी कश मैं ही लूँगी

इसमत तुम लिखती रहो हमेशा, अब से मैं पूरी कभी नहीं पियूँगा, जब भी पियूँगा, हर बार छोड़ दूँगाआख़िरी, एक कश तेरे लिए

~ Hakuna Matata…

 

पानी को आईना बना चाँद को रोटी समझ खा गया, शहर में जानवरों की तादाद देख शेर जंगल की ओर भागा गया…

पूरा जंगल उत्सुकता का मारा, आते ही लगा दी सवालों की झड़ी और मिनटों में लम्बी लाइन लग पड़ी…

पहला सवाल कुत्ते ने पूछा – शहर तो बड़ा साफ़ होगा?
~ जवाब मिला – साफ़ सिर्फ काले चश्में वाले लोग थे, बाकी तो नर्क रहे भोग थे…

दूसरा, लोमड़ी – सुना है वहां भी मेरे चर्चे हैं “लोमड़ी की सी चालाकी?
~ शेर हँसा – तुम से कहीं बढ़कर, तुम्हारी खाल से पता तो चलता है…

बिच्छू आया, डंक घुमाया, बैठा, आदमी काटता है क्या?
~ शेर – हाँ ऐसा इकलौता जानवर जो अपने ही जैसों को काटता है, और किसी को नहीं बांटता है, खाया जाये ना जाये,
सड़ा देगा मगर किसी और को नहीं देगा…

बिल्ली, मुझे शहर पसंद है, सुना है वहाँ बिल्ली को दूध आराम से मिलता है, ऐसा है?
~ शेर – बिल्ली को तो मिलता है, मगर सड़को पर आदमी के बच्चे सूखे पड़े रहते है, शायद बिल्लियों को ही मिलता है…

उड़ती उड़ती चिड़िया आयी और चिल्लाई, आदमी उड़ते हैं क्या?
~ मैं भी हैरान हूँ – सुना तो बहुत हैं – बहुत उड़ने लगा हैं पर निकल आये हैं…

हाथी आया – घुमा फिरा के सूंड को पूछा – ये शहर में हाथी के दांतो का क्या करते हैं?
~ शेर ने सुना था – जड़ दिया … भाई हाथी वहां खाने और दिखने के दांत अलग होते हैं, इसलिए तुम्हारे ले जाते हैं…

बारी आयी सांप की – ऐसे कौन सी चीज़ हैं जो शहर में आराम से मिल जाती हैं?
~ शेर पहले तो थोड़ा परेशान हुआ, सब कुछ तो हैं…हाँ शायद ज़हर…सब कहते हैं इसने-उसने ज़िन्दगी में ज़हर घोल रखा हैं…

बारी अब थी गिरगिट की, और उसे रंग बदलने से कहाँ फ़ुर्सत, रंग को किया उसने लाल और चिपकाया अपना सवाल…क्या आदमी रंग बदलता है?
~ सवाल तो अच्छा है; मगर बवाल वहाँ रंग बदलने का कम है, आपका रंग कितना गोरा या काला है ये बहुत बड़ा मसला है… गोरा होना जैसे लाजवाब है और ना होना कोई पाप…स्किन का वाइट कलर इम्पोर्टेन्ट फैक्टर है और ना होना डार्क चैप्टर…
जवाब तुम्हारे सवाल का…इतने वहाँ मौसम नहीं जितने आदमी के रंग हैं…चार पैसे में रंग बदल जाता हैं, कुछ हज़ार में बालों का कलर, लाखों में फ्यूचर का कलर ब्राइट होते देखा हैं…और इश्क़ ऐसी बला जिसमें सब टेक्नीकलर…

मोर क्वेश्चन प्लीज…मेरा मतलब मोर तुम्हारा सवाल?
मोर जी ने पंख फैलाये और याद आया सवाल तो घर ही भूल आये…पंख फैलाया तो सवाल याद आया…शेर जी, आदमी ख़ुशी में नाचता है या गम में…
~ जितना मुझे समझ आता है ख़ुशी में वो खुल के सामने नाचता है, और ऐसे नाच में सब शरीक होते हैं…गम एक ऐसी हलचल है जो उसे अंदर ही अंदर नचाती है…

अब आया भैंस का नंबर…
शेर जी ये बताओ – भैंस को वहाँ चारा बैठे बैठे मिलता हैं वहाँ तो जंगल हैं नहीं?
~ वहाँ भैंस और आदमी दोनों चारा खाते हैं पगली…कमी नहीं हैं…

भालू आया और वो भी शरमाया और पूछ ही बैठा, वहाँ भी लोग काले होते हैं?
~ इस बात पर शेर थोड़ा गंभीर हुआ और नम भी…एकदम संजीदा हो कर बोला बस यही तो बात हैं जिसकी वजह से मैं वहाँ टिक नहीं पाया, वहाँ खाने-पिने की कोई कमी थी, अपने आप चले आते थे मरने, लेकिन एक दिन मैंने सुना की वहाँ दिल भी काले होते हैं…
पहले तो मेरी समझ नहीं आया लेकिन जब तहकीकात की तो पता चला के जहाँ मैं छुपा था वो हस्पताल के पीछे की दिवार थी और मैं वहाँ छुपा हूँ ये बात किसी और को भी पता थी…वो रोज़ किसी को बहला-फुसला कर लता और वहाँ छोड़ जाता, मुझे लगा शिकार मैंने किया हैं, लेकिन जब पता चला तो मैं तिलमिला उठा और उसी को खा गया…उसका सीना खोला और क्या देखता हूँ…उसका दिल काला था…

