~ घड़ी…

 

ये लाज़मी नहीं मेरी हर शय तुमको पसंद आए,

ज़रूरी ये भी नहीं तुम बुलाओ और हम आए,

कुछ ग़म हो कम और ख़ुशियाँ टिके चार दिन,

तुम करों, हम भी करे दुआ की ऐसा भी मौसम आए,

अँधेरें कोने में किसी ऊँची दीवार के मकड़ी का जाल हो,

और उलझनें हमारी उस जाल में जा पकड़ जाए,

इस गए साल में एक आध बार एक बात अच्छी हुई,

कभी तुम हमको, कभी हम तुमको, बेवजह नज़र आये,

याद है तुमने मुझे जो घड़ी दी थी, कब से बंद है पड़ी,

सोच रहा हूँ नए सेल डलवा लूँ, शायद ऐसे ये वक़्त बदल जाये

 

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