~ श्याम रंग…

~ श्याम रंग…

मोहें श्याम रंग ढल दे,

इतना सा तू बदल दे,

जो चलूँ मैं चाल आधी,

बाक़ी की चल तू चल दे,

मोहें श्याम रंग ढल दे…

है कहानी मेरी अधूरी,

पूरी उसे तू कर दे,

मोहें श्याम रंग ढल दे…

मैं रहूँगी की तेरी प्यासी,

जो तू मुझे ना जल दे,

ये तरसते मेरे नयना,

एक नज़र इधर तू कर दे,

मोहें श्याम रंग ढल दे…

ये ज़मीन है सुखी सुखी,

बादल कोई इधर दे,

मेरे ख़्वाब ख़ाली ख़ाली,

मेरी नींदों को तू भर दे,

मोहें श्याम रंग ढल दे…

मेरी नगरी में मेरा ना कोई,

मेरी गगरी फूटी क़िस्मत,

तू तो सबकी सुनने वाला,

मुझको इक नया तू कल दे,

मोहें श्याम रंग ढल दे…

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~ प्रयागराज एक्सप्रेस…

~ प्रयागराज एक्सप्रेस... 

"यात्रीगण कृपया ध्यान दें"

मैं हूँ चलती हुई ट्रेन की ऊपर वाली खाली बर्थ, 
मेरा पेसेंजर सामने वाली सीट से ले रहा है मज़ा, 
खाली बर्थ का होना ठीक वैसा है, 
जैसे ट्रैन के लम्बे सफर में सवार “एक अकेली जवान लड़की”

हर आता जाता उसे भूख भरी निगाहों से देख रहा है, 
काश मुझे मिल जाये यह सोच आँखें सेक रहा है,
पड़ी टी-टी की नज़र तो उसके मुँह में पानी से भर गया,
बेचने उसे ग्राहक की खोज में उसका चेहरा निखर गया...
 
सफर रात का था मैंने भी बगल से पड़दा खोला ज़रा,
और अपनी हसीन बर्थ की बत्ती जलती ही रहने दी,
पहली ही नज़र में उसका जादू चल गया,
सामने वाले जनाब का पैर उसपर फिसल गया...

इधर बाथरूम का रुख करते दूसरे ने तो हद्द ही कर दी,
खींच के दो चादर में से एक, बर्थ को लूटना शुरू किया,
गया सिरहाना, फिर कम्बल और फिर आखिरी चादर भी,
चुप चाप देख रहा था अब धैर्य ने मेरे टूटना शुरू किया...

असल तमाशा तो जब शुरू हुआ...

टी-टी साहब मौका देख पहला ग्राहक ले आये, 
दो-सो में दो स्टेशन का किये वादा और दिए उसपे चढ़ाये,
और नहीं, खोला पड़दा हम चिल्लाये कहाँ-किधर हमारी है,
बड़बड़ाये - तो हक़ काहे नहीं जताते खुद बैठ क्यों नहीं जाते...

बस क्या था - सब तरसती नज़रों को जैसे सांप सूंघ गया,
अब हर आता-जाता हमें ऐसे घूर रहा था,
जैसे उनकी गर्लफ्रेंड को हम ब्याह लिए हों,
टी-टी तो ऐसे सड़े जैसे उनकी नौकरी हम खा लिए हों...

बहुत कठिन है भाई ट्रेन में खाली बर्थ का सफर करना,
इज्जत सुरक्षित रहती नहीं और भाव लगा सो अलग,
सब का सब अइसे उस पर अपना हक़ जताता हैं,
जैसे बाप ज़मीन छोड़ दिया उनके नाम और बर्थ उनकी माता हैं...

~ अर्धनारीश्वर…

~ अर्धनारीश्वर…

प्राण शिव निर्माण शिव है,
धरा शिव ब्रह्माण शिव है,
शिव पवित्र चरित्र शिव है,
भक्ति आस्था का मित्र शिव है…

शिव भोला है त्रिशूल शिव है,
अनुकूल शिव प्रतिकूल शिव है,
धारा शिव विचार शिव है,
शब्दों का आकार शिव है…

आदि शिव अनंत शिव है,
शुरू शिव है अंत शिव है,
शिव ज्वाला शिव शीतल है,
गंगा शिव गंगा-जल शिव है…

शिव उपासना शिव ही फल है,
शिव प्रभाव भी बल शिव है,
शास्त्र शिव शस्त्र शिव है,
आत्मा शिव वस्त्र शिव है…

होनी शिव अनहोनी शिव है,
लिंग शिवा है योनि शिव है,
शिव अंधकार है मरण है शिव,
प्रातः काल की किरण है शिव…

रत्ती शिव उत्पत्ति शिव है,
भाव शिव अभिव्यक्ति शिव है,
सृष्टि रचेयता शक्ति शिव है,
शिव शिव है, पार्वती शिव है…

~ दिल्ली…

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पुरानी दिल्ली की नयी सड़क,
शोख़ियाँ, अन्दाज़, ख़ूब तेरी तड़क भड़क,
दिल्ली पुरानी की नयी सड़क…
 
बल्लीमारा, फ़तहपुरी, क़ुचा-ए-नील,
लहंगें, ज़री, ज़रदोज़ी ये गाइड-कुंजियाँ,
नल्ली नहारी, पराँठे, कुलचे तेरे जामुन-ए-गुलाब,
गोल जलेबी सी तेरी गलियाँ लाजवाब…
 
ताँगे, रिक्शे, गाड़ियाँ, स्टेशन की भीड़,
कोठे, जिस्म, भूख और के लाचारी ग्राहक,
कभी आयें चखने मद-मय-हुस्न खाने,
बस क़ीमत चुकायें यहाँ रिश्ते नहीं निभाने…
 
चौक चाँदनी पाँचवाँ चाँद, बावली खारी,
क़िला-लाल, बाज़ार उर्दू, नीम-हकीम, और
गली क़ासिम जान, ग़ालिब की हवेली जहाँ,
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरिजा साथ रहते यहाँ…
 
पुरानी दिल्ली की नयी सड़क,
शोख़ियाँ, अन्दाज़, ख़ूब तेरी तड़क भड़क,
तू – दिल्ली पुरानी की नयी सड़क…
 

~ धर्म…

दो ही धर्म है

अमीर होना या ग़रीब होना,

होना बदनसीब या ख़ुशनसीब होना

उनसे दूर होना या उनके करीब होना,

सब जैसा होना या अजीबो गरीब होना

होना आबाद या निस्तोनाबाद होना,

किसी के बस में या बिलकुल आज़ाद होना

टहनी से लटका या गिरा हुआ फल होना,

ताज़ा आज या गुज़रा हुआ कल होना

सड़क का कंकर या मील का पत्थर होना,

भला चंगा होना या बद से बदत्तर होना

भोलाभाला होना या तेज़तर्रार होना,

काम का होना या बिलकुल बेकार होना

गोराचिट्टा होना या अँधेरी रात सा,

या इस जात का उस जात का

दो ही धर्म है

बाकी सब पहनावे हैं,

बहकाने के छलावे हैं…