~ तुम ज़रा दर्द दो ना…

सोच बंद, शब्द फरार, कलम सुखी, पन्ने खाली फड़फड़ा रहें हैं,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

जिस्म ढीला, आँखें नम, ज़बान पे ताला, हर काम मैंने टाला,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

होश हो के भी नहीं, ढूँढने लगता हूँ जो गुमा ही नहीं,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

बत्तियाँ सारी गुल, उजाले से कोफ़्त अँधेरे से प्यार,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

शोर चुभता, ख़ामोशी खलती, वो आज बात नहीं जो कल थी,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

भूख नदारद, प्यास भी रूठी, झूठ लगे सच्चा, सच्ची बातें झूठी,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

इतना सा अफसाना है,

सच कहता हूँ सच के सिवा कुछ नहीं,

दर्द जब तक निगाह में नहीं होता,

लिखना चाहूँ लिखा नहीं जाता,

अब और गिड़गिड़ा भी नहीं पा रहा हूँ,

बिन रेत घंस रहा बिन पानी डूब रहाँ हूँ,

बचा लो, निकालो भँवर से,

तुम ज़रा दर्द दो ना…

रख के काग़ज़ पे क़लम, इस उम्मीद से हूँ,

अभी उठेगा एक दर्द और सब मीठा हो जाएगा,

सोच, शब्द, क़लम, पन्ने, खिल उठेंगें,

और एक क़िस्सा नज़र होगा,

आज़मा के देख लो,

कितना हंसी वो मंज़र होगा…

जैसे…कुछ ऐसा सा…

ये सर्दियों की सुनहरी धुप और तुम्हारी गर्मियाँ,

ख़ूबियाँ तेरी हज़ार, अनगिनत मेरी कमियाँ…

~ जानदार दारूवाला 2019…

एक बार फिर नए साल की भविष्यवाणी ले कर हाज़िर, गाय का रखवाला, आपका अपना जानदार दारूवाला…

पिछले साल की तरह ही 2 जीरो (नहीं ज़ीरो की रेटिंग नहीं) एक आठ, मेरा मतलब दो-हज़ार अठारह का उन्नीस होगा, सिर्फ़ एक अंक ही बदलेगा बाक़ी के हालात रहेंगे ज्यों-के-त्यों, खुलेंगे शायद कुछ और #metoo मोमेंट्स, उनके जो नहीं समझे थे NO मतलब NO, ज्यादा कुछ नहीं सिर्फ न्यूज़ चैनल की #TRP  बड़ेगी, क्वालिटी गिरेगी…

विराट, रनवीर, सोनम और तो और सुहेल सेठ हिच हो गए, सलमान उर्फ़ भाई उर्फ़ बिग बॉस अभी भी ख़ुशहाल हैं, गंगा का फ़ण्ड क्लीन, स्टैचू मेड विद सपोर्ट ओफ़ चीन, तेल-सिलेंडर का भाव जाते जाते गिर गया, कुछ राज्यों में कमल मुरझाया और हाथ खिल गया…

…कमर्शल ब्रेक… (तेल बचाये इलेक्ट्रिक कार चलायें, बदबू आये तो एलोन मस्क लगाये)…(Netflix एंड Chill, नहीं समझे तो वॉच प्राइम इट्स नो क्राइम)…

याद रखें इस साल चुनाव हैं, अपना वोट प्रतयाक्षी को ही दें, पार्टी से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा, कोई तोप तो कोई जहाज़ खाती है, हाथी, साइकिल, हल, सब आइटम हैं, सिर्फ आम आदमी की जेब पर झाड़ू चलाती हैं…

इस साल भी दिवाली के पटाखे बचाए जाएँगे और शादियों में जलायें जायेंगे, साल के अन्त में कुछ और नोट बन्द हो सकते हैं (हो सकता है ना भी हों) जिन्हें कहते थे पप्पू वो अक़्लमंद हो भी सकते हैं (हो सकता है ना भी हों), प्रदूषण, माल्या, मोदी किसी का कुछ भी नहीं बिगड़ेगा, शायद आदमी धर्म से ऊपर उठेगा और गाय नहीं तो देश हित में peacock के नाम पर लड़ेगा…

