~ मैं…

~ मैं

वो मयखाने में मैं पकड़ के बैठा है,

कोई समझाए की क्या शय पकड़ के बैठा है,

पी क्यूँ नहीं लेता एक घूँट ज़िंदगी का,

क्यूँ बीती बातों को बेवजह पकड़ के बैठा है,

चुग़लियों की माचिस से क्यूँ जला रहा है घर,

फूँक क्यूँ नहीं मार देता धुएँ को, क्यूँ हाँहूँ पकड़ के बैठा हैं,

कोई बैठा है जाम पकड़ हाथों में, किसी के हाथ में हथेली है,

तू क्यूँ यहाँ अकेले कोने में, अपनी गुफ़्तगू पकड़ के बैठा है,

मान क्यूँ नहीं लेता कुछ भला बुरा, पहले,

फिर भूल जा तू,

तू बैठा है यहाँ और है कहीं और तू,

क्यूँ तू ख़ुद अपनी ख़ुशबू पकड़ के बैठा है

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