यहाँ कोने में बैठा बन्दर कुछ बड़बड़ा रहा था और केला खा रहा था…शेर खुद ही उससे पूछ बैठा –
~ तुम तो उनके पूर्वज हो और तुम्हे तो वहाँ पूजा भी जाता हैं, तुम जंगल में क्या कर रहे हो?
बन्दर ने इत्मीनान से केला खाते खाते जवाब दिया…कुछ लोग हैं जो मुझे पूजते हैं लेकिन भगवान खुद को ही समझते हैं…

…और अब तो जानवरों की जैसे लाइन ही लग गयी…ये दो किलोमीटर लम्बी लाइन – जो-जो सवाल पूछ कर आते रहे, घर जाते खाने-पिने का इंतज़ाम कर लाइन में बेचने लगे…कुछ इस तरह चंद सवालों के जवाब क्या मिले जानवर भी ओपरट्यूनिटी का बिज़नेस करने लगे…और आदमी की तरह वो भी जेबें भरने लगे…

वहीँ कहीं अचानक एक गधे की नज़र पड़ी और वो भी लाइन में लग गया…तीन दिन बाद उसका जब नंबर आया तो शेर तो शेर सारी महफ़िल का सर चकराया…सवाल था ऐसे जैसे जैसे किसी ने पूछ लिया हो के आसमान में कितने तारे है…
सवाल था…
…”क्या शहर में गधे होते हैं?”…

~ इस पर शेर ने नाक से एक लम्बी सांस अंदर खींची और मुँह से गधे के कान में कुछ फुसफुसाया…और उसके बाद तो गधे की जैसे ख़ुशी का कोई ठिकाना ना रहा, वो नाचने लगा गाने लगा, अपनी धुन बजाने लगा, कहीं से भी आने लगा कहीं भी जाने लगा…

~~ सब परेशान की शेर ने उसके कान में क्या बोला की इसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नहीं…
~~ और थोड़ा शेर भी हैरान…आज आदमी की तरह जानवर भी परेशान लग रहे हैं…

 

~ शमशान…

 

मेरे घर के रास्ते में शमशान है, 

बेदर्द रोज़ लेता किसी की जान है,

आदमी को मिट्टी में मिला देता है,

सबको उनकी औक़ात दिखा देता है…

 

कभी भीड़ तमाम कभी दो चार आदमी,

बता देता है किसकी कितनी जान-पहचान है,

लौट जाते हैं फिर किसी रोज़ लौट आने को,

भूलना ही पड़ता है सच साँस चलाने को…

 

लटका चेहरा, दर्द गहरा, वक़्त ठहरा सा,

दो चार दिन, कुछ और ग़म, हर कोहरा छट जाता है,

आज किसी अपने को, कल किसी के अपने को,

छोड़ना वहाँ आता है, फिर काम में लग जाता है…

 

शमशान की इस बात पर मगर हँसी आती है,

उसके ठीक सामने एक हस्पताल भी हैं,

वहाँ से जान आती है यहाँ से चली जाती है,

ज़माने भर की फ़िक्र, बीच का का सफ़र, गोल सिफ़र…

 

शमशान के बग़ल में मुर्दाघर भी हैं,

दोनों की आपस में अच्छी बनती हैं,

जो एक में जलती है दूसरे में दफ़नायी जाती है,

राख मिट्टी की फिर मिट्टी में मिलायी जाती है…

 

हस्पताल और दोनों के बीच मैं एक सड़क है,

और एक चाय की दुकान, एक स्कूल, एक मयखाना हैं,

तीनों में एक चीज़ बड़ी अच्छी हैं,

देख लगता हैं वहाँ, दुनियाँ में सिर्फ़ ये तीनों सच्ची हैं…

 

सड़क के दूसरी ओर, इबादत और पूजा घर हैं,

आदमी अन्दर कुछ और बाहर कुछ और होता है,

लूटता है किसी को तो कभी खुद लूट जाता है,

फिर सड़क के उस पार जा चैन की साँस सोता है…

 

~ तज़रबा…

 

बात निकली है जो तज़रबे की,
मेरा भी है तज़रबा ज़िंदगी जीने का,
ख़ून रगों में कुछ ऐसे भी सुख जाता है,
जिनको तज़रबा है ख़ून का घूँट पीने का…

मैं कोई ज़रूरत तो नहीं जो पूरी हो जाऊँगा,
तज़रबा हूँ, और वक़्त के साथ ही आऊँगा,
जो दो पल में ज़िंदगी भर का तज़रबा माँगों,
रात ख़्वाब में आऊँगा, सुबह फुर्र हो जाऊँगा…

कभी बेअदबी, कभी बड़े अदब से आता हूँ,
तज़र्बा हूँ, और बड़ा ही तज़रबेदार तज़र्बा हूँ,
और इस बात का, मुझमें कोई गुमान नहीं है,
अपने सयानेपन का ढोल नहीं बजाता हूँ…

सुनता हूँ रोज़ न मालूम कितनो से, की,
सालों का तज़र्बा है, सालों का तज़र्बा हैं,
जाके कहदो कोई ऐसे सालों से, बवालों से,
मैं सालों का मोहताज नहीं, जो कल था वो आज नहीं हैं…

वो चूल्हा ना रहा जो कल रोटी पकाता था,
वो कल भी ना रहा, जब कोई घर मिलने आता था,
बूढ़े अब बाइक चला रहे हैं, और आपके “RIP” पर लाइक्स आ रहे हैं,
मश्वरा हैं, अपने तजर्बे का आप अचार डालें और खुद ही खालें…

…मेरे तजर्बे से बस इतना सा कहना है…

तज़र्बा हैं तो जी लें खुद, और औरों को भी जीने दें,
आप नहीं पीते तो जिसको पीनी है पिने दें,
किसे के आचरण का विवरण आपका काम नहीं हैं,
आदमी हैं आदमी ही रहें आप भगवान नहीं हैं…