ये नारा अमर होगा “मंदिर वहीं बनाऊँगा मैं”…या सरकार बदली तो देश में ही घूमूँगा “विदेश नहीं जाऊँगा मैं”…

संभावना है शहरों, गाँव, क़स्बों के नाम बदले जाएँगे और जनता पर लगेंगी नयी पाबंदियाँ, हालात में नहीं होगा रत्ती भर भी बदलाव, लगाते हो तो लगी शर्त, सलाह मानो तो मत लगाओ, धंदा अगर मंदा हैं तो कोई नया व्यापर जैसे आलू की फ़ैक्ट्री या पकौड़ों की दुकान लगाओं…

वेल इन टाइम वैलेंटायन की तैयारी कर लें, बजट का भी सेम टाइम है, गर्ल्फ़्रेंड से उम्मीद रखें, सरकार आपकी उम्मीदों पर फिर शू-शू करेगी, और एक महीने बाद जिनका इंकरेमेंट है उनकी मेहनत उन पर थू-थू करेगी, करेंगें देश के चोर फिर से चोरी और सीनाज़ोरी, आप सामान्य नागरिक है तो पुलिस देखते ही बिन ग़लती आप करंगे सौरी…

क्रिकेट होगा नया सेक्रड गेम, क्यूँ ना हो, चाय वाला पुराना हो गया, क्रिकेट कप्तान एक पाकसाफ़ प्रधानमंत्री या बंगला चुनाव जीत सकता है, अर्रे मुझसे पूछो तो मैं तो धोनी के हाथ पूरा मिर्ज़ापुर कर दूँ, या कोहली की सी अकड़ से हालात सुधार का आग़ाज़ करूँ, और नोटा से ना हारूँ, इस साल फिर जीते जी ख़ुद का ना मारूँ…

नए साल का पहला जाम, दिल्ली में राजीव चौक और हरियाणा में गुड़गाँव (गुरुग्राम को मेरा प्रणाम) के नाम…

जय हो !! ग से गाय, ग से गंगा गए साल का आख़िरी और नए साल का पहले पंगा…  

…ये सत्य को एक व्यंग्य के रूप में पेश करने की कोशिश है, ये काल्पनिक सीमाओं से बाध्य भी नहीं, अगर आप नाम, जगह, इत्यादि किसी से भी ये अंदाज़ा लगा सकते हैं की वो किस व्यक्ति विशेष को लेकर कही गयीं है तो अपने लिए एक ज़ोरदार ताली बजाएं और अपनी अगली पार्टी में मुझे भी बुलायें…

~ December-Twenty-Five…

~ December-Twenty-Five…

He swayed left from right and jumped up and down,

He had a mask put on and wore a colourful gown,

He made everyone laugh; it would be always a piece of fun,

He was a short height miniature smaller then than a gun,

He acted like a fool as he had to make his living,

He kept all his pain and smiles, he was always giving,

Sometimes on a horse or on a sleigh he would stand,

Sit he would sit, laugh he would laugh, he followed all the commands,

He was almost fifty two and his birthday was on twenty-fifth-december,

And he had his pretty corner to cry as no one cared to remember,

He was born on a Monday and the day was christmas,

Well, he was a loner all his life and never made no fuss,

His mother left him when he was born, new and alive at Six-Forty Five,

The circus opens in the morning at ten, someone just screamed where the hell is Uncle Ben,

Its morning, the time is six-forty-five; alone in his tent he breathed his final sigh,

