~ WhiteCanvas…

जो मिला वक़्त यही करता रहा,
खाली कागज़ लिए उन्हें भरता रहा,

कुछ जवाबों के सवाल मिलने लगे,
किताबों में रखे थे जो फूल खिलने लगे,

कुछ सुलझने भी उलझा ली मैंने,
ठंडी आग भी जला ली मैंने,

खाली भी अब मैं व्यस्त रहता हूँ,
शब्द बहाता हूँ मस्त रहता हूँ…

~ WorldPoetryDay ~

 

~ कालविस्र्द्ध…

 

एक हुजूम का हिस्सा है; आदमी नहीं जैसे कोई किस्सा हैं

टेबल का टुटा पैर या कुर्सी की टूटी हुई बाँह,

अखबार का अनपड़ा इश्तहार या जगह भरती खबर बेकार,

घड़ी की सबसे लम्बी सुई या पुरानी रजाई की रुई जैसे,

टूटे मुँह वाले चाय का गिलास या बीते फैशन का लिबास,

खुद से भी कितना दूर है, ना जाने किसके पास हैं… 

 

भरी कॉपी है कोई या किताब के आखिरी पन्ने में रखा बुकमार्क,

सर्दियों में फ्रिज में बेकार जमी बर्फ या बड़े चेक वाला स्कार्फ़,

पुराने पर्स में रखा फटा हुआ नोट या पुरानी चोट का निशान,

ज़मीन जिसकी सारी बिक गयी खोखली ज़मींदारी की शान,

सोलह अगस्त की जैसे पतंग, सोच सोच कर हूँ मैं दंग

 

मोटी निब का पेन जैसा कोई या खाली लाल रिफिल सा है,

वो चश्मा है गोल सा जिसकी उम्र आँखों से भी हो बड़ी,

तीन पहिये वाली साईकिल जैसे बच्चे से छोटी हो, कोने में पड़ी,

बची हुई उन का ज़रा सा गोला कोई और कोई बड़ा ही भोला यहाँ,

बेज़ार कहो, बेकार कहो, उसे अपनी ही हालत का शिकार कहो

 

दादी की सफ़ेद चीनी वाली कटोरी कोई, कोई बिना धार की छुरी,

साठ मिनट की ऑडियो कैसेट कोई और कोई टेप रिकॉर्डर सा है,

बिन पानी के सूखा नल सा तो कोई भुलाबिसरा कल सा है,

ब्लैक एंड वाइट कैमरा कोई और कोई धूल चढ़ी तस्वीर,

वक़्त का चक्र पीस देता हर सब्र

सब हुजूम का हिस्से है; जो गयी बीत उस ज़रूरत के किस्से हैं

~ गोश्त की दुकान…

साहब, छोटा मुँह और बड़ी बात…

दो पैर, दो हाथ…छरहरा बदन, तीखे नयन…बिगड़े हालात…खिलता चमन…उजाड़ोगे?

गोश्त नया है आया…एकदम गर्म…हज़ार मील का सफर है किया तय…

दो दिन, दो रात लगी यहाँ तक लाने में..सोलह की है…खाली पेट …भरोगे?

बोटी बोटी रसदार है…आप हाँ करते हो नहीं तो मेरे पास दूसरा खरीददार हैं…

साहब, आप तो खिलाड़ी है…वो पहली बार बाजार में आयी है…हम दोनों की ये पहली कमाई है…

और हाँ, अगर हाथ न आये तो प्यार से समझाना…मरोड़ियेगा मत…मरोड़ना पड़े तो तोड़िएगा मत…

थोड़ी ख़ुद पीजिएगा…और बहला फुसला के गर्दन से पकड़ लेना…अकड़ने लगे, तो बाहों में जकड़ लेना…

चीख़ना चिल्लाना बहुत होगा, दिल मज़बूत रखना…तड़पनतो होगी…मुँह अच्छे से ढकना…

ज़रूरी बात, दाम में कोई कमी ना होगी…सस्ता चाहिए तो बाड़े में और बहुत हैं जंजाल…चुन लीजिए हमारी दुकान में एक से बड़कर एक हैं ज़िंदा कंकाल…

~ गुज़र जाऊँ…

~ गुज़र जाऊँ…

यहाँ से गुज़र जाऊँ या वहाँ से गुज़र जाऊँ,

इस सोच में हूँ ठहर जाऊँ या इस जहाँ से गुज़र जाऊँ,

ना क़ाबा ही मुत्तासिर है ना मंदिर का नज़ारा,

करूँ कहाँ सजदा या कहीं भी फिसल जाऊँ,

मसलों के मसालों में पिस रही है नस्लें,

इजहार करूँ या उन्हें पहचान्ने से मुकर जाऊँ,

इमली यहाँ की मीठी है और बातें सब खारी,

नक़ल बड़ी असली है, दो ज़हर ज़रा सा, निगल जाऊँ,

लोहे के दरवाज़ों को भी दीमक है खा रही,

सोच रहा हूँ बन के मौसम मैं भी बदल जाऊँ

~ मैं…

~ मैं

वो मयखाने में मैं पकड़ के बैठा है,

कोई समझाए की क्या शय पकड़ के बैठा है,

पी क्यूँ नहीं लेता एक घूँट ज़िंदगी का,

क्यूँ बीती बातों को बेवजह पकड़ के बैठा है,

चुग़लियों की माचिस से क्यूँ जला रहा है घर,

फूँक क्यूँ नहीं मार देता धुएँ को, क्यूँ हाँहूँ पकड़ के बैठा हैं,

कोई बैठा है जाम पकड़ हाथों में, किसी के हाथ में हथेली है,

तू क्यूँ यहाँ अकेले कोने में, अपनी गुफ़्तगू पकड़ के बैठा है,

मान क्यूँ नहीं लेता कुछ भला बुरा, पहले,

फिर भूल जा तू,

तू बैठा है यहाँ और है कहीं और तू,

क्यूँ तू ख़ुद अपनी ख़ुशबू पकड़ के बैठा है

~ महाभारत…

~ महाभारत

है कथा संग्राम की

विश्व के कल्याण की

धर्म अधर्म आदि अनंत

सत्य असत्य कलेश कलंक

सार्थ की कथा परमार्थ की |

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महाभारत

शक्ति है भक्ति है

जन्मों की मुक्ति है

जीवन का ये सम्पूर्ण सार है

सत्य,

जन्ममृत्यु है

बीच विघ्न संसार है

वक़्त का चक्र उलट सा गया घूम,

है पृथ्वी खड़ी वहीं और आदमी गया घूम

कर लिया उसने यक़ीन,

कृष्ण नहीं गीता नहीं और ना गीता का सार,

ख़ुद ही करने लगा अपनी महिमा अपरंमपार.

कर ज़मीन को नाम अपने, छू लिया चाँद भी,

करते पूजा पथर की, पथर हो गया आदमी,

खोल हर एक कड़ी उसने सुलझा ली मौत भी,

दिया छोड़ जीना उसने अब

करने मौत को परेशान,

अब वो ढूँढ रहा है, नयी इजाद,

कर रहा है… ना मरने की जिहाद