And, the banner outside his tent just read; welcome its December-twenty-five…

~ तो क्या बात थी…

तुम ईद का चाँद होती – तो क्या बात थी,
जो ना कह पाया तुम वो बात होती – तो क्या बात थी,
तुम आते जाते नज़र आती फिर ठहर जाती – तो क्या बात थी,
तुम मेरी पहचान मेरी जात होती – तो क्या बात थी,
तुम यहीं कहीं होती – तो क्या बात थी,
तुम आसमान तुम ज़मीन होती – तो क्या बात थी,
जो हम पहले मिले होते – तो क्या बात थी,
जो हम सिलसिले होते – तो क्या बात थी,
जो तुम होती कोई क़िस्सा – तो क्या बात थी,
जो तुम होती मेरा हिस्सा – तो क्या बात थी,
तुम कहानी मैं किरदार – तो क्या बात थी,
मैं कबीला तुम सरदार – तो क्या बात थी,
मैं तारा तुम चाँदनी होती – तो क्या बात थी,
जिसे देखूँ तुम होती हर वो नज़ारा – तो क्या बात थी,
तुम होती समन्दर और किनारा भी – तो क्या बात थी,
तुम होती जो हवा और मुझको उड़ाती – तो क्या बात थी,
तुम अमावस भी चाँदनी रात भी होती – तो क्या बात थी,

और तुम, तुम क्या निकली मेरी पहली मुहब्बत निकली,
मुहब्बत जो मुझे इस जहाँ से रूखसत होते-होते मिली…

तुम मुझे पहले क्यूँ नहीं मिली?
जो तुम मुझे पहले मिल जाती,

कोई तो होता जो कहता, काश…
ये जो जल रही है, ये लवारिश नहीं है लाश…

~ कोड 05278 आगे 06121992…

Think out of the box!

Cogito, ergo sum

नाई और कसाई
दो दुकाने आमने सामने,
~
और ~
इतिहास में दर्ज एक शर्मनाक तारीख

राम राम भाई जान, आज बहुत लेट खोली दुकानचाचा सलाम, हाँ आजकल सुबह सुबह कम होता है काम

राम राम वाले भैया हमारे गाँव के एकलौते नाई है, वैसे वो ३ बहनों के भी इकलौते भाई हैं

सलाम चाचा, पेशे से कसाई है, आगे पीछे कोई नहीं,  पूरा गाँव है उनका और वो गाँव के, इसलिए अकेलापन नहीं खलता,  लेकिन भाई साहब, क्या काटते है जनाब, एक एक पीस, इसलिए धन्धा उनका ख़ूब चलता

 

अच्छे दोस्त मिलते नहीं आजकलचल भाई मेरे बाल ही सज़ा देख़ाली है तो कर ले अब थोड़ा काममेरा क्या है, बकरा कटा पड़ा हैकोई आएगा तो दुकान खोल दूंगा और पिस तोल दूंगा

आओ बैठो चाचा, नया चल रहा है, स्पाइक बना दूँ,  ३ बाल हैं, अच्छे लगेंगे, कम पड़े तो बोलो, बकरे की पूँछ लगा दूँ, और किसी को नहीं बताऊँगा, राज़ को राज़ रखूँगा पसीने में दबाकर

कर लो भाईजान, उड़ा लो आप भी खिल्ली, लो रास्ता काट गयी बिल्ली

भाइयों तुम दोनो का हो गया तो मेरा काम भी कर दो,  दाड़ी बनवाने आया हूँ, शाम को मटन खाने का मन भी हैचाचा जाओ दुकान खोलो और 1 किलो बाँते तोलोमेरा मतलब किलो भर चाँपे तोलो

भगाओ मत हट रहा हूँ भाई, बाल तो सजवा लूँ, तुम्हारा क्या है घूमते हो और खाते होकाम धाम कोई तुम्हें है नहीं, ना मिली तुम्हे छोकरी, ना नौकरीखाओ मटन पर पहले कमीज के बंद कर लो बटन

बटन नहीं हैचेन हैआज मन बड़ा बैचैन हैचाकरी नहीं करते हम किसी की, पैसा इतना है, क्यूँ करनी, धन्धा हमसे होगा नहीं, बाँध लेता है,  शादी कर के, शराब की दुकान की सेल बड़ाने का भी मेरा कोई विचार नहीं हैयाद आया घर में अचार नहीं है

अचार भी रखा है दुकान पर, ले लेनाखुलवा ही दोगे शटर तुमबड़े ही बेग़ैरत क़िस्म के इंसान हो के नहीं,

खोलता हूँ और तोलता हूँबातेतुम्हारी

बोलो बड़बोले भाई, मेरी मानो दाड़ी भी कलर करवा लोसफ़ेदी की चमकार के चक्कर में कहीं रिन वाले ले ना जाए आपको इशतहार के चक्कर मेंआपके, मुँह पर वैसे फ़्रेंच कट अच्छी लगेगीबना दूँ

ये क्या फिर से वही फटी क़मीज़, कितनी बार पहनोगे जनाब, अब कंधा देदो इसे भाई साहब

 

रुको रुको भाईऐसी वैसी कमीज नहीं है,इस क़मीज़ से प्यार है मुझे,  बाबूजी ने मेरे जन्मदिन वाले दिन, रात को ९ बजे दुकान खुलवा कर ख़रीदी थी मेरे लियेआज रेडीओ के मुँह पर ताला क्यूँ लगाया हुआ हैचलाओ इसे या बेच दो

 

भैया साइकिल की चेन उतर गयी है ज़रा खेंच दो

 

यह लो नवाब साहबबोलो तो पंक्चर भी कर दूँ, लगा दूंगानाइ गिरी कुछ ख़ास ना चल रहीसाइकिले ही बना दूंगाजैसे ठाकुर साहब, वैसे साहबजादे

 

ये लो, चला दिया बाजा, तुम्हें देख लिया था आते हुए, इसीलिये बंद किया था, एक ही राग चले सोचा था,

अब आपके लिए पेश है, भूले बिखरे गीत, इसकी फ़रमाइश की है, नाम गली के, गुमनाम भाई ने,

लग जा गले की फिर ये हसीं रात हो ना हो, शायद फिर इस जन्म में मुलाकात हो ना हो

 

कहानी ले लो, कहानी ले लो, मुझसे मेरी जवानी ले लो

 

लो आ गया, पगला यहीं काकहने को पागल है, बातें इसकी किसी स्कूल मास्टर से कम नहीं… 

कैसे दी कहानी?

अभी कहाँ दी, तुमने माँगी नहींकौनसी लोगेआज वाली या कल वाली

कल वाली

कल आ जाना दुकान पे, आज लिखूँगा, रात को पड़ूँगा, सुबह ले लेना

वाह, ठीक है, कल ले लूँगा,

भैया ये पागल है, या बनता है?

ये तो नहीं मालूम, एक बार पूछा तो, बड़बड़ाने लगा,

कुछ दोस्त बनाए थे हमने हम उनसे प्यार किया करके

वो मुस्कुरा के मिला करें और सीने पे वार दे जी भर के…”

 

सच कहा, फ़्रेंच कट काली दाड़ी पर जमेगीएकदम मस्त लगेगी, बना दोरुको यह क्या यह क्या दाम बड़ा दिए, कल तक तो ३० रुपए लिखे थे, आज ३३ कर दिए

 

हाँ भाई, काम कम है, सोचा दाम बड़ा देता हूँ,  तुम मटन के साथ खाते हो, मैं प्याज़ के साथचला लेता हूँ

वाह, शायरी सूझ रही है

लगता है कल वाला दर्द फिर उठा है, मेरी दाड़ सूज रही हैचलता हूँ, फिर मिलता हूँ

ये लो १०१० के ३ और ११ के तीन, पूरे ३३

 

शुक्र है, बातो का गोदाम गया, अब गाने सुनता हूँ और ताने बुनता हूँ

 

चाचा, किस विचार में खोए हो, अचार डाल दिया या आँखे खोल सोए हो….मुफ़्त में लूँगा और रुपया १ ना दूँगाअच्छा राम रामकल परसों आऊँगा करने दुआ सलामआम के आम और गुठलियों के दाम

 

चाचा चलो आओ खाना खा लेआज मैं मटन लाया हूँऔर तुम तो वही लाए होगे, जली कटी रोटी और अचारकितना अचार खाते होघर पर ही बनाते होअचार से याद आयाआज वार क्या है?

आज सोमवार हैकल मंगलजय हनुमान !!

मेरा बूंदी प्रशाद ले आना जब जाना, सारा ख़ुद ही मत खाना,  पिछली दफ़ा का इस बार ना चलेगा बहाना

वार पूछा क्योंकि मैं तो तुम्हें बताना भूल ही गयारात को बॉम्बे जा रहा हूँछोटी से मिलने

वहाँ से दिल्ली६ जाऊँगा बड़ी से भी मिल आऊँगा,  दिल्ली का मौसम सुना है इस बार दिसम्बर में भी गरम है

कल ट्रेन पकड़नी है… रेज़र्वेशन भी नहीं हुआ,  RAC में जाना पड़ेगा… टी टी तो अपने शर्मा जी हैप्रशाद ले जाऊंगा प्यार बढेगा..

अच्छा विचार हैऔर मेरी ओर से तुम छोटी और बड़ी के लिए ले जाओइस बार बहुत अच्छा बना है अचार ले जाओपैक करता हूँ

और मेरी भी दुआए ले जानामेरा फ़ोन नम्बर बदल गया है लिख लोकोड वही – 05278 आगे – 06121992

राज़ी ख़ुशी जाओ, और जल्दी लौट के आओहाल चाल बाँटते रहनाअच्छे दोस्त मिलते नहीं आजकल

मैं रहूँ या ना रहूँ, तुम मुझ में कहीं बाकी रहना, बस इतना है तुमसे कहना

यह फ़रमाइश की है चाचा ने राम भूमि से

चाचा, ये तुम ही हो ना, मुझे पता है तुम्हें ये गाना बहुत पसंद है, ना जाने क्या चला गया कान में सुबह से नाक बंद है

ये लो, बीच वाले जीजाजी का फ़ोन भी आ गया,

हेलो जीजा जी कैसे हो आज कैसे याद कियाक्या, कल आ रहे होलो और मैं दिल्ली जा रहा हूँ सुबह की गाडी सेअब तुम्हारा इस्तक़बाल चाचा करेंगेठीक है बोल देता हूँनमाज़ के बाद मस्जिद के सामने ही मिलेंगेरखता हूँ

चाचा कल जीजा जी आ रहे है, कार से, सेवा करने… अब तुम ही करना उनका स्वागतमटन बहुत शौक़ से खाते हैरोटी जलाना मतमैं शाम में पहुँच के फ़ोन करूँगानम्बर लिख लिया है मैंनेआज जल्दी जाऊँगा, खाऊँगासुबह की गाड़ी हैअभी बनानी ख़ुद की भी दाड़ी है, रात में ही बनाऊँगापहले जाते ही गरम पानी से नहाऊँगासर्दी बड़ी है

वर्दी छोटी पहन के आये हो दरोगा साहबबैठो खाना खाओगे या कुछ और

हाँ तो चाचा और तुम अपना ध्यान रखनाजुम्मे की नमाज़ में दुआ करनाबूंदी मैं ले आऊंगाजल्दी वापस आऊंगाखाने का भी रखना ध्यानजली कटी सुनाने वाला नहीं है कोईजली कटी रोटी से ही काम चलाते होबड़ी जल्दी जल्दी खाते हो

लो आ गया तुम्हारा चहेता ग्राहक

हाथ धोलो और ९ किलो मटन तोलोअभी भी ९ किलो ही लेता है या बड़ा दियाहोटल इसने अच्छा चला दियाएक बार ही खाया थालेकिन ज़ुबान पे आज भी स्वाद है

बैठिये दरोगा साहब..बाल कटवाओगे या शेव कर दूँऔर कुछ नहीं तो जेब ही भर दूँ

क्या बोलते रहते होतुमसे पैसे लेंगे, शेव करो हम तुम्हे कुछ नहीं देंगे

 

चाचाचाचाक्या इरादा हैअँधेरा होगा थोड़ी देर मेंआज दुकान बढ़ानी है या रात यही बितानी है… चलो चलेफ़ोन कर देना पहुँच करखुदाहाफिज

राम राम चाचाकर दूंगा उतरते ही

 

हे भगवान् ६ बज गएअर्रेलौंडे रिक्शा निकाल और सीधा प्लेटफार्म में डालभगवन तेरा भला करेले किराया और पकड़ अगली सवारीआ गयी गाड़ी हमारी

सफ़र बहुत लम्बा था, आराम से कट गया फिर भी… बॉम्बे की बात ही कुछ और हैसमंदर भी है, सितारे भी, मिलते यहाँ किनारे भीपर घर की बात ही कुछ और है… भैया एक चाय देना, और रेडीओ की आवाज़ बड़ा लेना

यह लो भाई सुन लो

तेरा शहर जो पीछे छूट रहा..कुछ अन्दर अन्दर टूट रहा

 

भैयाजी यहाँ फ़ोन कहाँ है, STD करनी है

आगे, सीधा जा के उलटा हो जायिएऔर कटिंग चाय के ३ रुपये लायिए

लीजिये १० का है

दिए और खयालो में चल पड़ास्टेशन देख हैरान..इतना बड़ा

चल बेटा, गाड़ी गयी, अगली की तैयारी कर,

और नाश्ता लगा दे, मेरे लिए १ वड़ापाव सजा दे

 

ये गया सीधा, हुआ उलटा, और झट से पलटा, बाक़ी पैसे लेना जो भूल गया था

सीधा, उलटा, वापस दुकान पेआया और धीरे से चिल्लाया, भाईजीएक फ़ोन मिलाना है, मिला दो, और वो स्टूल इधर खिसका दो

नम्बर बताइए

स्टूल क्या करेंगे, मेरी कुर्सी पे आ जायिए

हँसते हँसते, मेरी हँसी छूट गयीऔर दरवाज़े में अटक घड़ी टूट गयी, देखा तो टाइम ९ बता रही थीअब तक तो चाचा नमाज़ पढ़ के, मस्जिद के सामने अड़ के खड़े होंगेजीजा भी पहुँच गए होंगे, रुकता हूँ १० मिनट बाद करता हूँ

आज की ताज़ा ख़बर, आज की ताज़ा ख़बर

क्या ताज़ा होगा, सब वही होगा सोच के मुस्कुरा दिया और नम्बर बता दिया

कोड 05278 आगे 06121992….घंटी बज रही है,

उठा नहीं रहे

सेठजी सुनिये आप पकड़िएबाजू वाली दुकान का महूरत हैहवन हो रहा हैमैं अटेंड कर के आता हूँअंदर आईये और आराम से मिलाइए, मैं जा के आता हूँ, आप बैठ जायिए

चाचा तो एक ही घंटी में ही उठा लेते है फ़ोनकभी कभी तो बजता हैहमारे सिवा उन्हें करता है कौन

नम्बर चेक कर लेता हूँ..कोड 05278 आगे 06121992…सही है, मिलाया और घंटी ही जा रही है

फिर जवाब नहीं आया..और जैसे ही अखबार की आज की ताज़ा ख़बर पर पड़ी मेरी नज़र

 

उधर हवन हुआ सम्पन

ॐ भूर्भुवः स्वः

और इधर मैं

~ सरहद…

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बहुत पानी बरसा उस रात,  हर आँख नम और सैकड़ों दिलो में था ग़म,

फिर दो चार दोपहर बाद ढल गयी होंगी यादें, सैकड़ों के ज़हन से

बाक़ी जो बुझे थे दिये, आज भी इक आग बन दिलों में जल रहे है,

सूरज ढल गए थे जिनके अब बस दिन निकल रहे हैं

१० बरसख़ौफ़नाक और दर्दनाक

 

सर, मे आय टेक योर ऑर्डर प्लीज़

Sure, जूस

गोली ख़ून गयी चूस

 

सर, फ़ोर यू all…

ओमलेट…and ब्रेड slices

उन ३ को भी बेड ही नसीब हुआ, हमेशा के लिए

 

मैडम,  how may I help यू

उसने, उसकी मदद की, जान पर खेल कर, सीना बच गया उसका पर पीछे से हुआ वार

हौसला दमदार था और दुश्मन कमज़ोर

सुबह का समय था, बचा ले गया फिर भी किचन से

help किए बिना नहीं जाना चाहता था वो

 

ये तो बस ३ क़िस्से थेशायद ३ हज़ार परिवार मरें होंगे उन ३ रातों में

अगर और भी जाते तो क्या होता?

क्या छोड़ा क्या सँवार दिया बँटवारे नें?

वही टुकड़ा अब बाहर है जो कभी अंदर था,

एक थाबाँट लिया, काट लिया,

राज करने को, हुकूमत बनाने को,

ज़मीन बाँट ली अपनी अपनी सरकार चलाने को

 

घर छोड़, कहीं और जा बसे, घर के साथ ख़ुद को खो दिया… 

ग़ुलामी थमा दी हुजूम को, कहने को आज़ादी का बीज बो दिया

हम ना समझ पाय पर शायद सत्ता ने गुथी सुलझा ली थी,

कभी एक कहानी कभी क्या क़िस्सा सुनाते रहे,

और हमें उल्लूकापट्ठा बनाते रहे

 

यही हुआ था, सुबह का कोई ऑर्डर वैसा ना पूरा हुआ जैसा मँगा था,

हर ऑर्डर एकदम एक जैसा था, ख़ौफ़नाक और दर्दनाक

सुना है मौत पानी के रास्ते सरहद पार से आयी थी,

आदमी, तूने पानी में भी बनायी थी

~ दिवाली…

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अभीअभी गयी दिवाली है

दिए जलें और लोग गले मिलें,

घरो में खुशियों की मन्नते मांगी गयी,

तर्रक्की और धन की वर्षा हो,

ये सोच हुआ घमासान पूजा पाठ,

उनके यहाँ जिनके है मस्त ठाठ

 

देख ये सब मातालक्ष्मी हुई कुछ हैरान,

और निकाला बहीखाता, हिसाब किताब देख गयी चौंक,

जो दिए बेच रहा था, वो जलाता नहीं,

जो मिठाई बना रहा था, वो खाता नहीं,

जो बेच रहा था पटाखे लड़िया, अँधेरी थी उसकी गलियाँ,

मोमबत्ती सा दिल, गया पिघल और सोच को उनकी लगा धक्का

 

कौन खरीद रहा था दिये, मिठाई और पटाखे ?

कौन बुला रहा था मुझे पूजा पाठ करवाके ?

सब कुछ तो है इनके पासऔरका क्या करेंगें ?

घोर अन्याय, सोचने लगी इसका क्या उपाय है,

 

लगाया ध्यान तो जली बत्ती

 

ये तो निचे बैठे बस लकीरें खींचते ही रहेंगे,

और मांगते रहेंगे – “और” “थोड़ा और” “थोड़ा बहुत और“,

सोच समझ कर विचार, किया तय,

इस दिवाली जिसे असल में है मेरी ज़रूरत, वहीँ जाउंगी,

ये ऊंचनीच का फ़ासला मेरी ही वजह से है,

इसे मैं ही मिटाऊँगी

 

Disclaimer >>

ये पुलाव सिर्फ ख़याली हैंअगले साल फिर दिवाली हैहोना फिर यही सब हर साल हैसोचने को अच्छा मगर ख्याल है… 

~ साये…

 

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साये ये रात के साये,

कहाँ ले आए हमें ये रात के साये,

घनेरे कलेरे डरे डरे से ये घबराये,

ओड़ चादर फटी ये ठुकराये,

ये साये रात के

 

बिना बात कभी पीछे पड़े,

धुआँ उड़ाते, चेहरा छुपाते, लड़खड़ाते,

गिरते गिरते से, सम्भलते से, डगमगाते,

दूर से झाँकते, क़रीब आ सो जाते,

हाय ये राते के साये

 

एक सच को छिपाए हुए,

बिन बुलाये ये आये हुए,

एक मरियल लकीर से, फ़क़ीर से,

भूख से लिपटे, कालिख से चिपटे,

ये काले काले साये

 

आमने, सामने, घूमते गोल गोल,

कभी बैठे, कभी खड़े, मुँह खोल,

जैसे अभी ये जाएँगें निगल,

वो पहली किरण, इनका आख़िरी शंड़,

और रह जाती ना जाने वाली, काली रात

 

हाय, ये काली के रात के साये

~ इत्तफ़ाक़…

Coincidence

Picture Credit : Google Images

 

पड़ गया मेरे आराम में आज फिर खलल पड़ गयाफिर बैठे बैठे हुआ खड़ा आज फिर मन बदल गया,

चलने ही वाला था पर जैसे ही उठाया पहला कदमपिछले वाला अगले वाले से बेवजह ही लड़ गया

 

नीली पतलून, पिली क़मीज़ अंदर सफ़ेद बनियानजूता पहना भुला जुराब, साली किस्मत है ही ख़राब,

घुमा, मुड़ा और जैसे तैसे चल पड़ा देखा बटुआ पड़ाकिसका है ? मेरा तो हैं नहीं, बटुआ था तस्वीरों भरा

 

कल ली थी रेल की टिकट घूमने जाने को कहींजाने क्यों अब कहीं जाने का बिलकुल मन नहीं,

क्या करूँ, क्या नहीं, फाड़ा टिकट उतारी जैकेट,  उतारा जैसे ही जैकेट गिरा उसमें से एक पैकेट

 

पैकेट में थी नाटक की टिकट, नाटकइत्तफ़ाक़”, डिरेक्टर बेबाक़, ऐक्टर तपाक, क्रू फटफट फ़टाक,

ऑडीयन्स में भी जोश था, बस, दरबान ख़ामोश थापूछा तो बोला, बेटा था ना रहा, तस्वीरें थी अब वो भी नहीं

 

याद है ? बटुआ तस्वीरों से भरा, उठाया था, बताना भुल गयाउसकी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा, होश था अब जोश था,

बेटा, उसका लड़खडाता था, ठीक से चल ना पाता थाशौंक उसे सिर्फ़ तस्वीरों का था, “इत्तफ़ाक़ये तक़दीरों का था

~ सुबह का अखबार…

~ सुबह का अखबार…
viber image
सुबह के अखबार को जैसे ही मुँह से लगाया,
सर चकराया आँखों के आगे अँधेरा सा छाया…
फ़ोन उठा नंबर मिलाया, हेलो हेलो चिल्लाया,
डाक्टर साहब तबियत ज़रा नासाज़ सी है…
डाक्टर फ़रमाया…
चले आओ शायद फ्लू होगा आजकल हवा बड़ी ख़राब है,
आओ बैठो, लम्बी सांस लो और बताओ सुबह से क्या है खाया…
सुबह से डाक्टर साहब…
सुबह से चार छोटे और दो बड़े बलात्कार निगले हैं,
दो पुलों का मलबा, ३ तीन तलाक हुए शरीके हयात,
चार ज़मीन से ले के जहाज़ के घपले हलक से फिसले,
धर्ममात्मा के वोट-जिस्म-हड़प-अगवा जैसे छे-सात कांड,
ट्रैन पटरी छोड़ ज़मीन को रवाना आठ बजे रावण जलाना,
नौ रात्रो से तड़पते भक्त, आधी रात को पहरा सख्त,
दस मलेरिया के मरीज़, ग्यारह लाख की कमीज,
बारह बजे हवस का पुजारी सरिया खुला शिकारी,
तेराह सो करोड़ का टेंडर नेताजी के साले के अंडर,
सीमा से सटे क्षेत्र में चौदह साल के घुसपैठिये हुए ढेर,
पंद्रह मिनट का फिर नौकरी और विज्ञापन का रोना धोना,
सोलह साल का सफ़ेद नशे में धुत्त पंजाब, नाबालिग ने फेका तेजाब,
सतरह दिनों से भूखा किसान, पांच सो हज़ार के नोट कूड़े का ढेर,
साल दो हज़ार अठारह का सबसे ऐतिहासिक मोड़
उन्नीस के चुनाव में नेता बनाना तो सम्पति हो दो सो करोड़,
बीस-इकीस का फ़र्क़ नाम बदलने में करोड़ो का बेड़ा गर्क,
बाईस नयी बिमारियों का ईजाद, तेईस मौतें लव जिहाद,
चौबीस पत्रकार खरीदे पच्चीस नए सरकारी चैनल,
स्पेशल छब्बीस ने स्पेशल छब्बीस को किया गिरफ्तार
सत्ताइस देश से फरार देश भर में धुंए का बुखार,
अठाईस नए योग शिविर उनत्तीस विदेशी दौरे,
और आखिर में मीठे में…
तीस मार खा प्रधान सेवक की मुस्कुराती तस्वीर,
इकतीस तारिख सैलरी क्रेडिटेड मैं फिर से हुआ अमीर…
और…बस एक सर दर्द की गोली खायी है जनाब,
शायद फ्लू ही होगा, आजकल हवा बड़ी ख़राब है…